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शनिवार, 31 जुलाई 2010

साथी रे................(कविता)...................कवि दीपक शर्मा

नहीं समय किसी का साथी रे !मत हँस इतना औरों पर किकल तुझको रोना पड़ जायेछोड़ नर्म मखमली शैय्या कोगुदड़ पर सोना पड़ जायेहर नीति यही बतलाती रे !नहीं समय किसी का साथी रे !तू इतना ऊँचा उड़ भी न किकल धरती के भी काबिल न रहेइतना न समझ सबसे तू अलगकल गिनती में भी शामिल न रहेप्रीति सीख यही सिखलाती रे !नहीं समय किसी का साथी रे !रोतों को तू न और रुलाजलते को तू ना और जलाबेबस तन पर मत मार कभीकंकड़- पत्थर , व्यंग्यों का डलाअश्रु नहीं निकलते आँखों सेजीवन भर जाता आहों सेमन में छाले पड़ जाते हैंअवसादों के विपदाओं सेकुदरत जब मार लगाती रे !नहीं समय किसी का साथी रे !इतना...

प्‍यार

तुम पास होती, ये जरूरी नही था। तुम्‍हारे होने का एहसास ही, जीने के लिये काफी था ।। मै तेरे बिना भी जी सकता था, पर तेरी बेवफाई न मुझे मार डाला। मुझे मालून भी न चला, तुने एक पल मे प्‍यार बदल डाला।। न चाह थी तेरे आलिंगन की, न चाह थी तेरे यौवन का। दिल की आस यही रही हमें, प्‍यार अमर रहे हमेशा।। मैने प्‍यार में चाहा खुद्दारी, पर मिली हमेशा गद्दारी। प्‍यार कोई दो जिस्‍मो खेल नही है, प्‍यार दो दिलो का मेल है।। मेरे प्‍यार की सीमा वासना नही, ये तो अर्न्‍तत्‍मा का मिलन है। पल भर पहले दो अजनबियों का, जीवन भर साथ...

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

गोबिंद गोबिंद नाम उचारो...........(सवैया).................डा श्याम गुप्त

सीस वही जो झुकैं चरनन, नित राधा-गोबिन्द सरूप सदा जो |नैन वही जो लखें नित श्याम, वही शुचि सांवरो रूप लला को.|कान वही जो सुनै धुनी मुरली, बजाई धरे सिर मोर पखा जो |तन तौ वही जो निछावर होय,धरे हिये रूप वा ऊधो सखा को |हाथ वही जो जुड़ें हर्षित मन , देखिकें लीला जो गौ दोहन की |पैर वही जो कोस चौरासी , चलें परिकम्मा में गिरि गोधन की |ध्यान वही जो रमई नित प्रति, मनमोहिनी वा छवि में सोहन की |श्याम है मन तौ वही मन ही मन मुग्ध मुरलिया पै मनमोहन की |गलियाँ वही व्रज की गलियाँ ,जहँ धूलि में लोटे कृष्ण मुरारी |वन तौ वही वृन्दावन 'श्याम , बसें जहँ राधिका-रास...

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

माँ...........................(कविता)..................मोनिका गुप्ता

माँ को है विरह वेदना और आभास कसक का ठिठुर रही थी वो पर कबंल ना किसी ने उडाया चिंतित थी वो पर मर्म किसी ने ना जाना बीमार थी वो पर बालो को ना किसी ने सहलाया सूई लगी उसे पर नम ना हुए किसी के नयना चप्पल टूटी उसकी पर  मिला ना बाँहो का सहारा कहना था बहुत कुछ उसेपर ना था कोई सुनने वाला भूखी थी वो पर खिलाया ना किसी ने निवाला समय ही तो है उसके पास पर उसके लिए समय नही किसी...

बुधवार, 28 जुलाई 2010

गीतिका ................................डॉ. वेद व्यथित

हमारे नाम के चर्चे जहाँ पर भी हुए होंगे  वहाँ पर खूब आंधी और तूफान भी हुए होंगे तुम्हे कैसे कहूँ मैं मोम भी पाषाण होता हैइन्ही बातों से लोगों के जहन भी हिल गये होंगे खबर है क्या तुम्हे वोप भूख को उपवास कहता है खबर होती तो सिंघासन तुम्हारे हिल गये होंगे  महज अख़बार की कालिख बने हैं और वे क्या हैं फखत शब्दों से कैसे पेट जनता के भरे  होंगे तुम्हारे चंद जुमले तैरते फिरते हवा में हैं उन्हें कुछ पालतू मन्त्रों की भांति रट रहे होंगे  तुम्ही ने नाम करने को ही उस में बद मिलाया है उसी खातिर ...

सोमवार, 26 जुलाई 2010

भलाई किये जा इबादत समझ कर.............(गजल)..........नीरज गोस्वामी

सितम जब ज़माने ने जी भर के ढाये भरी सांस गहरी बहुत खिलखिलाये कसीदे पढ़े जब तलक खुश रहे वोखरी बात की तो बहुत तिलमिलाये न समझे किसी को मुकाबिल जो अपने वही देख शीशा बड़े सकपकाये भलाई किये जा इबादत समझ कर भले पीठ कोई नहीं थपथपाये खिली चाँदनी या बरसती घटा में तुझे सोच कर ये बदन थरथराये बनेगा सफल देश का वो ही नेता सुनें गालियाँ पर सदा मुसकुराये बहाने बहाने बहाने बहाने न आना था फिर भी हजारों बनाये गया...

रविवार, 25 जुलाई 2010

नव गीतिका...........................डॉ. वेद व्यथित

बहुत तन्हाईयाँ मुझ को भी तो अच्छी नही लगती परन्तु क्या करूं मुझ को यही जीना सिखाती हैं बहुत तन्हाइयों के दिन भुलाये भूलते कब हैं वह तो खास दिन थे जिन्हों की याद आती है यही तन्हाईयाँ तो आजकल मेरा सहारा हैं सफर में जब भी चलता हूँ हई तो साथ जाती हैं उन्होंने भूल कर के भी कभी आ कर नही पूछा यह तन्हाईयाँ ही हाल मेरा पूछ जाती हैं बहुत अच्छी हैं ये तन्हाईयाँ कैसे बुरा कह दूं इन्ही तन्हाइयों में तुम्हारी याद आती है यह तन्हाईयाँ मुझ से कभी भी दूर न जाएँ इन्ही के सहारे मेरी भी किस्ती पार जाती है इन्ही...

शनिवार, 24 जुलाई 2010

सिफर का सफ़र.................श्यामल सुमन

नज़र बे-जुबाँ और जुबाँ बे-नज़र हैइशारे समझने का अपना हुनर हैसितारों के आगे अलग भी है दुनियानज़र तो उठाओ उसी की कसर हैमुहब्बत की राहों में गिरते, सम्भलतेये जाना कि प्रेमी पे कैसा कहर हैजो मंज़िल पे पहुँचे दिखी और मंज़िल।ये जीवन तो लगता सिफर का सफ़र है।।रहम की वो बातें सुनाते हमेशादिखे आचरण में ज़हर ही ज़हर हैकई रंग फूलों के संग थे चमन मेंये कैसे बना हादसों का शहर हैहै शब्दों की माला पिरोने की कोशिशसुमन ये क्या जाने कि कैसा असर...

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

हिंदी के प्रति आपकी सोच सकारात्मक या नकारात्मक ? ...........(आलेख)...........भूतनाथ जी

  दोस्तों , बहुत ही गुस्से के साथ इस विषय पर मैं अपनीभावनाएं आप सबके साथ बांटना चाहता हूँ ,वो यह कि हिंदी के साथ आज जो कियाजा रहा है ,जाने और अनजाने हम सब ,जो इसके सिपहसलार बने हुए हैं,इसके साथजो किये जा रहे हैं....वह अत्यंत दुखद है...मैं सीधे-सीधे आज आप सबसे यहपूछता हूँ कि मैं आपकी माँ...आपके बाप....आपके भाई-बहन या किसी भी दोस्त-रिश्तेदार या ऐसा कोई भी जिसे आप पहचानते हैं....उसका चेहरा अगर बदल दूंतो क्या आप उसे पहचान लेंगे....???एक दिन के...

गुरुवार, 22 जुलाई 2010

याद आता है.......(कविता).................. सुमन 'मीत'

याद आता हैवो माँ का लोरी सुनानाकल्पना के घोड़े परपरियों के लोक ले जानाचुपके से दबे पांवनींद का आ जानासपनों की दुनियाँ मेंबस खो जाना ...खो जाना...खो जाना.................. याद आता हैवो दोस्तों संग खेलनाझूले पर बैठ करहवा से बातें करनाकोमल उन्मुक्त मन मेंइच्छाओं की उड़ान भरनाबस उड़ते जाना...उड़ते जाना...उड़ते जाना............. याद आता हैवो यौवन का अल्हड़पनसावन की फुहारेंवो महका बसंतसमेट लेना आँचल मेंकई रुमानी ख़ाबझूमना फिज़ाओं संगबस झूमते जाना...झूमते जाना...झूमते जाना............ याद आता हैवो हर गुजरा पलबस याद आता है...याद आता है...याद आता...

सामाजिक सरोकारों का संरक्षण आवश्यक है

सामाजिक सरोकारों का संरक्षण आवश्यक है डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर================ समाज की व्यवस्था के सुचारू रूप से संचालन के लिए इंसान ने परम्पराओं, मूल्यों, सरोकारों की स्थापना की। समय के सापेक्ष चलती व्यवस्था ने अपने संचालन की दृष्टि से समय-समय पर इनमें बदलाव भी स्वीकार किये। पारिवारिक दृष्टि से, सामाजिक दृष्टि से, आर्थिक दृष्टि से पूर्वकाल से अद्यतन सामाजिक व्यवस्थाएँ बनती बिगड़तीं रहीं। जीवन के सुव्यवस्थित क्रम में मूल्यों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। मानव विकास का ऐतिहासिक दृश्यावलोकन करें तो ज्ञात होगा कि अकेले-अकेले रहते आ रहे मानव...

बुधवार, 21 जुलाई 2010

आतंकवाद ...........(कविता)...........मीना मौर्या

न देखने लायक था आज वही मंजर देखा ,खुशियों से भरे घर में कुदरत का कहर बरसते देखा ,आतंक के आतंकियों से एक माँ के लाल को,आखिरी साँस तक लड़ते हुए मरते देखा .वर्षों के ख्वाब होने वाले थे पूरे,ऐसे सपनों को क्षण भर में बिखरते देखा ,.जीवन के दूसरे सफर की उसने की थी तैयारी ,उसके सीने में लगते हमने खंजर देखा ,खून के रंग में रंगा लाल- लाल खंजर देखा, एक माँ की आँखों में आँसूओं का समंदर देखा . दूल्हे के शेहरे का फूल यूँ ही था बिखरा ,उन फूलों को दुल्हन को अर्थी पर करते अर्पण देखा.रोते बिखलते बूढ़े एक बाप को,जवान बेटे का ढोते...

गजल.........................दीपक शर्मा

माफ़ कर दो आज देर हो गई आने में वक़्त लग जाता है अपनों को समझाने में।किरण के संग संग ज़माना उठ जाता है .देखना पड़ता है मौका छुप के आने में ।रूठ के ख़ुद को नहीं ,मुझको सजा देते हो क्या मज़ा आता है यूं मुझको तड़पाने में ।एक लम्हे में कोई भी बात बिगड़ जाती है उम्र कट जाती है उलझन कोई सुलझाने में ।तेरी ख़ुशबू से मेरे जिस्म "ओ"जान नशे में हैं "दीपक" जाए भला फिर क्यों किसी मयखाने में...

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

नई दुनिया ... नई उडान ... आओ बनाए ........ अलग पहचान ............(लेख).................मोनिका गुप्त.

कल मैने एक बस स्टाप पर पढा कि “यहाँ बस ठहरती है समय नही” .... सच, समय तो कभी नही रुकता. बस चलता ही रहता है. अब ये अपने उपर है कि हम इसका कितना इस्तेमाल कर पाते हैं ...इसमे कोई शक नही कि जमाना बदल रहा है. चारो तरफ बस बदलाव ही बदलाव है ... कोई भी क्षेत्र ले लो हर जगह यही हाल है. समय की माँग़ को देखते हुए आजकल पढाई पर भी बहुत जोर दिया जाने लगा है ..बहुत अच्छा लगता है यह सब देख कर. पर दुख तब होता है जब इतनी पढाई के बाद भी ढ्ग की नौकरी नही मिलती. खास कर लडकियो और महिलाओ के लिए तो और भी ज्यादा सोचने की बात हो जाती है ...ऐसे मे ना सिर्फ उन्हे घर बैठना...

रविवार, 18 जुलाई 2010

बरसात.............(कविता)......................सुमन 'मीत'

घना फैला कोहराकज़रारी सी रातभीगे हुए बादल लेकरफिर आई है ‘बरसात’ अनछुई सी कली है मह्कीबारिश की बूंद उसपे है चहकीभंवरा है करता उसपे गुंजनये जहाँ जैसे बन गया है मधुवन रस की फुहार से तृप्त हुआ मनउमंग से जैसे भर गया हो जीवन’बरसात’ है ये इस कदर सुहानीजिंदगी जिससे हो गई है रूमानी...

शनिवार, 17 जुलाई 2010

पावस गीत ---क्या हो गया..........डा श्याम गुप्त

इस प्रीति की बरसात में ,भीगा हुआ तन मन मेरा |कैसे कहें ,क्या होगया,क्या ना हुआ , कैसे कहें ||चिटखीं हैं कलियाँ कुञ्ज में ,फूलों से महका आशियाँ |मन का पखेरू उड़ चला,नव गगन पंख पसार कर ||इस प्रीति स्वर के सुखद से,स्पर्श मन के गहन तल में |छेड़ वंसी के स्वरों को ,सुर लय बने उर में बहे ||बस गए हैं हृदय-तल में ,बन, छंद बृहद साम के |रच-बस गए हैं प्राण में,   बन करके अनहद नाद से ||कुछ न अब कह पांयगे,सब भाव मन के खोगये,शब्द,स्वर, रस ,छंद सारे-सब तुम्हारे ही होगये ||अब हम कहैं या तुम कहो,कुछ कहैं या कुछ ना कहैं |प्रश्न उत्तर भाव सारे,प्रीति...

तस्वीर......................श्यामल सुमन

अगर तू बूँद स्वाती की, तो मैं इक सीप बन जाऊँकहीं बन जाओ तुम बाती, तो मैं इक दीप बन जाऊँअंधेरे और नफरत को मिटाता प्रेम का दीपकबनो तुम प्रेम की पाँती, तो मैं इक गीत बन जाऊँतेरी आँखों में गर कोई, मेरी तस्वीर बन जायेमेरी कविता भी जीने की, नयी तदबीर बन जायेबडी मुश्किल से पाता है कोई दुनियाँ में अपनापनबना लो तुम अगर अपना, मेरी तकदीर बन जायेभला बेचैन क्यों होता, जो तेरे पास आता हूँकभी डरता हूँ मन ही मन, कभी विश्वास पाता हूँनहीं है होंठ के वश में जो भाषा नैन की बोलेनैन बोले जो नैना से, तरन्नुम खास गाता हूँकई लोगों को देखा है, जो छुपकर के गजल गातेबहुत हैं...

बुधवार, 14 जुलाई 2010

पूजा की थाली हो गई................नीरज गोस्वामी

बात सचमुच में निराली हो गईंअब नसीहत यार गाली हो गई ये असर हम पर हुआ इस दौर काभावना दिल की मवाली हो गईडाल दीं भूखे को जिसमें रोटियांवो समझ पूजा की थाली हो गईतय किया चलना जुदा जब भीड़ से हर नज़र देखा, सवाली हो गयी कैद का इतना मज़ा मत लीजिये रो पड़ेंगे, गर बहाली हो गयी थी अमावस सी हमारी ज़िन्दगी मिल गये तुम, तो दिवाली हो गयी हाथ में क़ातिल के ‘‘नीरज’’ फूल हैबात अब घबराने वाली हो...

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

वरिष्ठ कवि अरुण कमल से अरविन्द श्रीवास्तव की बातचीत

आज के साहित्य में शोषितों यानी गरीबों की आवाज मद्धिम पड़ी है......वरिष्ठ कवि अरुण कमल से अरविन्द श्रीवास्तव की बातचीतः-अरविन्द श्रीवास्तव- भूमंडलीयकरण और बाजारवाद में आप युवा कवियों से क्या-क्या अपेक्षाएँ रखते हैं ?अरुण कमल- मुझे कभी किसी कवि से कोई अपेक्षा नहीं होती । कवि जो भी कहता है मैं उसे सुनता हूँ। अगर उसकी धुन मेरी धुन से , मेरे दिल की धड.कन से , मिल गयी तो उसे बार-बार पढ.ता हूँ।दूसरी बात यह कि युवा कवि कहने से आजकल प्रायः किसी ‘कमतर’ या...

रविवार, 11 जुलाई 2010

तन्हा-तन्हा आसमान क्यूँ है {गजल} सन्तोष कुमार "प्यासा"

हम खुद से अनजान क्यूँ हैज़िन्दगी मौत की मेहमान क्यूँ हैजिस जगह लगते थे खुशियों के मेलेआज वहां दहशतें वीरान क्यूँ हैजल उठता था जिनका लहू हमें देख करन जाने आज वो हम पर मेहेरबान क्यूँ हैजहाँ सूखा करती थी कभी फसलेवहां लाशों के खलिहान क्यूँ हैकभी गूंजा करती थी घरों में बच्चों की किलकारियांअब न जाने खुशियों से खाली मकान क्यूँ हैआखिर कौन कर सकता है किसीकी तन्हाई को दूरसूरज,चाँद और हजारों तारें है मगरतन्हा-तन्हा आसमान क्यों है....

मकान और घर..............(कविता)...........कीर्तिवर्धन

जिस दिन मकान घर मे बदल जायेगासारे शहर का मिजाज़ बदल जायेगा.जिस दिन चिराग गली मे जल जायेगामेरे गावं का अँधेरा छट जायेगा.आने दो रौशनी तालीम की मेरी बस्ती मेदेखना बस्ती का भी अंदाज़ बदल जाएगा.रहते हैं जो भाई चारे के साथ गरीबी मेखुदगर्जी का साया उन पर भी पड़ जाएगा.दौलत की हबस का असर तो देखना तन्हाई का दायरा "कीर्ति" बढ़ता जाएगा.उड़ जायेगी नींद सियासतदानो की जब आदमी इंसान मे बदल जा...

शनिवार, 10 जुलाई 2010

राष्ट्रवादी---श्यामल सुमन

तनिक बतायें नेताजी, राष्ट्रवादियों के गुण खासा।उत्तर सुनकर दंग हुआ और छायी घोर निराशा।।नारा देकर गाँधीवाद का, सत्य-अहिंसा क झुठलाना।एक है ईश्वर ऐसा कहकर, यथासाध्य दंगा करवाना।जाति प्रांत भाषा की खातिर, नये नये झगड़े लगवाना।बात बनाकर अमन-चैन की, शांति-दूत का रूप बनाना।खबरों में छाये रहने की, हो उत्कट अभिलाषा।राष्ट्रवादियों के गुण खासा।।किसी तरह धन संचित करना, लक्ष्य हृदय में हरदम इतना।धन-पद की तो लूट मची है, लूट सको तुम लूटो उतना।सुर नर मुनि सबकी यही रीति, स्वारथ लाई करहिं सब प्रीति।तुलसी भी ऐसा ही कह गए और तर्क सिखाऊँ कितना।।पहले "मैं" हूँ राष्ट्र...

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

वह सावंली सी लड़की ---(मिथिलेश दुबे)

तन पर लपेटे फटे व पुराने कपड़ेवह सांवली सी लड़की,कर रही थी कोशिश शायद ढक पाये तन को अपने,हर बार ही होती शिकार वहअसफलता और हीनता कासमाज की क्रूर व निर्दयी निगाहेंघूर रहीं थी उसके खुलें तन को,हाथ में लिए खुरपे सेचिलचिलाती धूप के तलेतोड़ रही थी वह पेड़ो से छालऔर कर रही थी जद्दोजहद जिंदगी से अपनेतन पर लपेटे फटे व पुराने कपड़ेवह सावंली सी लड़की...

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

कविता : मुझे बढ़ना ही होगा... ...............जोगिन्द्र रोहिल्ला ....

मुझे बढ़ना ही होगा :डगमग डगमग राहों पे ,मैं चला ही जा रहा हूँ ...कुछ ऊँची कुछ नीची राहों पेमैं बढ़ा ही जा रहा हूँ ...मैं चला था कल अकेला ,कोई आया कोई चला गया ,अंतर्द्वंद से कोई भरा रहा ,परमैं बढ़ता ही चला गया ...पीछे मुड के देखा जब ,अबकोई साथी ना दिख पायादेखा साथ में कौन है ....बस अपने को ही मैंने पाया ,आगे बढ़ने की सोची तोमंजिल एक नई चुनीसोचा चलना चाहिए अबसोचा बढ़ना चाहिए अबहाँ ,डगमग डगमग राहों पे ,मुझे बढ़ना ही होगा ...कुछ ऊँची कुछ नीची राहों पेमुझे बढ़ना ही होगा ...

बुधवार, 7 जुलाई 2010

गजल...........................................मीना मौर्या जी

(हिंदी साहित्य मंच को यह रचना डाक से प्राप्त हुई)दुनिया के दिल में हजारों की भीड़ देखी, हसते  हुए को दुआ और देते आशीष देखी. मतलबी इस दुनिया में रोते को हँसना गुनाह हैउन पर बहाए  कोई आंसू न रहम दिल देखी न चाहे फिर भी अँधेरे को पनाह घर में मिलता है किसी मजार पर जलता चिराग न सारी रात देखी संग जीने मरने के वादे दुनियां में बहुतों ने किये निकलते जनाजा न अब तक दोनों को साथ देखी गुमराह कर गए वो खुदा मेरे आशियाने को वे जिस्म में जान डाल दे ऐसा न हकीम देखीछोड़ जाती है रूह जिस्म बेजान हो...

प्रियतम होते पास अगर..............श्यामल सुमन

प्रियतम होते पास अगरमिट जाती है प्यास जिगरढ़ूँढ़ रहा हूँ मैं बर्षों सेप्यार भरी वो खास नजरटूटे दिल की तस्वीरों का देता है आभास अधरगिरकर रोज सम्भल जाएं तोबढ़ता है विश्वास मगरतंत्र कैद है शीतल घर मेंजारी है संत्रास इधरलोगों को छुटकारा दे दोबन्द करो बकवास खबरटूटे सपने सच हो जाएंसुमन हृदय एहसास ...

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

वो कल सुबह जाएगी.........................नीशू तिवारी

बहुत दिन नहीं हुआ जॉब करते हुए .....पर अच्छा लगता है खुद को व्यस्त रखना........शाम की कालिमा अब सूरज की लालिमा को कम कर रही थी ......मैं चुप चाप तकिये में मुह धसाए बहार उड़ रही धुल में अपनी मन चाही आकृति बना कर ( कल्पनाओं में ) खुश हो रहा था .........कभी प्रिया का हंसता चेहरा नजर आता .........तो दुसरे पल बदलते हवा के झोंकों के साथ आँखें नयी तस्वीर उतार लेती .......... बिलकुल वैसी ही .....जैसे वो मिलने पर( शर्माती थी ) करती थी.............अचानक आज इन यादों ने मेरी साँसों की रफ्तार को तेज़ कर दिया .........करवट बदलते हुए आखिरी मुलाकात के करीब...

रिश्ता खून का .........लेख...........मोनिका गुप्ता

.रक्तदान महादान....रक्तदान पूजा समान ...वगैरहा .. आमतौर पर इस तरह के नारे और स्लोगन सुनने को मिल ही जाते हैं पर आखिर रक्तदान इतना जरुरी है या ऐसे ही ...इस बात मे कोई दो राय नही है कि रक्त का कोई दूसरा विकल्प नही है यानि यह किसी फैक्टरी मे नही बनता और ना ही इंसान को जानवर का खून दिया जा सकता है ..यानि रक्त बहुत ही ज्यादा कीमती है. रक्त की मांग दिनो दिन बढ्ती ही जा रही है पर जागरुकता ना होने की वजह से लोग देने से हिचकिचाते हैं ..मसलन यह सोच कि कितने लोग तो रक्त दान करते ही हैं तो मुझे क्या जरुरत है ..या भई, मेरा ब्लड तो बहुत आम है ये तो किसी का भी...

रविवार, 4 जुलाई 2010

भूख ............कविता.............सुनीता कृष्णा

भूख तू बार बार क्यों है आतीरह रह कर मुझे सताती सोते से मुझे जगाती विचारों को मेरे झकझोरती क्या कुछ याद दिलाना चाहती ?एक दिन न खा सकी तो रात भर न सो सकी अब सोचने पर मजबूर भूखा कोई सो रहा सुदूर सोचने पर हूँ विवश लाखों कैसे सो जाते बेबस ?भूख तो उन्हें भी सताती होगीक्या पानी भूख मिटाती  होगी खली पेट तो पानी भी नहीं सुहाता उपाय कोई तो होगा बस पाना है रास्ता  छाणिक चमक धमक हमें लुभाती और बुध्ही भ्रष्ट हो जाती फसल तो उगती धरा पर...

शनिवार, 3 जुलाई 2010

बचपन........कविता............श्यामल सुमन

याद बहुत आती बचपन की।उमर हुई है जब पचपन की।।बरगद, पीपल, छोटा पाखर।जहाँ बैठकर सीखा आखर।।संभव न था बिजली मिलना।बहुत सुखद पत्तों का हिलना।।नहीं बेंच, था फर्श भी कच्चा।खुशी खुशी पढ़ता था बच्चा।।खेल कूद और रगड़म रगड़ा।प्यारा जो था उसी से झगड़ा।।बोझ नहीं था सर पर कोई।पुलकित मन रूई की लोई।।बालू का घर होता अपना।घर का शेष अभीतक सपना।।रोज बदलता मौसम जैसे।क्यों न आता बचपन वैसे।।बचपन की यादों में खोया।सु-मन सुमन का फिर से रोय...

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

रिश्ते बंद है आज चंद कागज के टुकड़ो में.....................नीशू तिवारी

रिश्ते बंद है आजचंद कागज के टुकड़ो में,जिसको सहेज रखा है मैंनेअपनी डायरी में,कभी-कभी खोलकरदेखता हूँ उनपर लिखे हर्फों कोजिस पर बिखरा हैप्यार का रंग,वे आज भी उतने ही ताजे हैजितना तुमसे बिछड़ने से पहले,लोग कहते हैं कि बदलता है सबकुछसमय के साथ,परये मेरे दोस्तजब भी देखता हूँगुजरे वक्त को,पढ़ता हूँ उन शब्दो कोजो लिखे थे तुमने,गूजंती है तुम्हारीआवाज कानो में वैसे ही,सुनता हूँ तुम्हारी हंसी कोऐसे मे दूर होती है कमी तुम्हारी,मजबूत होती हैरिश्तो की डोरइन्ही...

बहते आंसू {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

देख रहा हूँ मै वेदना की वृष्टि ने तुम्हारे धैर्य के बांध को तोड़ दिया है उर का विषाद पलकों पर भारी है तुम ममता के बन्धनों को तोड़ चुकी हो ये महज़ बहते आंसू नहीं ये प्रवाह है प्रलय का विनाश का हे नारी ! अब तुम सहनशीलता के सभी बंधन पार कर चुकी हो सूख गए है बहते आंसू ! अब परम्पराओं के बंधन तुम्हे और अधिक नहीं रोक सकते अब इज्ज़त आबरू की बेढीया तुम्हारे अस्तित्व को नहीं बांध सकती अब तुम चंडी बन चुकी हो समाज के खोखले नियम अब तुम पर लागू नहीं है तुमने मज़बूरी को अश्रुओं संग बहा दिया है अब तुम्हारे आँखों से मर्माग्नी...

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

.कविता .......................लोकेश उपाध्याय

मेरे दर्द का ,किसी को एहसास नहीं ,इस ज़माने में , कोई मेरे साथ नहीं ,क्या हुआ क्यों भीड़ में तन्हा हूँ ,क्यों खुशियों को मै रास नहीं ,मेरे दर्द का ,किसी को एहसास नहीं ,इस ज़माने में , कोई मेरे साथ नहीं ,क्या हुआ क्यों भीड़ में तन्हा हूँ ,क्यों खुशियों को मै रास नहीं ,इस ज़माने में , कोई मेरे साथ न...