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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

अलमारी----(कविता)----मोनिका गुप्ता

कमरे मे माँ की अलमारी नही अलमारीनुमा पूरा कमरा है जिसमे मेरे लिए सूट है सामी के लिए खिलौना है इनके लिए परफ्यूम है मणि के लिए चाकलेट है एक जोडी चप्पल है सेल मे खरीदा आचार,मुरब्बा और मसाला है बर्तनो का सैट हैशगुन के लिफाफा है जो जो जब जब याद आता हैवो इसमे भरती जाती हैं ताकि मेरे आने परकुछ देना भूल ना जाएसच, ये अलमारी नही अलमारीनुमा पूरा कमरा...

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

पत्रकारिता का बदलता स्वरुप....(शिव शंकर)

पत्रकारिता जो की लोकतंत्र का स्तम्भ है, जिसकी समाज के प्रति एक अहम भूमिका होती है, ये समाज में हो रही बुराईयों को जनता के सामने लाता है तथा उन बुराईयों को खत्म करने के लिए लोगो को प्रेरित करता है। पत्रकारिता समाज और सरकार के प्रति एक ऐसी मुख्य कड़ी है, जो कि समाज के लोगो और सरकार को आपस में जोड़े रहती है। वह जनता के विचारों और भावनाओं को सरकार के सामने रखकर उन्हे प्रतिबिंबित करता है तथा लोगो में एक नई राष्टीय चेतना जगाता है।पत्रकारिता के विकाश के सम्बन्ध में यदि कोई जानकारी प्राप्त करनी है तो हमें स्वतन्त्रता प्राप्ति के पहले की पत्रकारिता...

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

सोचो तो असर होता ---(गजल)----श्यामल सुमन

जीने की ललक जबतक साँसों का सफर होताहर पल है आखिरी पल सोचो तो असर होताइक आशियां बनाना कितना कठिन है यारोजलतीं हैं बस्तियाँ फिर मजहब में जहर होताहोती बहुत निराशा अखबार खोलते हीअब हादसों के बाहर क्या कोई शहर होताअपनों के बीच रहकर अपनों से दूर है जोअक्सर उसी पे देखो अपनों का कहर होताआगे बढ़ी है दुनिया मौसम बदल रहा हैबदेले सुमन का जीवन इक ऐसा पहर होता...

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

मत बाँटो देश (लेख)-----मिथिलेश

नया युग वैज्ञानिक अध्यात्म का है । इसमें किसी तरह की कट्टरता मूढता अथवा पागलपन है। मूढताए अथवा अंधताये धर्म की हो या जाति की अथवा फिर भाषा या क्षेत्र की पूरी तरह से बेईमानी हो चुकी है । लेकिन हमारें यहां की राजनीति इतनी भ्रष्ट हो गई है कि उन्हे देश को बाँटने के सिवाय कोई और मुद्दा ही नहीं दिखता । कभी वे अलग राज्य के नाम पर राजनीति कर रहे हैं तो कभी जाति और धर्म के नाम पर । जिस दश में लोग बिना खाए सो जा रहे हो , कुपोषण का शिकार हो रहें हो , लड़किया घर से निकलने पर डर रही हो उस देश में ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना मात्र मूर्खता ही कही जा सकती...

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

विकराल मुख और मधुर वाणी…...(सत्यम शिवम)

विकराल मुख और मधुर वाणी, रुप विमुख पर अधरों का ज्ञानी।संतृप्त रस,मधुता का पुजारी,क्रंदन,रोदन का विरोध स्वभाव,मन को तज,जिह्वा का व्यापारी,मुख पे भर लाया घृणित भाव। वाणी की प्रियता से है सब जग जानी।विकराल मुख और मधुर वाणी। मुख पे ना अनोखा अलंकार,मधुता है वाणी का श्रृँगार,नैनों में ना विस्मित संताप,होंठों पे है मधु भावों का जाप। नैनों ने अधरों की महता मानी।विकराल मुख और मधुर वाणी। वाणी से सुकुमार राजकुमार,छवि की परछाई से गया वो हार,अधरों की मोहकता से...

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

पुरस्कार-------(लघुकथा)----------निर्मला कपिला

राजा-- देखो कैसा जमाना आ गया है सिफारिश से आज कल साहित्य सम्मान मिलते हैं। शाम -- वो कैसे? हमारे पडोसी ने किसी महिला पर कुछ कवितायें लिखी। उसे पुरुस्कार मिला। उसी महिला पर मैने रचनायें लिखी मुझे कोई पुरस्कार नही मिला। तुम्हें कैसे पता है कि जिस महिला पर रचना लिखी वो एक ही महिला है? राजा--- क्यों कि वो हमारे घर के सामने रहता है । लान मे बैठ जाता और मेरी पत्नि को देख देख कर कुछ लिखता रहता था। लेकिन मै उसके सामने नही लिखता मैं अन्दर जा कर लिखता था। सब से बडा दुख तो इस बात का है कि मेरी पत्नी उस मंच की अध्यक्ष थी और उसके हाथों से ही पुरुस्कार...

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

तुम तुम और तुम... (गीत)--- ( डा श्याम गुप्त )

सकल रूप रस भाव अवस्थित , तुम ही तुम हो सकल विश्व में |सकल विश्व तुम में स्थित प्रिय,अखिल विश्व में तुम ही तुम हो |तुम तुम तुम तुम , तुम ही तुम हो,तुम ही तुम, प्रिय! तुम ही तुम हो || तेरी वींणा के ही नाद से, जीवन नाद उदित होता है |तेरी स्वर लहरी से ही प्रिय,जीवन नाद मुदित होता है |ज्ञान चेतना मान तुम्ही हो ,जग कारक विज्ञान तुम्ही हो |तुम जीवन की ज्ञान लहर हो,भाव कर्म शुचि लहर तुम्ही हो | अंतस मानस या अंतर्मन ,अंतर्हृदय तुम्हारी वाणी |अंतर्द्वंद्व -द्वंद्व हो तुम ही , जीव जगत सम्बन्ध तुम्ही हो | तेरा प्रीति निनाद न होता , जग का कुछ संबाद न होता...

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

उपन्यास ''छपाक-छपाक'' ( समीक्षा)-------

सामाजिक और धार्मिक जीवन में ऊँचे स्थान पर मानी जाने वाली नर्मदा नदी के साथ ही वहाँ के आलम को इस उपन्यास में प्रयाप्त रूप से मान मिला है.हर थोड़ी देर में नदी के बहाव को देखता हुआ लेखक अपने पात्रों के बहाने असल जीवन दर्शन को कागज़ में छापता है.शाम-सवेरे और सूरज जैसी उपमाओं के ज़रिए भी बहुत गहरी बातें संवादों में रूक रूक कर समाहित की गई है.संवादों में बहुत से ऐसे शब्दों का समावेश मिलेगा जो उस इलाके के देशज लगते हैं.समय के साथ अपने में बदलाव करता...

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

" मैं हिंदी "-----(कविता)-------वीनस**** जोया

हर बार यही मंजर दोहराया गयामुझे मेरे ही घर में गिराया गयापराये रौशनी आँखों में सजा लीघर का कंदील कहीं छुपाया गयामैं हिंदी मुडी तुडी किसी वेद कीसिलवट पे चिपकी पड़ी रह गयीमेरे अपनों ने अंग्रेजी की पोषक सेअपने तन को सजा - सवार लियाअपना आस्तित्व खरपतवार साप्रतीत हुआ मुझे जब अपनों कीमहफिलों में मेरा रूप नकारा गयामैं "हिंदी" सिर्फ कुछ कक्षाओं मेंअब मात्र विषय बन के रह गयीजुबां पे सजने की अदा और हुनरखोखले दिखावों में छुपता गयाउर्दू - पंजाबी सरीखी बहनों सेअपना आस्तित्व बाँट लिया मैंने और अब बाहर की सौतन से भी धीरे धीरे मेरा सुहाग बंटता गया शिकवा शिकायात...

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

ऐ दर्द न सता मुझे-----(गजल)----दिलबाग विर्क

किस बात की दे रहा सज़ा मुझेहै क्या गुनाह मेरा , बता मुझे .हिम्मत नहीं अब और सहने कीरुक भी जा , ऐ दर्द न सता मुझे .या खुदा ! अदना-सा इंसान हूँ टूट जाऊँगा , न आजमा मुझे .क्यों चुप रहा उसकी तौहीन देखकरये पूछती है , मेरी वफा मुझे .आखिर ये बेनूरी तो छटेकिन्ही बहानों से बहला मुझे .एक अनजाना सा खौफ हावी है अब क्या कहूँ 'विर्क' हुआ क्या मुझे...

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

इकतरफा प्यार..........(सत्यम शिवम)

ये दिल का खेल भी बड़ा निराला होता है, जिससे प्यार करता है, उससे ही कहने से डरता है। अपनी सारी जिंदगी उसके इंतजार में गुजरता है, वो तो सोता है,पर खुद रात भर जगता है। दिल से ही दिल में खुब बातें करता है, पर जब वो सामने आता है, तो कुछ भी कहने से डरता है। बस एक झलक जो पा लेता है उसकी, दिल मोर बगिया में ऐसे नाचता है, मानों सब कुछ मिल गया हो अब, कुछ और ना पाने की चाहत रखता है। पर जुदाई के हर तड़प को यूँ सहता है, जैसे अग्निपथ को कोई पार करता है। आँखों...

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

क्यूकी बाप भी कभी बेटा था ......संतोष कुमार "प्यासा"

एक जमाना था जब लड़के अपने घर के बड़े बुजुर्गों का कहना सम्मान करते थे उनका कहा मानते थे ! कोई अपने पिता से आंख मिलाकर बात भी नहीं करता था ! उस समय कोई अपने पिता के सामने कुर्सी या पलंग पर भी नहीं बैठता था ! तब प्यार जैसी बात को अपने बड़े बुजुर्गों से बंटाना "बिल्ली के गले में घंटी बाधने" जैसा था ! प्रेम-प्रसंग तो सदियों से चला आ रहा है ! लेकिन पहले के प्रेम में मर्यादा थी ! उस समय यदि किसी के पिता को पता चल जाता था की उसका बेटा या बेटी किसी से नैन लड़ाते( प्रेम करते) घूम रहे है तो समझों की उस लड़के या लड़की की शामत आ गई !  पिता गुस्से में...

शिक्षा अनिवार्यता का सच ... ..... ( शिव शंकर)

भारत में ६ से १४ साल तक के बच्चो के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार का कानून भले ही लागू हो चुका हो, लेकिन इस आयु वर्ग की लडकियों में से ५० प्रतिशत तो हर साल स्कुलो से ड्राप- आउट हो जाति है। जाहिर है,इस तरह से देश की आधि लडकियां कानून से बेदखल होती रहेगी। यह आकडा मोटे तैर पर दो सवाल पैदा करते है। पहला यह कि इस आयु वर्ग के १९२ मिलियन बच्चों में से आधी लडकिया स्कुलो से ड्राप-आउट क्यो हो जाती है ? दूसरा यह है कि इस आयु वर्ग के आधी लडकिया अगर स्कुलो से ड्राप- आउट हो जाती है तो एक बडे परिद्श्य में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून का क्या...

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

सफर के साथ मैं...............neeshoo tiwari

सफर के साथ मैंया फिर मेरे साथ सफरकुछ ऐसा रिश्ता बन गया थाकब, कहाँ, और कैसे पहुँच जाना हैबताना मुश्किल थाऐसे ही रास्तों पर कई जाने पहचाने चहरे मिलतेऔरफिर वो यादें धुंधली चादर में कहीं खो जातीमैं कभी जब सोचता हूँ इन लम्हों को तोयादें खुद ब खुद आखों में उतर आती हैं वो बस का छोटा सा सफरअनजाने हम दोनोंचुपचाप अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जा रहे थेवो मेरे सामने वाली सीट पर शांत बैठी थीउसके चेहरा न जाने क्यूँ जाना पहचाना सा लगाऐसे मेंहवा के एक झोंके नेकुछ बाल उसके चेहरे पर बिखेरे थेवो बार-बारअपने हाथों से बालों को प्यार से हटाती थीलेकिन कुछ पल बीतने के बादवो...

प्रणय-कथा अब कौन कहेगा ? --(गीत)----डॉ. नागेश पांडेय "संजय"

तुमको तो जाना ही होगा,लेकिन क्या यह भी सोचा है -दर्द हमारा कौन सहेगा ?तपते मरुथल में पुरवाईके झोंके अब क्या आएँगे ?रुँधे हुए कंठों से कोकिलगीत मधुर अब क्या गाएँगे ?तुमको तो गाना ही होगा,लेकिन क्या यह भी सोचा है -अब उस लय में कौन बहेगा ?यह कैसा बसंत आया है ?हरी दूब में आग लगा दी !निंदियारे फूलों की खातिरउफ्! काँटों की सेज बिछा दी !इसको अपनाना ही होगा,लेकिन क्या यह भी सोचा है -आशाओं का महल ढहेगा।एक बार फिर छला भँवर ने,डूब गई मदमाती नैया।एक बार फिर बाज समय कालील गया है नेह चिरैया।मन को समझाना ही होगा,लेकिन क्या यह भी सोचा है -प्रणय-कथा अब...

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

सफर के साथ मैं...............neeshoo tiwari

सफर के साथ मैंया फिर मेरे साथ सफरकुछ ऐसा रिश्ता बन गया थाकब, कहाँ, और कैसे पहुँच जाना हैबताना मुश्किल थाऐसे ही रास्तों पर कई जाने पहचाने चहरे मिलतेऔरफिर वो यादें धुंधली चादर में कहीं खो जातीमैं कभी जब सोचता हूँ इन लम्हों को तोयादें खुद ब खुद आखों में उतर आती हैं वो बस का छोटा सा सफरअनजाने हम दोनोंचुपचाप अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जा रहे थेवो मेरे सामने वाली सीट पर शांत बैठी थीउसके चेहरा न जाने क्यूँ जाना पहचाना सा लगाऐसे मेंहवा के एक झोंके नेकुछ बाल उसके चेहरे पर बिखेरे थेवो बार-बारअपने हाथों से बालों को प्यार से हटाती थीलेकिन कुछ पल बीतने के बादवो...

अंतिम विदाई-----(कविता) -- मीना मौर्या

धरा पर अवतिरत हुआलिपटा मोह माया में भाईआज खुशी मना लोकल होगी अंतिम विदाई ।खुशियों का बसेरा छोटाजीवन पहाड़ व रवाईसुख-समृद्धि धन दौलतखोयेगा बचेगा एक पाई । मानव मन परिवर्तन शीलस्थिर टिक नहीं पाईवर्तमान तेरा अच्छा हैमत सोच भविष्य होगा भाई । अकेला चिराग देगा रोशनीसंसार अंधेरा कुआ राहीचिकने डगर पर गड्ढे हैंशूल अनगिनत न देत दिखाई । टुक-टुक मत देख तस्वीरसामने बुढापा जीवन बनी दवाईशुरुआत तो अच्छी थीअन्त बड़ा ही दुःखदाई।।इन्द्र धनुष रंग जीवनसब रंग न देत दिखाईसजीला तन बना लचीलासास लेना दुःखदाई । वास्तविकता विपरित इसके हैमानव मन आये चतुराईस्वयं संसार में...

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

चांदनी को निखरते हुए... {गजल} सन्तोष कुमार "प्यासा"

देखा है मैंने इश्क में ज़िन्दगी को संवरते हुए चाँद की आरजू में चांदनी को निखरते हुए इक लम्हे में सिमट सी गई है ज़िन्दगी मेरी महसूस किया है मैंने वक्त को ठहरते हुए डर लगने लगा है अब तो, सपनो को सजाने में भी जब से  देखा है हंसी ख्वाबों को बिखरते हुए अब तो सामना भी हो जाये तो वो मुह फिर लेते हैं अपना पहले तो बिछा देते थे नजरो को अपनी, जब हम निकलते थे उनके रविस से गुजरते हुए... (रविस = (सुन्दर) रा...

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

आ जाओ माँ.....(सत्यम शिवम)

स्वर मेरा अब दबने लगा है, कंठ से राग ना फूटे, अंतरमन में ज्योत जला दो, कही ये आश ना टूटे। तु प्रकाशित ज्ञान का सूरज, मै हूँ अज्ञानता का तिमीर, ज्ञानप्रदाता,विद्यादेही तु, मै बस इक तुच्छ बूँद सा नीर। विणावादिनी,हँसवाहिनी! तुझसे है मेरा नाता, बिना साज,संगीत बिना भी, हर दम मै ये गाता। तेरा पुत्र अहम् में माता, भूल गया है स्नेह तुम्हारा, भूल गया है ज्ञान,विद्या, धन लोभ से अब है हारा। आ जाओ माँ आश ना टूटे, दिल के तार ना रुठे, कही तुम बिन माँ तड़प तड़प...

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

मेरी इच्छा के बन दीप.........(सत्यम शिवम)

मेरी इच्छा के बन दीप, हर पल,हर क्षण तुम जलते रहो, निशदिन प्रगति के पथ पर, अनवरत तुम चलते रहो। इतनी शक्ति दे ईश्वर, एक दिन जाओ दुनिया को जीत। मेरी इच्छा के बन दीप। सारी खुशीयाँ कदमों को चूमे, जीवन में हर पल आनंद झूमे। कभी भी ना तुम रहो उदास, ईश्वर में रखो सदा विश्वास। बुरे दिनों में तुम्हे राह दिखाए, मेरी मुस्कुराहटों का हर गीत। मेरी इच्छा के बन दीप। आकांक्षाओं को मेरे दो नया स्वरुप, आती जाती रहती है, जीवन में छावँ धूप। इक नया आसमां बनाओ, इक...

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

नव प्रेरणा {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

क्या धरा, क्या व्योम नव-प्रेरणा देता प्रकृति का रोम-रोम प्रभा की बेला देती जीवन में नव उमंग भर परसेवा को प्रेरित करते तरुवर प्रिय के वियोग में जब प्रीत-गीत छेड़ते विहाग स्पंदित हो उठता ह्रदय छट जाते जन्मो के मर्म विषाद स्वेत श्याम रूप धर नीलाम्ब में जब बदल इठ्लाएं अमृत बूँद गिरे धरा पर मन-मानस पुलकित हो जाए....

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पोर्टब्लेयर में कवि सम्मेलन

हिन्दी साहित्य कला परिषद, पोर्टब्लेयर द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर 25 जनवरी को कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस अवसर पर दक्षिण अंडमान के उप मंडलीय मजिस्ट्रेट श्री राजीव सिंह परिहार मुख्य अतिथि थे और कार्यक्रम की अध्यक्षता चर्चित युवा साहित्यकार और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के निदेशक डाक सेवाएँ श्री कृष्ण कुमार यादव ने की. दूरदर्शन केंद्र पोर्टब्लेयर के सहायक निदेशक श्री जी0 साजन कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे. कार्यक्रम का शुभारम्भ द्वीप प्रज्वलन द्वारा हुआ.इस अवसर पर द्वीप समूह के तमाम कवियों ने अपनी कविताओं से शमां...