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सोमवार, 31 मई 2010

क्यूकी बाप भी कभी बेटा था ......संतोष कुमार "प्यासा"

एक जमाना था जब लड़के अपने घर के बड़े बुजुर्गों का कहना सम्मान करते थे उनका कहा मानते थे ! कोई अपने पिता से आंख मिलाकर बात भी नहीं करता था ! उस समय कोई अपने पिता के सामने कुर्सी या पलंग पर भी नहीं बैठता था ! तब प्यार जैसी बात को अपने बड़े बुजुर्गों से बंटाना "बिल्ली के गले में घंटी बाधने" जैसा था ! प्रेम-प्रसंग तो सदियों से चला आ रहा है ! लेकिन पहले के प्रेम में मर्यादा थी ! उस समय यदि किसी के पिता को पता चल जाता था की उसका बेटा या बेटी किसी से नैन लड़ाते( प्रेम करते) घूम रहे है तो समझों की उस लड़के या लड़की की शामत आ गई ! पिता गुस्से में लाल पीला...

रविवार, 30 मई 2010

अस्पताल बीमार..................श्यामल सुमन

पैरों की तकलीफ से वो चलती बेहाल।किसी ने पीछे से कहा क्या मतवाली चाल।।बी०पी०एल० की बात कम आई०पी०एल० का शोर।रोटी को पैसा नहीं रन से पैसा जोड़।।दवा नहीं कोई मिले डाक्टर हुए फरार।अब बीमार जाए कहाँ अस्पताल बीमार।।भूल गया मैं भूल से बहुत बड़ी है भूल।जो विवेक पढ़कर मिला वही दुखों का मूल।।गला काटकर प्रेम से बन जाते हैं मित्र।मूल्य गला है बर्फ सा यही जगत का चित्र।।बातों बातों में बने तब बनती है बात।फँसे कलह के चक्र में दिखलाये औकात।।सोने की चाहत जिसे वह सोने से दूर।मधुकर सुमन के पास तो होगा मिलन जरू...

शनिवार, 29 मई 2010

लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है..? (गजल)..........नीरज गोस्वामी

खौफ का जो कर रहा व्यापार है आदमी वो मानिये बीमार है चार दिन की ज़िन्दगी में क्यूँ बता तल्खियाँ हैं, दुश्मनी, तकरार है जिस्म से चल कर रुके, जो जिस्म पर उस सफ़र का नाम ही, अब प्यार है दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ दोस्तों के हाथ में तलवार है लुत्फ़ है जब राह अपनी हो अलग लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है ज़िन्दगी भरपूर जीने के लिए ग़म, खुशी में फ़र्क ही बेकार हैबोल कर सच फि़र बना 'नीरज' बुराक्या करे...

घर से बाहर {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

ठिठक जाता है मन मुश्किल और मजबूरीवश निकालने पड़ते है कदम घर से बाहर ढेहरी से एक पैर बाहर निकालते ही एक संशय, एक शंदेह बैठ जाता है मन में की आ पाउँगा वापस, घर या नहीं जिस बस से आफिस जाता हूँ कहीं उसपर बम हुआ तो......... या रस्ते में किसी दंगे फसाद में भी....... फिर वापस घर के अन्दर कर लेता हूँ कदम बेटी पूंछती है पापा क्या हुआ ? पत्नी कहती है आफिस नहीं जाना क्या ? मन में शंदेह दबाए कहता हूँ एक गिलाश पानी........ फिर नजर भर देखता हूँ बीवी बच्चों को जैसे कोई मर्णोंमुख देखता है अपने परिजनों को पानी पीकर निकलता हूँ घर से बाहर सोंचता...

शुक्रवार, 28 मई 2010

दोस्त.....................(कविता).................अनुराधा शेषाद्री

ऐ दोस्त तेरी दोस्ती का रिश्ता बहुत गहरा हैन जाने किस उम्मीद पर दिल ठहरा हैऐ दोस्त यह रूह से रूह की गहराईयों का रिश्ता हैजो रिश्तों से परे मोहब्बत की डोर से बंधा हैऐ दोस्त यह एक प्यारा सा मासूमियत का रिश्ता हैजिसमे रूठकर मनाने का एक सिलसिला हैऐ दोस्त यह पाक इरादों का रिश्ता हैजिसमे दिल हर वक्त तेरी खुशियों की दुआ करता हैऐ दोस्त यह एक गुमनाम सा रिश्ता हैजो लोगों की रुस्वायिओं से डरता हैऐ दोस्त यह तेरा नहीं न ही मेरा रिश्ता हैयह तो उस खुदा का प्यारा सा रिश्ता हैऐ दोस्त यह दूरियों और फासलों से परे का रिश्ता हैजिसमे हरदम तू ही तू मेरे पास हुआ करता हैऐ...

गुरुवार, 27 मई 2010

हस्ताक्षर .......(कविता).......संगीता स्वरुप

वातानुकूलित कक्ष मेंबैठ करतुम करते हो फैसलेउन जिंदगियों केजिनकी किस्मत मेंबदबूदार बस्तियां हैंकर देते होहस्ताक्षरउन्हें ढहाने केजिनकी ज़िन्दगी मेंकेवल झोपड़ - पट्टियाँ हैं.क्यों कितुम्हारी नज़र मेंशहर को सुन्दर बनानाज़रूरी हैपर येझुग्गी - झोपडियांउनकी मजबूरी है.मन और कक्ष तुमसदैव बंद रखते होइसीलिए तुमऐसे फैसले कर देते होज़रा अपनेमन और कमरे केगवाक्षों को खोलोऔर उनकी ज़िन्दगी केगवाह बनो .जिस दिन तुमउनकी ज़िन्दगीजान जाओगेअपने फैसले परपछताओगे .कलम तुम्हारारुक जायेगामन तुम्हारापीडा सेभर जायेगाऔर खुद के कियेहस्ताक्षर परतुम्हारा ह्रदयधिक्कार कर रह जाएगा...

बुधवार, 26 मई 2010

सत्संग********* {लघुकथा} *************सन्तोष कुमार "प्यासा"

कल ही एक मित्र मेरे पास आए और बोले "शहर में एक बड़े ही पहुंचे हुए पंडित जी आएं है ! वे बड़े ही ज्ञानवान समाजसेवी और नेक ह्रदय के व्यक्ति हैं ! १५ दिन से शहर में उनका सत्संग चल रहा है !" तो मै क्या करूँ जी वैसे भी आपको ज्ञेय हैं की मुझे सत्संग वत्संग में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है ! मैंने उनसे कहा ! फिर भी, चलिए जी घूम आइएगा, वैसे भी घर पर क्या करेंगे ! उन्होंने कहा ! उनके अनुरोध पर मैंने सोंचा "चलो भई घूम आते है !" हम दोनों सत्संग स्थल की और रवाना हुए ! कुछ ही देर में सत्संग स्थल पहुँच गए ! सत्संग स्थल में भव्य सजावट थी ! जगह जगह पर गेंदा गुलाब के...

मंगलवार, 25 मई 2010

बच्चों की प्रतिभा दिखाने का सबसे अच्छा माध्यम है इटंर नेट.........(बाल साहित्य).....मोनिका गुप्ता

जी हाँ, आजकल नेट का क्रेज लोगो मे बहुत ज्यादा हो रहा है खासकर बच्चे तो इसे बहुत पसंद करने लगे है क्या कुछ नही है इस पिटारे मे. चंद सैकिंडो मे दुनिया सामने होती है. अब अगर आप यह सोचने लगे कि इसमे अच्छाईयाँ कम और बुराईया ज्यादा है क्योकि इसके आने के बाद से बच्चे बिगडने लगे हैं. गलत गलत साईट देखते हैं तो मै यह जानना चाहती हूँ कि इसका मतलब तो यह हुआ कि इंटर नेट के आने से पहले बच्चे बिगडते ही नही थे. गाय बने चुपचाप बैठे रहते थे. तब भी आपका जवाब ना मे ही होगा.तो आखिर आप चाहते क्या है ...... अगर हर बात मे नकारात्मक सोच रखेगे तो नतीजे भी वैसे ही...

बचपन ************* {कविता} ********* सन्तोष कुमार "प्यासा"

आनंद की लहरों में हिलोरें खाने वाला जीवन मानव का प्राकृतिक से होता है पहला मिलन ना गृहस्थी का भार ना जमाने का फिक्र , ना खाने कमाने का फिक्र निश्चिन्तता के आँगन में विचरता है बचपन प्राकृतिक की गोद में बैठता जब वह  सुकुमार  पड़ी रहती कदमों में उसके  खुशियाँ अपार होता है वह अपने बचपन का विक्रम दूर रहतें है उससे ज़माने के सारे भ्रम न देता वह ख़ुद को कभी झूठी दिलाशा ना रहता कभी वह किसी चाहत और खुशी का "प्यासा" ***********************************************...

रविवार, 23 मई 2010

हकीकत .....ग़ज़ल ......कवि दीपक शर्मा

मैं भी चाहता हूँ की हुस्न पे ग़ज़लें लिखूँमैं भी चाहता हूँ की इश्क के नगमें गाऊंअपने ख्वाबों में में उतारूँ एक हसीं पैकरसुखन को अपने मरमरी लफ्जों से सजाऊँ ।लेकिन भूख के मारे, ज़र्द बेबस चेहरों पेनिगाह टिकती है तो जोश काफूर हो जाता हैहर तरफ हकीकत में क्या तसव्वुर में फकत रोटी का है सवाल उभर कर आता है ।ख़्याल आता है जेहन में उन दरवाजों काशर्म से जिनमें छिपे हैं जवान बदन कितने जिनके तन को ढके हैं हाथ भर की कतरनजिनके सीने में दफन हैं , अरमान कितने जिनकी डोली नहीं उठी इस खातिर क्योंकिउनके माँ-बाप ने शराफत की कमाई हैचूल्हा एक बार ही जला...

--प्रेम काव्य--प्रेम परक अनुपम काव्य संग्रह

(---पुस्तक --प्रेम काव्य , रचनाकार- डा श्याम गुप्त, प्रकाशक-- प्रतिष्ठा साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्था, आलम बाग़ , लखनऊ , समीक्षक --श्री विनोद चन्द्र पाण्डेय 'विनोद' IAS , पूर्व निदेशक, हिन्दी संस्थान ,लखनऊ, उ. प्र.)  उत्तर रेलवे चिकित्सालय लखनऊ में वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक पद से सेवा-निवृत्त डा श्याम गुप्त हिन्दी के लब्ध-प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं | विशेष रूप से काव्य-विधा में उनका महत्वपूर्ण योगदान रेखांकित करने योग्य है | उनकी अनेक काव्य कृतियों का प्रकाशन हो चुका है | इसी श्रृंखला में 'प्रेम काव्य' की प्रस्तुति स्वागत योग्य है...

शनिवार, 22 मई 2010

सीख................(गजल).................श्यामल सुमन

रो कर मैंने हँसना सीखा, गिरकर उठना सीख लिया।आते-जाते हर मुश्किल से, डटकर लड़ना सीख लिया।। महल बनाने वाले बेघर, सभी खेतिहर भूखे हैं।सपनों का संसार लिए फिर, जी कर मरना सीख लिया।। दहशतगर्दी का दामन क्यों, थाम लिया इन्सानों ने।धन को ही परमेश्वर माना, अवसर चुनना सीख लिया।।रिश्ते भी बाज़ार से बनते, मोल नहीं अपनापन का। हर उसूल अब है बेमानी, हँटकर सटना सीख लिया।। फुर्सत नहीं किसी को देखें, सुमन असल या कागज का।जब से भेद समझ में आया, जमकर लिखना सीख लिय...

शुक्रवार, 21 मई 2010

गर चाहते हो ...........(कविता)...........संगीता स्वरुप

दिया तोजला लिया हैहमने ज्ञान कापर आँख मेंमोतियाबिंदलिए बैठे हैं .रोशनी की कोईमहत्ता नहींजब मन में अन्धकारकिये बैठे हैं .आचार है हमारे पासपरव्यवहार की कमी हैचाहते हैं पानाबहुत कुछपर हम मुट्ठीबंद किये बैठे हैं .चाहते हैंसिमट जायेहथेलियों मेंसारा जहाँजबकिहम खुद हीकर - कलमकिये बैठे हैं .चाहते हैं पानानेह कीसुखद अनुभूतिलेकिनहृदय - पटलबंद किये बैठे हैं ..गर चाहते हो किऐसा सब होतो --खोल दोसारे किवाड़आने दो एकशीतल मंद बयारमन - आँगनबुहार दोनयन खोलदिए मेंतेल डाल दोमोतियाबिंदहटा दोहृदय के पट खोलोप्रेम को बांटोबाहें फैलाओऔर जहाँ को समेट लो .....**********...

विचारो का सूरज {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा"

कुछ दिन पहले मैंने न लिखने का निर्णय लिया था ! जिसे निभा नहीं पाया और फिर से उठा ली कलम ! विचारो का सूरज विपत्तिओं की बदली में खो गया छुप गए शब्द सुनकर आशंकाओं की गडगडाहट भावनाओं की तीव्र वृष्टि बहा ले गई सारे सन्दर्भ डरा सहमा है मन सोंचता है अब बचा भी क्या है क्या लिखूं ? कैसे लिखूं ? किसके लिए लिखूं ? शायद खुद से हार चुका है मन एक अर्थहीन निर्णय लिया मन ने निर्णय, न लिखने का ! पर पता नहीं क्यूँ कुछ दिन भी कायम न रह सका निर्णय पर लोगों की बातें बिच्छु की भांति डंक मार रही हैं कुछ अनजाने विचार कौंधते है मन में...

गुरुवार, 20 मई 2010

ढलती शाम..............(कविता).......... सुमन 'मीत'

अकसर देखा करती हूँशाम ढलते-2 पंछियों का झुंड सिमट आता है एक नपे तुले क्षितिज में उड़ते हैं जो दिनभर खुले आसमां में अपनी अलबेली उड़ान पर.... शाम की इस बेला में साथी का सानिध्यपंखों की चंचलताउनकी स्वर लहरी प्रतीत होती एक पर्व सीउनके चुहलपन से बनती कुछ आकृतियां और दिखने लगतामनभावन चलचित्र फिर शनै: शनै: ढल जाता शाम का यौवन उभर आते हैंखाली गगन में कुछ काले...

बुन्देली लोकसंस्कृति और बुन्देली लोकभाषा का संरक्षण अपरिहार्य

बुन्देली लोकसंस्कृति और बुन्देली लोकभाषा का संरक्षण अपरिहार्य किसी भी क्षेत्र के विकास में उस क्षेत्र संस्कृति की अहम् भूमिका रहती है। संस्कृति, भाषा, बोली आदि के साथ-साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, लोकसाहित्य, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकविश्वासों, लोकरंजन के विविध पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सांस्कृतिकता का, ऐतिहासिकता का लोप होने, उसके विनष्ट होने से उस क्षेत्र में विकास की गति और भविष्य का उज्ज्वल पक्ष कहीं दूर तिरोहित होने...

बुधवार, 19 मई 2010

ये मौसम का जादू है ...(लेख).............मोनिका गुप्ता

जी हाँ, मौसम भी हमारे जीवन मे जाने अंजाने जादू करता है हमारे मन को खुश, उदास या कभी थिरकने और नाचने पर मजबूर कर देता है. आप मान लिजिए कि आप आफिस जा रहे हैं जबरदस्त गरमी है उस वजह से आपको ना सिर्फ गुस्सा आएगा बलिक सड्क पर बेवजह पसीना पोछ्ते आप किसी से भी लडाई कर बैठेगें. उसे धमकी भी दे डालेगे पर इसी स्थिती मे अगर मौसम साफ ना हो यानि आकाश मे बाद्ल हो. गरमी के मौसम मे ठंडी हवा चल रही हो तो यकीनन आपका सीटी बजाता गुनगुनाता मन उसे बिना कुछ् कहे मुस्कुरा कर आगे बढ जाएगा. बात सिर्फ यही खत्म नही होती .बरसात का ये मतलब भी नही निकालना चाहिए कि मन...

क्या खूब सच बोलने का अंजाम हो रहा है --------- {कविता} -------- सन्तोष कुमार "प्यासा"

जो उचित नहीं है हर जगह वो काम हो रहा है कल तक था जिसपर सबको भरोसा आज वही बेवजह बदनाम हो रहा है होना था जिस काम को परदे में पता नहीं क्यों सरेआम हो रहा है दुनिया में बढ़ रही है आबादी इस कदर जमी को छोडिये, अजी आसमां नीलाम हो रहा है बईमानी और घूसखोरी की चल पड़ी प्रथा ऐसी जो जितना बदनाम है, उसका उतना नाम हो रहा है कही मर रहे है भूख से लोग तो किसी के यहाँ खा पीकर आराम हो रहा है झूठ बोलना पाप है इतना तो सुना था क्या खूब सच बोलने का अंजाम हो रहा है...

मंगलवार, 18 मई 2010

तुम्हारी खामोशियाँ .......(गजल)................अनामिका (सुनीता)

आज ये खामोशियाँ सिमटती क्यों नहींहाल-ऐ-दिल आपके लब सुनते क्यों नहीं..कभी तो फैला दो अपनी बाहों का फलकमेरी आँखों की दुआ तुम तक जाती क्यों नहीं..दर्द-ऐ-दिल बार-बार पलकों को भिगो जाता है ...आपका खामोश रहना मुझे भीतर तक तोड़ जाता है..मुहोब्बत मेरी जिंदगी की मुझसे रूठने लगी है ..अंधेरे मेरी जिंदगी की तरफ़ बढ़ने लगे है..बे-इंतिहा मुहोब्बत का असर आज होता क्यों नहीं..मेरी आत्मा में बसे हो तुम, ये तुम जानते क्यों नहीं..दिन-रात मेरी दुआओ में तुम हो ये तुम...

प्यार *************** {कविता} *************** सन्तोष कुमार "प्यासा"

प्यार {कविता} सन्तोष कुमार "प्यासा" लोग कहते है की प्यार सिर्फ एक बार होता है ! लेकिन जब भी मै तुम्हे सपनो में पाता हूँ या किसी कारणवश उदास हो जाता हूँ जब भी मै तुम्हे सुनता हूँ या तन्हाइयों में सपने बुनता हूँ जब तुम्हे देखता हूँ या खामोशियों में तुम्हे महसूस करता हूँ मुझे हर बार तुमसे प्यार हो जाता है गहरा और गहरा...

सोमवार, 17 मई 2010

जो वो आ जाए एक बार ***** {कविता} ***** सन्तोष कुमार "प्यासा"

जो वो आ जाए एक बार ***** {कविता} ***** सन्तोष कुमार "प्यासा" इस कविता को मैंने "महादेवी वर्मा" की कविता "जो तुम आ जाते एक बार" से, प्रेरित होकर लिखा है ******************************* घनीभूत पीड़ा में ह्रदय डूबा अश्रुओं संग बह रहा विषाद जल बिन मीन तडपे जैसे तडपाए, प्रेम उन्माद फिर सजीव हो जाए आसार जो वो आ जाएं एक बार ****************************** उसे पाने की बढ़ी लालसा ऐसी पल पल होती चाहत प्रखर ह्रदय के कोरे पृष्ठों में लिख दो आकर, प्रिताक्षर मेरे मन के उपवन में छा जाए बहार जो वो आ जाएं एक बार ******************************* अलि...

रविवार, 16 मई 2010

स्पेस-.............. कहानी.................मानोशी जी

एक प्रवासी लेखकों की किताब के लिये, कहानी लिखने का हुक्म पूरा करने ये कहानी लिखी गई। प्रवास की सॆटिंग में लिखी कहानी-स्पेस"बड़े दुख से गुज़री हो तुम, है न? सच बड़ा कठिन समय रहा होगा"। उसे नहीं चाहिये थी सहानुभूति। साइको थेरैपी के लिये कई जगह जा चुकी थी वो। " क्या आप मेरी मदद कर सकती है? मुझ आगे बढ़ना है। मैं रोने नहीं आई हूँ यहाँ।" ये कह कर हर बार वापस आ गई थी वो। क्या कोई नहीं था जो उसकी मदद कर सकता था? उसके दर्द को समझ सकता था? आज डा. जोन्स के साथ थी अपाइंटमेंट, थेरैपी की। फिर एक बार कहानी बयान करनी होगी....ज़ुकाम से सर भारी था। दफ़्तर नहीं जाना चाहती...

टुकड़े टुकड़े ख्वाब ....(कविता)............संगीता स्वरुप

गर्भ -गृह से आँखों की खिड़की खोल पलकों की ओट से मेरे ख़्वाबों ने धीरे से बाहर झाँका कोहरे की गहन चादर से सब कुछ ढका हुआ था .धीरे धीरे हकीक़त के ताप ने कम कर दी गहनता कोहरे की और ख़्वाबों ने डर के मारे बंद कर लीं अपनी आँखे .क्यों कि -उन्हें दिखाई दे गयीं थी एक नवजात कन्या शिशु जो कचरे के डिब्बे में निर्वस्त्र सर्दी से ठिठुर दम तोड़ चुकी थी .******************************...

नव जीवन ********* {कविता} ********** सन्तोष कुमार "प्यासा"

ओर से छोर तक बादलों का विस्तार ललित फलित मनभावन संसार गूँज रहा दिग-दिगंत तक कोयल का मधुर स्वर बह रही दसो दिशाओं में खुशियों की लहर हो रहा आनंद का उदगम, ये अदभुत क्षण है अनुपम आशाओं के गगन से सुधा रही बरस तृप्त हुए सभी, चख कर ये सरस रस टूट रहा जाति, पाति का झूठा भ्रम उदित हुआ सूर्य लेकर नव जीवन   सौहार्द की बूंदों में, मिलकर भीगे...

शनिवार, 15 मई 2010

और वह मर गया ......(कविता ) .....कुमार विश्वबंधु

उसने चाहा था घरबना मकानखप गयी जिंदगीवह सुखी  होना चाहता थाइसलिए मारता रहा मच्छरमक्खी, तिलचट्टे ...फांसता रहा चूहेस‌फर में जैसे डूबा रहे कोई स‌स्ते उपन्यास में कोईकि यूं ही बेमतलब कट गयी उम्रअनजान किसी  रेलवे स्टेशन परकोई कुल्हड़ में पिये फीकी चाय और भूल जाएवह भूल गया जवानी के स‌पनेआदर्श, क्रांतिकारी योजनाएँ उस लड़की का चेहराविज्ञापन  के बाजार मेंवह बिकता रहालगातार बेचता रहा ------अपने हिस्से की धूपअपने हिस्से की चाँदनीऔर मर गया...

कविता-----कविताई का सत्य.......डा श्याम गुप्त

जिनकी कविता में नहीं,कोई कथ्य व तथ्य |ऐसी कविता में कहाँ , श्याम ढूंढिए सत्य ||तुकबंदी करते रहें , बिना भाव ,उद्देश्य |देश धर्म औ सत्य का,नहीं कोई परिप्रेक्ष्य ॥काव्य कला सौन्दर्य रस, रटते रहें ललाम।जन मन के रस भाव का ,नहीं कोई आयाम॥गूढ शब्द पर्याय बहु, अलन्कार भरमार ।ज्यों गदही पर झूल हो, रत्न जटित गलहार ॥कविता वह है जो रहे, सुन्दर सरल सुबोध ।जन मानस को कर सके, हर्षित प्रखर प्रबोध ।अलन्कार रस छंन्द सब, उत्तम गहने जान ।काया सच सुन्दर नहीं, कौन करेगा मान ॥नारि दर्शना भव्य मन, शुभ्र सुलभ परिधान ।भाल एक बिन्दी सहज़, सब गहनों की खान ॥स्वर्ण अलन्क्रित...

शुक्रवार, 14 मई 2010

मैं लाकर गुल बिछाता हूं.............(गजल)............नीरज गोस्वामी

तुझे दिल याद करता है तो नग्‍़मे गुनगुनाता हूँजुदाई के पलों की मुश्किलों को यूं घटाता हूंजिसे सब ढूंढ़ते फिरते हैं मंदिर और मस्जिद मेंहवाओं में उसे हरदम मैं अपने साथ पाता हूंफसादों से न सुलझे हैं, न सुलझेगें कभी मसलेहटा तू राह के कांटे, मैं लाकर गुल बिछाता हूंनहीं तहजीब ये सीखी कि कह दूं झूठ को भी सचगलत जो बात लगती है गलत ही मैं बताता हूंमुझे मालूम है मैं फूल हूं झर जाऊंगा इक दिनमगर ये हौसला मेरा है हरदम मुस्‍कुराता हूंनहीं जब छांव मिलती है कहीं भी राह में मुझकोसफर में अहमियत मैं तब शजर की जान जाता हूंघटायें, धूप, बारिश, फूल, तितली, चांदनी 'नीरज'तुम्‍हारा...

एक कोशिश ......(कविता).............. संगीता स्वरुप

रात की स्याही जबचारों ओर फैलती हैगुनाहों के कीड़े ख़ुद -ब -ख़ुदबाहर निकल आते हैंचीर कर सन्नाटा रात के अंधेरे काएक के बाद एक येगुनाह करते चले जाते हैं।इनको न ज़िन्दगी से प्यार हैऔर न गुनाहों से है दुश्मनी ज़िन्दगी का क्या मकसद है ये भी नही पहचानते हैं।रास्ता एक पकड़ लिया है जैसे बस अपराध का उस पर बिना सोचे ही बढ़ते चले जाते हैं।कभी कोई उन्हें सही राह तो दिखाए ये तो अपनी ज़िन्दगी बरबाद किए जाते हैं।चाँद...

गुरुवार, 13 मई 2010

अच्छा लगा.........(ग़ज़ल )....श्यामल सुमन जी

हाल पूछा आपने तो पूछना अच्छा लगाबह रही उल्टी हवा से जूझना अच्छा लगादुख ही दुख जीवन का सच है लोग कहते हैं यहीदुख में भी सुख की झलक को ढ़ूँढ़ना अच्छा लगाहैं अधिक तन चूर थककर खुशबू से तर कुछ बदनइत्र से बेहतर पसीना सूँघना अच्छा लगारिश्ते टूटेंगे बनेंगे जिन्दगी की राह मेंसाथ अपनों का मिला तो घूमना अच्छा लगाकब हमारे चाँदनी के बीच बदली आ गयीकुछ पलों तक चाँद का भी रूठना अच्छा लगाघर की रौनक जो थी अबतक घर बसाने को चलीजाते जाते उसके सर को चूमना अच्छा लगादे...

नारी........(कविता)............अक्षय-मन

1बन आहुति श्रंगार करूं अपने हाथों अपनी अर्थीहालातों की चिता है और अग्नि बन जाये मज़बूरीआखरी समय है मेरा या है आखरी ये जुल्म तेरादोनों में से कुछ तो हो जीवित हूं पर हूं मरी-मरी२मान रखूं मैं उनका भी जिनसे हुई अपमानित मैंजीत कर भी हारूं पल-पल तुमसे हुई पराजित मैंकिसकी थी किसकी हुई रिश्तों में आज बांटी गईकौन है मेरा मैं किसकी टुकडो में हुई विभाजित मैं !!३मेरी व्यथा भी सुनलो आज खामोश खड़ी हूं कब से मैंमन में सोचूं दिल में छुपा लूं खामोश खड़ी हूं कब से मैंएक...

"प्रेम", "प्रकृति" और "आत्मा"---- {एक चिंतन} ---- सन्तोष कुमार "प्यासा"

सृष्टि अपने नियम पूर्वक अविरल रूप से चल रही है ! सृष्टि अपने नियम पर अटल है, किन्तु वर्तमान समय में मनुष्य के द्वारा कई अव्यवस्थाए फैलाई जा रही है ! मनुष्य सृष्टि के नियमो के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर रहा है ! मनुष्य अपनी अग्यांताओ के कारण उन चीज़ों को प्रधानता दे रहा है जिसको "प्रेम, प्रक्रति, और आत्मा" ने कभी बनाया ही नहीं था ! जाती धर्म, मजहब, देश, राज्य, क्षेत्र और भाषा के नाम पर मनुष्य एक दूसरो को मारने पर तुला है !वर्तमान समय में मनुष्य की बुद्धि इतनी ज्यादा भ्रमित हो गई है की वह दो प्रेमियों के प्रेम से ज्यादा अपने द्वारा बनाए गए झूठे आदर्शो...

बुधवार, 12 मई 2010

कुछ क्षणिकाएं..........मनोशी जी

दो अश्रुएक अश्रु मेराएक तुम्हाराठहर कर कोरों परकर रहे प्रतीक्षाबहने कीएक साथरातपिघलती जाती हैक़तरा क़तरासोना बन कर निखरने को,कसमसाती हैज़र्रा ज़र्राफूल बन कर खिलने को,हर रोज़रातदो बातेंदो बातें,एक चुपएक मौनकर रहे इंतज़ारएक कहानी बनने कीअजनबीचलो फिर बन जायें अजनबीएक नये अनजाने रिश्ते मेंबँध जायें फिर,नया जन्म लेने कोसप्तऋषिजुड़ते हैं रोज़कई कई सितारेबनाने एक सप्तऋषिहर रातहमारे बिछड़ने के ...

नज़्म ....कवि दीपक शर्मा

बात घर की मिटाने की करते हैंतो हजारों ख़यालात जेहन में आते हैंबेहिसाब तरकीबें रह - रहकर आती हैंअनगिनत तरीके बार - बार सिर उठाते हैं ।घर जिस चिराग से जलना हो तोलौ उसकी हवाओं मैं भी लपलपाती हैना तो तेल ही दीपक का कम होता हैना ही तेज़ी से छोटी होती बाती है ।अगर बात जब एक घर बसाने की हो तोबमुश्किल एक - आध ख्याल उभर के आता हैतमाम रात सोचकर बहुत मशक्कत के बादएक कच्चा सा तरीका कोई निकल के आता है ।वो चिराग जिससे रोशन घरोंदा होना हैशुष्क हवाओं में भी लगे...

बुढिया -------- {लघुकथा} ----------- सन्तोष कुमार "प्यासा"

कल शाम को पढने के बाद सोंचा कुछ सब्जी ले आई जाए ! यही उद्देश्य लेकर सब्जी मंडी पहुँच गए ! मंडी में बहुत भीड़ थी ! दुकानदार चिल्ला-चिल्ला कर भाव बता रहे थे ! सब अपनी अपनी सुध में थे ! तभी मेरी नजर एक ऐसे स्थान पर पड़ी जहां पर सड़ी सब्जिओं का ढेर पड़ा था ! जिसके पास करीब ५५-६० वर्ष की एक वृद्धा बैठी थी ! उसके उसके पूरे बाल चाँदी के रंग के थे ! चेहरे पर अजीब सी शिकन और चिंता की लकीरे साफ़ झलक रही थी ! तन पर हरे रंग की जीर्ण मलिन साड़ी और एक कपडे का थैला उसके पास था ! सब्जी के ढेर से वह लोगों की नजरें बचाकर पालक के पत्तों को अपने थैले में रख रही थी !...

मंगलवार, 11 मई 2010

कोई हो ऐसा.....(कविता)......वंदना

कभी कभी हम चाहते हैं किकोई हो ऐसा जोहमारे रूह की अंतरतम गहराइयों में छिपीहमारे मन की हरगहराई को जानेकभी कभी हम चाहते हैं किकोई हो ऐसा जोसिर्फ़ हमें चाहेहमारे अन्दर छिपेउस अंतर्मन को चाहेजहाँ किसी की पैठ न होकभी कभी हम चाहते हैं किकोई हो ऐसा जोहमें जाने हमें पहचानेहमारे हर दर्द कोहम तक पहुँचने से पहलेउसके हर अहसास सेगुजर जाएकभी कभी हम चाहते हैं किकोई हो ऐसा जोबिना कहे हमारी हर बात जानेहर बात समझेजहाँ शब्द भी खामोश हो जायेंसिर्फ़ वो सुने और समझेइस मन के गहरे सागर मेंउठती हर हिलोर कोहर तूफ़ान कोऔर बिना बोलेबिना कुछ कहे वो हमें हम से चुरा लेहमें...

यह ह्रदय नहीं, एक निरा- मांस का पिंड है...(कविता)....आशुतोष ओझा जी

यह ह्रदय नहीं, एक निरा- मांस का पिंड है बड़ी निष्ठुर होकरउसने मुझसे कहा होगा ,गए बीत बरस दो- चार मगर तुम नहीं आये तकती रही डगर आखिर, कहाँ गए थेकिस शहर भूली नहीं छोड़ दी , बिसरा दी कब तक मरती बिरह में तड़प-तड़प कर .यह ह्रदय नहीं , एक निरा-मांस का पिंड हैजेठ रहा या कातिक क्या सावन, क्या भादों साँस थे , एहसास थे , लेकिनसाथ नहीं थे , मरी नहीं मार दी गयी , दिवस थासाप्ताहिक या कलमुंध पाक्छिक.यह ह्रदय नहीं , एक निरा-मांस का पिंड है........

मन सावन -------------- {कविता} ---------------------- सन्तोष कुमार "प्यासा"

मन सावन मन सावन मन उमड़ते, अभिलाषाओ के बादल गिरती जीवन धरा पर, विचारो की बूंदें हर पल आशाओं की दामिनी कौंधती मन में सुख दुःख की बदली, करती कोलाहल परिश्तिथियों की बौछारों से गीले होते जीवन प्रष्ठ मन के मोर, पपीहे, दादुर , मन सावन में भीगने को बेकल विचारों की बूंदों से ह्रदय के गढढे उफनाए आशा-निराशा की सरिता बह चली, तीव्र गति से अविरल मन सावन मन उमड़ते, अभिलाषाओ के बादल गिरती जीवन धरा पर, विचारो की बूंदें हर...

सोमवार, 10 मई 2010

' इजी मनी-इजी सेक्स' वन नाइट स्टैड़ ' --------------मिथिलेश दुबे

नैतिकता की ढहती दीवारें यौवन का विनाश करने में लगी हैं । मर्यादाओं एवं वर्जनाओं में आई दुष्प्रभाव एवं दरारों के बीच किशोर कुम्हला रहे हैं और युवा विनिष्ट हो रहे हैं जिस सुख और साधन की तलाश में युवा नैतिकता के तडबंध तोड़ रहे हैं, वह उन्हे मनोग्रंथियों एवं शारीरिक अक्षमता के अलावा और कुछ नहीं दे पा रहें हैं । यह सब हो रहा है स्वच्छंद सुख की तलाश में । आज का युवा जिस राह पर बढ़ रहा है , वहाँ स्वच्छंदता का उन्माद तो है , लेकिन सुख का सुकून जरा भी नहीं है , बस अपनी भ्रान्ति एवं भ्रम में जिन्दगी को तहस -नहस करने पर तुला है । युवाओं में यह प्रवृत्ति संक्रामक...

रविवार, 9 मई 2010

माँ .......(कविता)..............मोनिका गुप्ता

माँ को है विरह वेदना और आभास कसक का ठिठुर रही थी वो पर कबंल ना किसी ने उडाया चिंतित थी वो पर मर्म किसी ने ना जाना बीमार थी वो पर बालो को ना किसी ने सहलाया सूई लगी उसे पर नम ना हुए किसी के नयना चप्पल टूटी उसकी पर मिला ना बाँहो का सहारा कहना था बहुत कुछ उसेपर ना था कोई सुनने वाला भूखी थी वो पर खिलाया ना किसी ने निवाला समय ही तो है उसके पास पर उसके लिए समय नही किसी के पास क्योंकि वो तो माँ है माँऔर माँ तो मूरत है प्यार की, दुलार की, ममता की ठंडी...

माँ..........(कविता)........श्यामल सुमन

मेरे गीतों में तू मेरे ख्वाबों में तू,इक हकीकत भी हो और किताबों में तू।तू ही तू है मेरी जिन्दगी।क्या करूँ माँ तेरी बन्दगी।।तू न होती तो फिर मेरी दुनिया कहाँ?तेरे होने से मैंने ये देखा जहाँ।कष्ट लाखों सहे तुमने मेरे लिए,और सिखाया कला जी सकूँ मैं यहाँ।प्यार की झिरकियाँ और कभी दिल्लगी।क्या करूँ माँ तेरी बन्दगी।।तेरी ममता मिली मैं जिया छाँव में।वही ममता बिलखती अभी गाँव में।काटकर के कलेजा वो माँ का गिरा,आह निकली उधर, क्या लगी पाँव में?तेरी गहराइयों में...

कल की तलाश में भटकता आज------ (कविता)------- प्रीती "पागल"

देखा करती हूँ   मै ज़िन्दगी की खूबसूरती रिस्तो की अहमियत, दोस्तों की ज़रूरत मुहब्बत की नजाकत और पेड़ो की डालो से झडते हुए पत्ते मुस्कुराते हुए बच्चे और घूमते युवा उड़ते हुए पंक्षी, और फिर देखा करती हूँ चौराहे पर खड़े वृद्ध की आँखें, देखा करती हूँ मै किताबो की तह्जीने, घरों में संस्कार, परिवारों में मर्यादा, लब्जों में प्यार और फिर "कल की तलाश में भटकता हुआ आज...

शनिवार, 8 मई 2010

मेरी माँ......( मातृत्व दिवस पर समर्पित कविता ).....कवि दीपक शर्मा

“उसकी आवाज़ बता देती हैं मैं कहाँ हूँ ग़लतमेरी माँ के समझाने की कुछ अदा निराली है .”आओ ! सब मिलकर अपनी जननी के चरण स्पर्श करें और प्रभू से विनती करें कि हे !परम पिता हमे हर जन्म मे इसी माँ की कोख़ से पैदा करना ..हमारा जीवन इसी गोद मे सार्थक हैं. हमारा बचपन इसी ममता का प्यासा हैं और जन्मो -जन्मान्तर तक हम इसी ममत्व का नेह्पान करते रहें ..माँ आप हमारा प्रणाम स्वीकार करो और हमे आशीर्वाद दो .आज फिर नेह से हाथ सिर पर फेर माँहूँ बहुत...

चिथड़ा चिथड़ा ....(कविता)....माणिक

मेरी चिथड़ा चिथड़ा ,बेस्वाद और संकडी कहानी में अपने,लिखा है बहुत कुछ,तपती धरती,झरता छप्पर,घर,पडोस,या फ़िर खेत-खलिहान,कुन्डी में नहाते ढोर लिखे है कोने में कहीं,बेमेल ही सही पर शामिल तो किया,कम तौल कर कमा खाता ,गांव का बनिया भी खुदा ने,वार तेंवार की साग सब्जी,बाकी रहा आसरा, नमक-मिरच का,अनजान ही रहा क्यूं अब तक,दिनों में नहाती मां की मजबुरी से,चुज्जे,बछडे और मुर्गियां ,साथ हमारे सोती थी,बनिये के ब्याज वाले पहाडे ,सुनने से पके कानों को,स्कुल की घन्टी...

शुक्रवार, 7 मई 2010

आईना से बहाना क्यूँ है.........(गजल)..........श्यामल सुमन

खुशी से दूर सभी फिर ये ठिकाना क्यूँ है?अमन जो लूटते उसका ही जमाना क्यूँ है?सभी को रास्ता जो सच का दिखाते रहतेरू-ब-रू हो ना आईना से बहाना क्यूँ है?धुल गए मैल सभी दिल के अश्क बहते हीहजारों लोगों को नित गंगा नहाना क्यूँ है?इस कदर खोये हैं अपने में कौन सुनता है?कहीं पे चीख तो कहीं पे तराना क्यूँ है?बुराई कितनी सुमन में कभी न गौर कियाऊँगलियाँ उठतीं हैं दूजे पे निशाना क्यूँ ...

टैगोर-------------------------सन्तोष कुमार "प्यासा"

आज गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर जी की १५० वा जन्म दिवश है ! टैगोर जी की रचनाए विश्व प्रसिध्ध है ! पुरे विश्व में सिर्फ टैगोर ही ऐसे थे जिनकी रचनाओ को दो देशों (भारत और बंगलादेश) में रास्त्रगन का सम्मान मिला ! टैगोर जी की याद में उनकी एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ ! ...

गुरुवार, 6 मई 2010

कविता में छंदानुशासन.......(आलेख)......Acharyaसंजीव 'सलिल'

शब्द ब्रम्ह में अक्षर, अनादि, अनंत, असीम और अद्भुत सामर्थ्य होती है. रचनाकार शब्द ब्रम्ह के प्रागट्य का माध्यम मात्र होता है. इसीलिए सनातन प्राच्य परंपरा में प्रतिलिपि के अधिकार (कोपी राइट) की अवधारणा ही नहीं है. श्रुति-स्मृति, वेदादि के रचयिता मन्त्र दृष्टा हैं, मन्त्र सृष्टा नहीं. दृष्टा उतना ही देख और देखे को बता सकेगा जितनी उसकी क्षमता होगी. रचना कर्म अपने आपमें जटिल मानसिक प्रक्रिया है. कभी कथ्य, कभी भाव रचनाकार को प्रेरित करते है.कि वह 'स्व' को 'सर्व' तक पहुँचाने के लिए अभिव्यक्त हो. रचना कभी दिल(भाव) से होती है कभी दिमाग(कथ्य) से....

निराला की निराली कविता -----सन्तोष कुमार "प्यासा"

प्रस्तुत कविता निराला जी द्वारा रचित है ! ये कविता मेरे ह्रदय को अतल स्पर्श करती है ! आशा है की आपको भी ये कविता पसंद आएगी ...

बुधवार, 5 मई 2010

शमशान........(कविता)......वंदना

दुनिया के कोलाहल से दूरचारों तरफ़ फैली है शांति ही शांतिवीरान होकर भी आबाद है जोअपने कहलाने वालों के अहसास से दूर है जोनीरसता ही नीरसता है उस ओरफिर भी मिलता है सुकून उस ओरले चल ऐ खुदा मुझे वहांदुनिया के लिए कहलाता है जो शमशान य...

किरदार.......श्यामल सुमन जी

बाँटी हो जिसने तीरगी उसकी है बन्दगी।हर रोज नयी बात सिखाती है जिन्दगी।।क्या फर्क रहनुमा और कातिल में है यारो।हो सामने दोनों तो लजाती है जिन्दगी।। लो छिन गए खिलौने बचपन भी लुट गया।है बोझ किताबों का दबाती है जिन्दगी।। है वोट अपनी लाठी क्यों भैंस है उनकी।क्या चाल सियासत की पढ़ाती है जिन्दगी।। गिनती में सिमटी औरत पर होश है किसे।महिला दिवस मना के बढ़ाती है जिन्दगी।।किरदार चौथे खम्भे का हाथी के दाँत सा।क्यों असलियत छुपा के दिखाती है जिन्दगी।।देखो सुमन की खुदकुशी टूटा जो डाल से।रंगीनियाँ कागज की सजाती है जिन्दग...

मन-मरुस्थल-----------------[कविता]----------------सन्तोष कुमार "प्यासा"

मन में है एक विस्तृत मरुस्थल या मन ही है मरुस्थल रेत के कणों से ज्यादा विस्तृत विचार है रह-रह कर सुलगती है उम्मीदों की अनल विषैले रेतीले बिच्छुओं की भांति डंक मारते अरमाँ हर पल मै "प्यासा" हूँ मन भी "प्यासा" पागल है सब ढूढे मरुस्थल में जल मन में है एक विस्तृत मरुस्थल या मन ही है मरुस्थल वक्त के इक झोके ने मिटा दिया आशा-निराशा के कण चुन कर बनाया था जो महल मन मरुस्थल, मन में है मरुस...

एक महान कवित्री-----------[कविता]-------------सन्तोष कुमार "प्यासा"

 मैंने एक महान कवित्री के बारे में पढ़ा जिस पर था प्रकृति के प्रति असीम प्रेम चढ़ा उनमे प्रतिभा थी प्रकृति प्रदत्त कोलकाता में जन्मी नाम था तोरू दत्त साहित्य सृजन अल्पायु में ही प्रारम्भ किया मानव-प्रकृति के मर्म को सरलता से जान लिया पिता के साथ विदेश किया प्रस्थान प्रकृति प्रेम, साहित्य प्रेम का और बढ़ गया गुण महान उम्र के साथ साथ प्रतिभा रूपी पुष्प खिलता रहा प्रकृति के प्रति असीम प्रेम, उनकी कविताओ में मिलता रहा २१...

मंगलवार, 4 मई 2010

जब पापा ने बनाए मटर के चावल ......(बाल कहानी).....मोनिका गुप्ता

हमेशा से ही मम्मी और रसोई का नाता रहा है.मैने आज तक पापा को रसोई से पानी का गिलास खुद लेकर पीते नही देखा. पापा सरकारी अफसर हैं इसलिए द्फ्तर के साथ साथ घर पर भी खूब रौब चलता है.मम्मी सारा दिन घर पर ही रहती हैं.दिन हो या रात सारा समय काम ही काम हाँ भाई... नौकरों से काम लेना कोई आसान काम है क्या, हाँ.... तो मैं ये बता रही थी कि पिछ्ले कुछ दिनो से पापा खाने मे कोई ना कोई नुक्स निकाल रहे थे. इसीलिए मम्मी ने रसोइए की छुट्टी कर के रसोई की कमान खुद सम्भाल...

नज़्म .....कवि दीपक शर्मा

बात घर की मिटाने की करते हैंतो हजारों ख़यालात जेहन में आते हैंबेहिसाब तरकीबें रह - रहकर आती हैंअनगिनत तरीके बार - बार सिर उठाते हैं । घर जिस चिराग से जलना हो तोलौ उसकी हवाओं मैं भी लपलपाती है ना तो तेल ही दीपक का कम होता हैना ही तेज़ी से छोटी होती बाती है । अगर बात जब एक घर बसाने की हो तोबमुश्किल एक - आध ख्याल उभर के आता हैतमाम रात सोचकर बहुत मशक्कत के बादएक कच्चा सा तरीका कोई निकल के आता है । वो चिराग जिससे रोशन घरोंदा होना हैशुष्क हवाओं में भी लगे की लौ अब बुझाबाती भी तेज़ बले , तेल भी खूब पिए दीयारौशनी भी मद्धम -मद्धम और...

लहर---------[कविता]----------सन्तोष कुमार "प्यासा"

तुम्हे याद है हम दोनों पहले यहाँ आते थे घंटो रेत पर बैठ कर एक दुसरे की बातों में खो जाते थे तुम घुटनों तक उतर जाती थी सागर के पानी में और मै किनारे खड़ा तुम्हे देखता था पहले तो तुम बहुत चंचल थी लेकिन अब क्यों हो गई हो समुद्र की गहराई की तरह शांत और मै बेकल जैसे समुद्र में उठती ...

सोमवार, 3 मई 2010

पहचानो ... ........[व्य़ंग्य]----------मोनिका गुप्ता

मैं हू कौन .. जी हाँ, क्या आप जानते हैं कि मै हूँ कौन ...चलिए मैं हिंट देता हूँ .. सबसे पहले मै यह बता दू कि मैं आम आदमी नही हूँ . मुझसे मिलने के लिए लोगो की भीड लगी रहती है पर मै जिला उपायुक्त नही हूँ. मेरे आगे पीछे 4-4 अंगरक्षक घूमते हैं पर मैं पुलिस कप्तान भी नही हूँ .मेरे पीछे दिन रात जनता पडी रहती है पर मैं कोई स्वामी जी या कही का महाराज भी नही हूँ.मेरे बच्चे स्कूल मे प्रथम आते हैं और सभी स्कूल के प्रोग्रामो मे हिस्सा लेते हैं सारा स्टाफ मेरा सम्मान करता है पर मै स्कूल का प्रिंसीपल भी नही हूँ.जिले मे कोई भी कार्यक्रम होता है तो मुझे जरुर...