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गुरुवार, 7 अगस्त 2014

इन लहु को बहुत दुःख है--- (ओशिन कुमारी )

लाशें जो बिछी हैं इंसानों की, दिल दहल जाय ऐसे दृश्यों की  आखिर क्यों इंसानों में भेद है ऐसा , क्यों कौम -संप्रदाय की दुरी है ऐसा , ये नजारा तो देखो , देखकर जरा गौर करो, ये लहु मिलने चले हैं  ऐसे , जैसे चले हैं बरसों  पुरानी दूरियां मिटाने को  l इन लहु  को बहुत दुःख है कि इंसान, इंसान को न पहचानता , ये क्यों है ऐसी खाई , मनुष्य से मनुष्यता के अंत का l इन लहु को बहुत दुःख है कि काश हमें वह शक्ति होता, कि अगर यह काम हमसे हो जाता, तो मिटा देते ये फासला, इन्सानों के दिलों दिमाग का  l  इन लहु को बहुत दुःख...