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गुरुवार, 29 सितंबर 2011

किसलय सी कोमल काया {गीत} सन्तोष कुमार "प्यासा"

क्यूँ विकल हुआ हिय मेरा क्यूँ लगते सब दिन फीके हर छिन कैसी टीस उठे अब साथ जागूं रजनी केजब से वह किसलय सी कोमल काया मेरे मन में छाई संयोग कहूँ या प्रारब्ध इसे मैंवो पावन पेम मिलन था इक पल का मिटीजन्मो की तृष्णा सारीइक स्वप्न सजा सजल साइस सुने से जीवन में मेरे मचली प्रेम तरुणाई जब से वह किसलय सी कोमल काया मेरे मन में छाई न परिचित मै नाम से उसके न देश ही उसका ज्ञात हैपर मै मिलता हर दिन उससेवोतो मनोरम गुलाबी प्रातः  हैनिखरा तन-मन मेरा बसंत बहार जैसेये कैसी चली पुरवाई  जब से वह किसलय सी कोमल काया मेरे मन में छाई...

रविवार, 11 सितंबर 2011

बदल गया है देश {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

भला विचारा कभी,हम क्या थे और क्या हो गयेस्वार्थ की प्रतिस्पर्धा ऐसी जगीपरहित भूल, अलमस्त हो खो गये !न फिक्र की समाज की,किसी के दुःख से न रहा कोई वास्ताफंसकर छल कपट के जुन्गल मेंबहाया अपनों का लहू, चुना बर्बादी का रास्ता तिल भर सौहार्द न बचा ह्रदय  में भला किसने रचा ये परिवेशतुम खुद बदल गये होऔर कहते हो बदल गया है देश ! *************************************मनुष्य सदैव से अपनी गलतियों को छुपाने के लिए दूसरों पर दोषारोपण करता आया है,परन्तु वर्तमान की आवश्यकता गलतियों  का परित्याग एवं विकाशन है, किन्तु ये विडम्बना ही है की वो इस वास्तविकता...

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

लोग {गजल} सन्तोष कुमार "प्यासा"

आखिर किस सभ्यता का बीज बो रहे हैं लोगअपनी ही गलतियों पर आज रो रहे हैं लोग हर तरफ फैली है झूठ और फरेब की आगफिर भी अंजान बने सो रहे है लोग  दौलत की आरजू में यूं मशगूल हैं सबझूठी शान के लिए खुद को खो रहे हैं लोग  जाति, धर्म और मजहब के नाम परलहू का दाग लहू से धो रहे हैं लोग  ऋषि मुनियों के इस पाक जमीं परक्या थे और क्या हो रहे है लोग...&nbs...