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बुधवार, 27 जुलाई 2011

पर्दा प्रथा: विडंबना या कुछ और---------मिथिलेश दुबे

अपने देश में महिलाओं को (खासकर उत्तर भारत में ज्यादा) पर्दे में रखने का रिवाज है । इसके पीछे का कारण शायद ही कोई स्पष्ट कर पाये फिर भी ये सवाल तो कौंधता ही है कि आखिर क्यों ? मनुष्यों में समान होने के बावजूद भी महिलाओ‍ को ढककर या छिपाकर रखने के पीछे का क्या कारण हो सकता है ? ये सवाल हमारे समाज में अक्सर ही किया जाता रहा है, कुछ विद्वानों का मानना है कि पर्दा प्रथा समाज के लिये बहुत ही आवश्यक है इसके पीछे के कारण के बारे में उनका कहना है कि इस प्रथा से पुरूष कामुकता को वश में किया जा सकता है । लेकिन इस जवाब के संदर्भ में ये सवाल भी खड़ा होता है...

सोमवार, 25 जुलाई 2011

बेनूर चाँद {गजल} सन्तोष कुमार "प्यासा"

एक दर्द में फिर डूबी शमा, फिर चाँद हुआ बेनूर बिखरा दिल, टीसती यादें तेरी भला क्यूँ हुए तुम दूर करूँ वक़्त से शिकवा या फिर अफ़सोस अपनी किस्मत पर  तरसती "प्यास" में तडपूं हर पल, ऐसा चढ़ा उस साकी का सुरूर  ये कशिश है इश्क की या दीवानगी का कोई दिलकश सबब तडपती जुदाई उसी को क्यूँ , जो होता प्यार में बेकसूर  हजारों तारों के साथ भी आसमां क्यूँ हुआ तनहा जब बंद हो गईं आंखे चकोर की, चाँद भी हो गया बेनूर  ************************************************************* मन के अन्तरम में पता नहीं कैसी टीस कैसी बेचैनी उठी, फिर न चाहते हुए/...

शनिवार, 23 जुलाई 2011

सांप्रदायिकता (कविता)----जयप्रकाश स‌िंह बंधु

स‌ब जानते हैं-स‌ांप्रदायिकता!धर्म,भाषा,रंग,देश...न जाने कितनी ही बिंदुओं परतुम कटार उठाओगेऔर दौड़ने लगोगे एकाएकहांफते हुए-कस्बा-कस्बाशहर-शहरगांव-गांव।और यह भीस‌ब जानते हैं-कि अपने चरित्रानुसाररोती-बिलखती बुत बनी आत्माओंखंडहरों के बीच छुप जाओगेशायद तुम्हारे भीतर का आदमीडरा होगा थोड़ी देर के लिए।तब-उन्हीं खंडहरोंकाठ बनी आत्माओं के बीच स‌ेनिकल आएगा धीरे-धीरेएक कस्बाएक शहरएक गांव....एक गांव....

गुरुवार, 14 जुलाई 2011

अरिमान (कविता)-----विजय कुमार शर्मा

१. अरिमान - एक जो बिछुर रहें जग की चाल सेउन्हें रफ़्तार पे ला दूँ मैंजो मचा रहें हो भीम उछल कूंदउन्हें शांति का पाठ पढ़ा दूँ मैंजो बढ़ रहें हो सरहदों से आगेउन्हें सरहदों में रहना सिखा दूँ मैंमेरे जीवन का एक तुष्य ख्वाबजग में रामराज बना दूँ मैंन चले गोंलिया न बहे खूनन कहीं कोई कैसा मातम होहर दर पे उमरे बस खुशीहर घर उन्नति का पालक होचहचहाता आंगन हो सबकाहर कोई समृधि श्रष्टि का चालक होमेरे जीवन की एक बिसरी कल्पनाहो एक देव जो दैत्यों का घालक हो२. अरिमान - दो आये मेरे में इतना सामर्थबंजर में भी फसल उगा दूँ मैंजो मुरझा रहे पंचतत्वो के वाहकउन्हें...

सोमवार, 11 जुलाई 2011

हिंगलिश दोहे...................श्यामल सुमन

LIFE MISERABLE हुई, INCREASING है RATE।GODOWN में GRAIN है, PEOPLE EMPTY पेट।।JOURNEY हो जब TRAIN से, FEAR होता साथ।होगा ACCIDENT कब, मिले DEATH से हाथ।।इक LEADER SPEECH का, दूजा करे OPPOSE।दिखती UNITY जहाँ, PAY से अधिक PRAPOSE।।आज CORRUPTION के प्रति, कही न दिखती HATE।जो भी हैं WANTED यहाँ, खुला MINISTER GATE।।आँखों में TEAR नहीं, नहीं TIME पे RAIN।सुमन की LIFE SAFE है, LOSS कहें या GAI...

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

मोहब्बत.............रमन कुमार अग्रवाल'रम्मन'

परिंदा क़ैद में हैआशियाना देखता हैपरिंदा क़ैद में हैआशियाना देखता हैवो बंद आँखों सेसपना सुहाना देखता हैतू ही समझ न सका अहमियत मोहब्बतकीतेरे तरफ तो येसारा ज़माना देखता हैतू ही तबीब, तू ही रहनुमा तूही रहबरतेरे करमको तो सारा ज़माना देखता हैतू आशिकों का है आशिक़, ये शान हैतेरीतेरी मिसाल तू खुद हैज़माना देखता हैनवाज़ देना तू 'रम्मन'को भी मोहब्बत सेदीवाना मिलने का तेरेबहाना देखता...

रविवार, 3 जुलाई 2011

चवन्नी का अवसान : चवनिया मुस्कान--------श्यामल सुमन

सच तो ये है कि चवन्नी से परिचय बहुत पहले हुआ और"चवनिया मुस्कान" से बहुत बाद में। आज जब याद करता हूँ अपने बचपन को तो याद आती है वो खुशी, जब गाँव का मेला देखने के लिए घर में किसी बड़े के हाथ से एक चवन्नी हथेली पर रख दिया जाता था "ऐश" करने के लिए। सचमुच मन बहुत खुश होता था और चेहरे पर स्वाभाविक चवनिया मुस्कान आ जाती थी। हालाकि बाद में चवनिया मुस्कान का मतलब भी समझा। मैं क्या पूरे समाज ने समझा। मगर उस एक दो चवन्नी का स्वामी बनते ही जो खुशी और "बादशाहत"...

शनिवार, 2 जुलाई 2011

सरकार भी संसद से ऊपर नहीं - शम्भु चौधरी

भारत जब से आज़ाद हुआ इसके आज़ादी के मायने ही बदल गये। सांप्रदायिकता के नये-नये अर्थ शब्द कोश में भरने लगे। इसका सबसे ताजा उदाहरण है भ्रष्टाचार की बात करने वाले भी अब सांप्रदायिक तकतों से हाथ मिला लिये। कुछ दिन पहले बाबा रामदेव के लिए लाला कारपेट बिछाने वाली कांग्रेस को अचानक से एक ही दिन में सांप्रदायिक नजर आने लगे। अब अन्ना हजारे पर भी आरोप मढ़ दिया कि वे भ्रष्टाचार की लड़ाई में सांप्रदायिक ताकतों को साथ लेकर सरकार से लड़ाई कर रहे हैं। जब तक कांग्रेसियों का मन होगा और आप उनकी बात मानते रहेगें वो धर्मनिरपेक्ष नहीं तो सांप्रदायिक।इस लेख को पढ़ने...