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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

मन संगीत

सुर,लय, ताल,छंदमय है मन संगीत बहते रहते हर पल, प्रेम विरह के गीत जैसे चाँद चकोर की प्रेम कहानी वैसे ही है मन-विचार मन मीत आशा निराशा के सुरों से पुलकित होता ह्रदय मिलन-विरह की निरंतर चलती रहती रीत सुख दुःख तो है मन संगीत के उतार चढाव सौहार्द के पुष्प खिल जाए, जब हो मन से मन को प्रीत सुखद,दुखद, सहज, कठिन मन संगीत उम्मीदों अरमानो की धुन में, जाए जीवन बीत मन से मन संगीत के मर्म को समझों मन के हारे हार है, मन के जीते ...

प्रगति या पतन ???

मानते हैं हर राह में तुमने सफलता पाई आसानी से निपटलिया प्रगति पथ पर जो भी मुश्किल आई नित नव विषय पर तुमने आविष्कार किया जड़ ज्ञान का तुमने खूब प्रचार किया मानते है चद्रमा पर भी तुम विजय पताका फहरा आए मृत्युके मुख से भी जीवन को छीन लाए निज विवेक से आकाश में भी गमन किया मानते हैं तीनो लोक का तुमने भ्रमण किया मानते है तुमने कई मुश्किलों को आसान बनाया है स्रष्टिके कई रहस्यों से तुमने परदा उठाया है पर शायद भूल गए विज्ञानं कितना व्याल है इसका वास्तविक रूप कितना विकराल है क्या इतना करके भी तुम्हे मिली है शान्ति सच बताओ क्या तुमने...

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

मै कवी हूँ

मै कवी हूँ मुझे भावनाओं के संग बहना पड़ता है जो चाहते है सब सुनना, समाज में हो रहा है जो वही मुझे कहना पड़ता है ! मै कवी हूँ मुझे भावनाओं के संग बहना पड़ता है गरीब तुम हो तो गरीब मै नही हूँ, दुखी तुम हो तो दुखी मै भी हूँ प्रकृति का यह नियम मुझे भी सहना पड़ता है ! मै कवी हूँ मुझे भावनाओं के संग बहना पड़ता है पता है मुझे की समाज में फैली है बुराई, हर जगह खून खराबा और कुछ नहीं तो घरेलू लड़ाई पर क्या करूँ मजबूरन यहाँ रहना पड़ता है ! मै कवी हूँ मुझे भावनाओं के संग बहना पड़ता है ! आदमी के लहू का "प्यासा" है आदमी, इस कदर जुल्मो...

लव इज ब्लाइंड

 जब भी मै प्यार के बारे में कुछ बुरा सुनता हूँ तो मुझे मानशिक कष्ट होता है ! वर्तमान समय में प्यार के बारे में तरह तरह की कहावते हिंदी और अंग्रेजी में उपलब्ध हैं जो प्यार को आरोपित कर रहे है ! एवं आज का युवा वर्ग भी प्यार की वाश्त्विकता को न समझने के कारण भ्रम में है ! अत: मैंने प्यार की वाश्त्विकता एवं महानता को सबके सन्मुख लाने हेतु एक पुस्तक लिखने का विचार किया है , इसी विचार की परिपूर्ति हेतु एक छोटा सा लेख आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ कृपया मेरा मार्गदर्शन करे, एवं मेरी त्रुटियों का अहसास मुझे बेझिझक कराएँ ! लोग बड़ी सरलता se...

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

झूठ

झूठ हमारा नहीं हमारे पूर्वजो का संस्कार है जनता, नेता, अभिनेता सबको यह स्वीकार है ! झूठ बोले बिना आजकल गाडी नहीं चलती है झूठ बोलने से कभी-कभी सफलता भी मिलती है ! जो जितना ज्यादा झूठ बोलता है वो उतना ज्यादा पाता है इतिहास उठा कर देख लो सच बोलने वाला पत्थर ही खaता है ! अजीब विडंबना है ये, की आजकल सच्चे का मुह काला है सबको पता की झूठे का बोल बाला है ! झूठ तो कुछ है ही नहीं, जहां तक मुझको ज्ञान है ये मै नहीं कहता कहते वेद पुराण है ! "सर्व खल्विदं ब्रह्म" छान्दोग्योप्निशत का यह मन्त्र है एक सच और झूठ की लड़ाई अब मुझसे नहीं...

मनुष्य प्रकृति और समय

हर क्षण हर पल इस स्रष्टि में कुछ न कुछ होता रहता है ! "समय" इक पल भी नहीं ठहरता ! समय का चक्र निरंतर घूमता रहता है ! जब मै इस लेख को लिख रहा हूँ, मुझे मै और मेरे विचार ही दिख रहे है ! ऐसा प्रतीत होता है, जैसे की कुछ हो ही नहीं रहा ! हवा शांत है ! सरसों के पीले खेत इस भांति सीधे खड़े है, जैसे किसी ने उन्हें ऐसा करने का आदेश दिया हो ! चिड़ियों की चहचहाहट, प्रात: कालीन समय और ओस की बूंदे, बहुत भली लग रहीं हैं ! सूर्य खुद को बादलों के बीच इस भांति छुपा रहा है, जैसे कोई लज्जावान स्त्री पर पुरुष को देख कर अपना मुंह आँचल में छुपा लेती है ! कोहरे को देख...

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

मन आंधी

मन में चलती है आंधी या मन ही है आंधीनव प्रकार के नव विचारकल्पनाओं के इश्वर ने , रच दिया नव संसारह्रदय व्याकुल है , उठी वेदनाफिर उमड़ी मन की आंधीकभी तीव्र कभी मंद गति से करती,मन को बेकल मन की आंधीमन में चलती है आंधी या मन ही है आंधीहवा के रुख को मोड़ा किसने?कुछ अच्छे कुछ मलिन विचारों कोलेकर उड़ चली मन की आ...

मन नौका

मन नौका विचरती है विचारों के सागर पर आश निराश के मौजों में डगमगाती इधर उधर कहीं गहरा तो कहीं उथला है सागर सुख दुःख के दो पतवारों से पार करनी है तूफानी डगर उम्मीदों के टापू मिलते व्याकुलता तज , कुछ क्षण को जाते ठहर अरमानो का पंक्षी उड़ जाता है बेबस होकर पुन: वापस आए लौट कर मन नौका विचरती है विचारों के सागर...

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

गर्मी

जालिम है लू जानलेवा है ये गर्मी काबिले तारीफ़ है विद्दुत विभाग की बेशर्मी तड़प रहे है पशु पक्षी, तृष्णा से निकल रही जान सूख रहे जल श्रोत, फिर भी हम है, निस्फिक्र अनजान न लगती गर्मी, न सूखते जल श्रोत, मिलती वायु स्वक्ष गर न काटे होते हमने वृक्ष लुटी हजारों खुशियाँ, राख हुए कई खलिहान डराता रहता सबको, मौसम विभाग का अनुमान अपना है क्या, बैठ कर एसी, कूलर,पंखे के नीचे गप्पे लड़ाते हैं सोंचों क्या हाल होगा उनका, जो खेतों खलिहानों में दिन बिताते है अब मत कहना लगती है गर्मी, कुछ तो करो लाज दिखाओ शर्मी जाकर पूंछो किसी...

रविवार, 25 अप्रैल 2010

बहुत दिन हुए -- (कविता)..... कुमार विश्वबंधु

बहुत दिन हुएकोई चिट्ठी नहीं आईकोई मित्र नहीं आया दरवाजे पता पूछतेचिल्लाते नामबहुत दिन हुएदाखिल नहीं हुई कोई नन्ही सी चिड़ियातिनका-तिनका जोड़ा नहीं घरखिड़कियों से होकर किसी सुबहकिसी शामउतरा नहीं आकाशबहुत दिन हुए भूल गयाजाने क्या था उस लड़की का नाम !बहुत दिन हुएकरता रहा चाकरीगँवाता रहा उम्रकमाता रहा रुपएबहुत दिन हुए छोड़ दिया लड़नाबहुत दिन हुएभूल गया जी...

आठवीं रचना ( डा श्याम गुप्त )

कमलेश जी की यह आठवीं रचना थी | अब तक वे दो महाकाव्य, दो खंड काव्य व तीन काव्य संग्रह लिख चुके थे | जैसे तैसे स्वयं खर्च करके छपवा भी चुके थे | पर अब तक किसी लाभ से बंचित ही थे | आर्थिक लाभ की अधिक चाह भी नहीं रही| जहां भी जाते प्रकाशक, बुक सेलर ,वेंडर, पुस्तक भवन, स्कूल, कालिज, लाइब्रेरी एक ही उत्तर मिलता , आजकल कविता कौन पढ़ता है ; वैठे ठाले लोगों का शगल रह गया है, या फिर बुद्धि बादियों का बुद्धि-विलास | न कोई बेचने को तैयार है न खरीदने को | हां नाते रिश्तेदार , मित्रगण मुफ्त में लेने को अवश्य लालायित रहते हें , और फिर घर में इधर-उधर पड़ी रहतीं...

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

गजल ......(परिचय )....कवि दीपक शर्मा

दीपक शर्मा जी का जन्म २२ अप्रैल १९७० में चंदौसी जिला मुरादाबाद ( उ.प) में हुआ . दीपक जी ने वस्तु प्रबंधन में परा स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है . दीपक जी कारपोरेट जगत में एक प्रबंधक के पद पर आसीन हैं .दीपक जी की रचनाएँ नज़्म , गीत , ग़ज़ल एवं कविताओं के रूप में शारदा प्रकाशन द्वारा उनकी दो पुस्तकों " फलक दीप्ति " एवं " मंज़र" में प्रकाशित की गई हैं.पूरा नाम : दीपक शर्मा+ उपनाम ...

नन्हें फूल- रोज़ ही एक नया मज़ेदार कि़स्सा.....(संस्मरण).....मनोशी जी

"अब के इस मौसम में नन्हेंफूलों से महकी गलियाँ हैं"इस शेर को जब लिखा था तो वो प्यारे-प्यारे, छोटे-छोटे बच्चे थे दिमाग़ में, जिन्हें पढ़ाने का मौक़ा मिला है इस साल। कक्षा किंडर्गार्टन से कक्षा दूसरी तक के बच्चे, ४ - ७ साल तक के।शुरुआत में बड़ी परेशानी होती थी। मैं घबराई हुई सी इन कक्षाओं में जाती थी। इतने छोटे बच्चों को पढ़ाने का कोई अनुभव नहीं था मुझे। मगर अब कोई २-३ महीने बाद, हर दिन एक खुशगवार दिन होता है और हर दिन के नये कि़स्सों को घर आकर याद कर के...

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

एक सपना जी रही हूँ......(कविता)......मनोशी जी

एक सपना जी रही हूँपारदर्शी काँच पर सेटूट-बिखरे झर रहे कण   विहँसता सा खिल रहा हैआँख चुँधियाता हर इक क्षण  कुछ दिनों का जानकर सुखमधु कलश सा पी रही हूँएक सपना जी रही हूँवह अपरिचित स्पर्श जिसनेछू लिया था मेरे मन को अनकही बातों ने फिर धीरेसे खोली थी गिरह जोऔर तब से जैसे हालाजाम भर कर पी रही हूँ एक सपना जी रही हूँइक सितारा माथ पर जोतुमने मेरे जड़ दिया थाऔर भँवरा बन के अधरोंसे मेरे रस पी लिया थाउस समय के मदभरे पलज्यों नशे में जी...

कागज़ की नाव...(बाल कविता )...कुमार विश्वबंधु

आओ बनायें कागज़ की नाव !आओ चलायें कागज़ की नाव !" लो खा लो खाना '' कहते हैं नाना -फिर तुम चलाना कागज़ की नाव ।आओ बनायें कागज़ की नाव !आओ चलायें कागज़ की नाव !'' आँगन में पानी '' कहती है नानी -जाना है हमको सपनों के गाँव...

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

सुख बिजली जाने का...(व्यंग्य)...मोनिका गुप्ता

अरे भाई, हैरान होने की कोई बात नही है लगातार लगते कटो से तो मैने यही नतीजा निकाला है कि बिजली जाने के तो सुख ही सुख है.सबसे पहले तो समाज की तरक्की मे हमारा योगदान है. भई, अर्थ आवर मे 100% हमारा योगदान है क्योकि बिजली रहती ही नही है.तो हुआ ना हमारा नाम कि फलां लोगो का सबसे ज्यादा योगदान है बिजली बचाओ मे.चलो अब सुनो, बिजली नही तो बिल का खर्चा भी ना के बराबर. शापिंग के रुपये आराम से निकल सकते हैं. बूढे लोगो के लिए तो फायदा ही फायदा है भई हाथ की कसरत हो जाती है. हाथ का पखां करने से जोडो के दर्द मे जो आराम मिलता है. घरो मे चोरी कम होती है भई, बिजली...

तुम चले क्यों गये? ...(कविता)...मुईन शमसी

तुम चले क्यों गये मुझको रस्ता दिखा के, मेरी मन्ज़िल बता के तुम चले क्यों गये तुमने जीने का अन्दाज़ मुझको दिया ज़िन्दगी का नया साज़ मुझको दिया मैं तो मायूस ही हो गया था, मगर इक भरोसा-ए-परवाज़ मुझको दिया. फिर कहो तो भला मेरी क्या थी ख़ता मेरे दिल में समा के, मुझे अपना बना के तुम चले क्यों गये साथ तुम थे तो इक हौसला था जवाँ जोश रग-रग में लेता था अंगड़ाइयाँ मन उमंगों से लबरेज़ था उन दिनों मिट चुका था मेरे ग़म का नामो-निशाँ. फिर ये कैसा सितम क्यों हुए बेरहम दर्द दिल में उठा...

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

‘कवि शिरोमणि संत सुंदरदास समारोह 2010’...(रिपोर्ट) ...विमला भंडारी

श्री शिवनारायण रावत स्मृति शब्द संस्थान, दौसा एवं कौशिक विद्या मंदिर समिति के संयुक्त तत्वावधान में ‘कवि शिरोमणि संत सुंदरदास समारोह 2010’ का आयोजन किया गया। इस समारोह में ‘काव्य माधुरी’ तथा ‘साहित्यकार सम्मान’ कार्यक्रम का आयोजन भी किया गया। बालवाटिका (भीलवाड़ा) के संपादक डॉ. भैरूलाल गर्ग, संगरिया के बाल साहित्यकार तथा व्यंग्यकार श्री गोविन्द शर्मा, सलूम्बर की साहित्यकार और जिलापरिषद सदस्या श्रीमती विमला भण्डारी तथा मंडला के साहित्यकार डॉ. शरदनारायण...

लिखूं ग़ज़ल ...(ग़ज़ल ).....कवि दीपक शर्मा

मैं भी चाहता हूँ की हुस्न पे ग़ज़लें लिखूँमैं भी चाहता हूँ की इश्क के नगमें गाऊंअपने ख्वाबों में में उतारूँ एक हसीं पैकरसुखन को अपने मरमरी लफ्जों से सजाऊँ ।लेकिन भूख के मारे, ज़र्द बेबस चेहरों पेनिगाह टिकती है तो जोश काफूर हो जाता हैहर तरफ हकीकत में क्या तसव्वुर में फकत रोटी का है सवाल उभर कर आता है ।ख़्याल आता है जेहन में उन दरवाजों काशर्म से जिनमें छिपे हैं जवान बदन कितने जिनके तन को ढके हैं हाथ भर की कतरनजिनके सीने में दफन हैं , अरमान कितने जिनकी डोली नहीं उठी इस खातिर क्योंकिउनके माँ-बाप ने शराफत की कमाई हैचूल्हा एक बार ही जला...

मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

धरी लुट गयी (गीत) .............. कुमार विश्वबंधु

धरी धरी लुट गयी सपनों की टोकरी,मिली नहीं नौकरी। क्याहम कहें कुछ कहा नहीं जाए,जीवन से  मौत अच्छीसहा नहीं जाए। झूठेअरमान हुए सपनें बेइमान हुए, अपने अनजान हुएरहा नहीं जाए। करगई बाय बाय मुम्बई की छोकरी !मिली नहीं नौकरी।धरी धरी लुट गयी ... कितने जतन किएपूरी की पढ़ाई,फिर भी जमाने मेंबेकारी हाथ आई। दर दर की ठोकर खाते, पानी पी भूख मिटाते,पर हम लड़ते ही जातेजीवन की लड़ाई। होकरमजबूर यारों करते हैं जोकरी !मिली नहीं नौकरी।धरी धरी लुट गयी...

दीप बना कर याद तुम्हारी....(गीत)...मनोशी जी

दीप बना कर याद तुम्हारी, प्रिय, मैं लौ बन कर जलती हूँप्रेम-थाल में प्राण सजा कर लो तुमको अर्पण करती हूँ।अकस्मात ही जीवन मरुथल में पानी की धार बने तुम,पतझड़ की ऋतु में जैसे फिर जीवन का आधार बने तुम,दो दिन की इस अमृत वर्षा में भीगे क्षण हृदय बाँध कर,आँसू से सींचा जैसे अब बन कर इक सपना पलती हूँ। दीप बना कर...मेरे माथे पर जो तारा अधरों से तुमने आँका था,अंग-अंग हर स्पर्श तुम्हारा लाल दग्ध हो मुखर उठा था,उन चिह्नों को अंजुरि में भर पीछे डाल अतीत अंक में,दे दो ये अनुमति अब प्रियतम, अगले जीवन फिर मिलती हूँ।दीप बना कर...तुम रख लेना मेरी स्मृति को अपने...

रविवार, 18 अप्रैल 2010

कल ढलना है ........(कविता)....कवि दीपक शर्मा

डाल कर कुछ नीर की बूंदे अधर मेंकर अकेला ही विदा अज्ञात सफ़र मेंकुछ नेह मिश्रित अश्रु के कतरे बहाकरसंबंधों से अपने सब बंधन छूटाकर बाँध तन को कुछ हाथ लम्बी चीर मेंडूबकर स्वजन क्षणिक विछोह पीर मेंतन तेरा करके हवन को समर्पितकुछ परम्परागत श्रद्धा सुमन करके अर्पितधीरे -धीरे छवि तक तेरी भूल जायेंगेकाल का ऐसा भी एक दिवस आएगाआत्मीय भी नाम तेरा भूल जायेंगेसाथ केवल कर्म होंगे, माया न होगीसम्बन्धी क्या संग अपनी छाया न होगीबस प्रतिक्रियायें जग की तेरे...

अगीत -----डा श्याम गुप्त के पांच अगीत ....

( नव अगीत ---अगीत विधा का यह एक नवीन छंद है---३ से ५ तक पंक्तियाँ , तुकांत बंधन नहीं . )१. नज़दीकियाँ -मोबाइल,उनके पास भी हैहमारे पास भी है ;हम इतने करीब हैं कि ,अभी तक नहीं मिलपाये हैं |२. झुनुझुना --चुनाव हारने के बाद वे झुनुझुना बजा रहे हैं ;और क्या करें समझ नहीं पारहे हैं |३.दूरियां---दूरियां , दिलों को करीब लाती हैं;इन्तजार के बाद,मिलन केअनुभूति,अनूठी हो जाती है ।४.समत्व---जो आधि व व्याधिदोनों में ही सम रहता है;उसे ही शास्त्र,समाधिस्थ व समतावादी कहता है ।५.मूर्ख--कुत्ते की उस पूंछ के समान है,जो नतो गुप्त अन्ग ही ढकती हैन...

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

तुम इतने समीप आओगे मैंन कभी नहीं सोचा था......- डा. बुद्धिनाथ मिश्र

मधेपुरा की ऐतिहासिक साहित्यिक परम्परा को सम्वर्द्धित करते हुए बी. एन मंडल विश्वविधालय, मधेपुरा के वर्तमान कुलपति डा. आर. पी. श्रीवास्तव के सद्प्रयास से विश्वविधालय के सभागार में काव्य संध्या का एक महत्वपूर्ण आयोजन किया गया। विश्वविधालय स्थापना के 17 वर्षों में यह पहला मौका था जब साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा (कविता) पर रचनाकारों का इस तरह भव्य समागम हुआ। विशिष्ठ अतिथि एवं गीतकाव्य के शिखर पुरुष डा. बुद्धिनाथ मिश्र (देहरादून) सहित अन्य कवियों को...

क्या है कविता ....(कविता ) ...कवि दीपक शर्मा

महज़ अलफाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविताकोई पेशा ,कोई व्यवसाय नही है कविता ।कविता शौक से भी लिखने का काम नहींइतनी सस्ती भी नहीं , इतनी बेदाम नहीं ।कविता इंसान के ह्रदय का उच्छ्वास है,मन की भीनी उमंग , मानवीय अहसास है ।महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नही हैं कविताकोई पेशा , कोई व्यवसाय नहीं है कविता ॥कभी भी कविता विषय की मोहताज़ नहींनयन नीर है कविता, राग -साज़ भी नहीं ।कभी कविता किसी अल्हड यौवन का नाज़ हैकभी दुःख से भरी ह्रदय की आवाज हैकभी धड़कन तो कभी लहू की रवानी हैकभी रोटी की , कभी भूख की कहानी है ।महज़ अल्फाज़ से खिलवाड़ नहीं है कविता,कोई पेशा , कोई व्यवसाय...

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

अँधियारा और आशा.....(कविता)......जोगिन्दर

थका हारा बैठा मुसाफिरजाने कौन कहाँ से आयाऔरदरवाजा खटखटाया ...मैं न हिलूंगामैं नहीं खोलूँगा द्वारमैंने ठान लिया थामुझे मालूम थाइस अंधियारे द्वार कोई नहीं आया होगाशायद दरवाजा खुद ब खुद हवाओं ने ही खटखटाया होगामैं सोचता रहामैं न हिलूंगा अबअब मैं थक गया हूँये अँधियारा अबमन भाने लगा हैये घर का एक कोनाअब यही पूरा घर बन गया हैमैं न हिलूंगा अबमैं न जाऊंगा उस पार ।उस पार न जाने क्या होगाहोगा अँधियारा घनाहोऊंगा मैं फिर से अकेलातो क्यों जाऊँ मैंमुझे अब इसी...

हड़ताल....(कहानी).....मनीष कुमार जोशी

‘क्या मैं अंदर आ सकता हॅू।’ तेजस ने नीले रंग की ड्रेस पहने हुए दरवाजा खोलकर कहा। यस । कम इन । ’ मैंनेजर ने कम्प्यूटर पर काम करते हुए तेजस की ओर देख बिना कहा।   तेजस मैनेजर का उत्तर सुनकर अंदर आ गया। नीली ड्रेस पहने और माथे पर थोड़े बहुत बाल बिलकुल आज की उम्र के नौजवान की तरह ही था तेजस । मैनेजर की टेबिल की नजदीक पहुंचते ही मैनेजर ने बैठने के लिए कह दिया। बिलकुल शांति का वातावरण था। फैक्ट्री में मशीनो की घड़ घड़ की आवाज यहां बिलकुल...

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

एक किनारे की नदी....(कविता).....राजीव

अचानक .........छोड़ गई तुम मेरा साथ,बुझा गयी अपना जीवन दीप,बिना कुछ कहे,बिना कुछ सुनेकर गयी मेरे जीवन मेंकभी न ख़त्म होनेवालाअँधियारा .........जन्म-जन्मान्तर के लिए थामा थातुमने मेरा हाथ ,वेदी पर बैठ खाई थी कसमेंसंग जीने ,संग मरने की ।इतनी भी क्या जल्दी थी,ऐसी भी क्या थी बात ,जो मुझे छोड़ गयी -जीवन के दोराहे परयादों के अंतहीन सुरंग मेंआखिरी सांस तकभटकने के लिए ।क्या करूंगाऐसा नीरस और निरर्थक जीवनजिसमें तुम नहीं ,तुम्हारा साथ नहीं ।कैसे कटेगा दिन,कैसे कटेंगी रातेंतेरे बिना!हर पल-हर क्षणयाद आएगी तू,तेरे साथ कटा जीवन,तेरे साथ बटी बातें ,घर के भीतर,घर...

राजनीति मे न्यूनतम शिक्षा का मापदंड होना ज़रूरी है .....कवि दीपक शर्मा

बहुत पुरानी कहावत है कि "विद्या ददाति विनयम्" .आप सबको इस श्लोक की यह पंक्ति ज़रूर याद होगी .जीवन के प्रारंभ मे ही इस तरह की पंक्तियाँ विधालय मे हर छात्र को पढाई जाती हैं .यह सब इसलिए नहीं कि हम पदकर परीक्षा उतीर्ण कर लें और अगली कक्षा मे पहुँच जाएँ.अपितु ये हमारी बौद्धिक बुनियाद को सुद्रढ़ करने के लिए हैं और यह समझाने का प्रयास है कि जितना पढोगे और जैसा अच्छा पठन होगा जीवन उतना ही सरल ,उत्तम और परिपक्व होगा .जिसका लाभ इस समाज को मिलेगा और समाज इस कारण उन्नति करेगा. फिर समाज के साथ साथ देश भी तरक्की करेगा .मतलब देश के साथ साथ आम आदमी का गौरव भी...

झूठ-मूठ.....कविता.....- कुमार विश्वबंधु

जो कहा सब झूठ जो लिखा सब झूठ जो सोचा सब झूठ जो जिया झूठ-मूठ इस बाज़ार में उड़ रहे हैं रुपये गिर रहे हैं लोग...

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

जाने वाले कभी नही आते ....मोनिका गुप्ता

जी हाँ ... एक कटु सत्य है.. जाने वालो की बस याद आती है .. वो कभी नही आते .. लेकिन हम फिर भी इस बात को समझ ही नही पा रहे है .. हाल ही मे दिशा की सास बहुत बीमार चल रही थी पर वो उनसे मिलने एक बार भी नही गई ... ना ही फोन पर बात की ना हाल पूछा .. अचानक वो एक दिन मर गई .. फिर तो उसकी हालत देखने वाली थी .. इतना रोई ...इतना रोई कि बस ..अब ये सारा ड्रामा ही लग रहा था ...भले ही उनके जाने के बाद उसके दिल मे प्यार जाग गया हो ..पर अब तो कुछ नही हो सकता ..सोचने वाली बात यह है कि जब आदमी जिन्दा होता है तब हम उसकी कद्र क्यो नही करते ...उसे वो सम्मान क्यो नही...

समीक्षा—— कृति --शूर्पणखा-----

समीक्षा—— कृति --शूर्पणखा -(अगीत विधा- खंड काव्य), रचयिता—डा श्याम गुप्त- समीक्षक---मधुकर अस्थाना, प्रकाशन—सुषमा प्रकाशन , आशियाना एवम अखिल भारतीय अगीत परिषद, लखनऊ, मूल्य-७५/= नारी विमर्श का खन्ड-काव्य : शूर्पणखा समकालीन साहित्य में नारी-विमर्श बहुत महत्वपूर्ण होगया है, इस सम्बन्ध में विभिन्न विधाओं में पर्याप्त सृजन किया जा रहा है, जिसमें नारी स्वतन्त्रता, समानता के साथ ही...

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

तस्वीर .....(कविता) ..नीशू तिवारी

मंदिरों की घंटियों की गूँज से ,शंखनाद की ध्वनियों सेवीररस से भरे जोशीले गीत सेनव प्रभात की लालिमा ली हुई सुबह से ,कल्पित भारत वर्ष की छवि आँखों में रच बस जाती है लेकिननंगे बदन घूमते बच्चों को ,कुपोषण और संक्रमण से जूझती गर्भवती महिला को और चिचिलाती धुप में मजार पर बैठा गंदे और बदबूदार उस इन्सान को तो बदल जाती है आँखों में बसी तस्वीर ,फिर सोचता हूँइस भीड़ तंत्र के बारे में ,जो व्यवस्था और व्यवस्थापक के बीच लड़ रहा है दो जून की रोटी को ,तब बदल जाती...

रविवार, 11 अप्रैल 2010

महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन की १०७ वीं जयंति.........रौशन जसवाल

हिमाचल साहित्यकार सहकार सभा ने ९ अप्रेल को महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन की १०७ वीं जयंति पर बिलासपुर में साहित्यक सभा का आयोजन किया! तीन सत्रों मे आयोजित इस सभा में सांस्कृत्यायन के व्यकितत्व और कृतित्व पर विचार विमर्श हुआ तथा लेखक गोष्ठी, पत्र वाचन और कवि पाठ क आयोजन किया गया! आयोजन के मुख्यातिथि थे हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड के सचिव प्रभात शर्मा और कार्यक्रम की अध्य्क्षता हिमाचल के व्योवृद्ध वरिष्ठ रचनाकार संत राम शर्मा ने की! इस अवसर पर...

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

मानता हूँ ......(कविता ).......नीशू तिवारी

"प्रेम के वशीभूत होकर सात फेरे में बधनें के अपराध की सजा जिन्दा जला कर दी जाती हैलेकिन खापों और पंचायतों के कूर्र्तापूर्ण फैसले कोइसकी परिणति नहीं मानता हूँ "दर्द से तड़पता हादसे का शिकार हुआ इन्सान दम तोड़ देता है इलाज के आभाव मेंलेकिनमानवता के दंश व अभिशाप के बीच दर्दनाक मौत को ,चटकारे लेकर पढ़ा जानासाहस नहींकायरता मानता हूँ""दंतेवाडा में सैनिक खून की होली खेल शहीद हो जाता हैलेकिनतानाशाहों की नम आँखों कोगहरे जख्मों पर मरहम नहींप्रहार मानता ह...

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

मोहब्बत....( ग़ज़ल )....कवि दीपक शर्मा

मोहब्बत के सफर पर चलने वाले राही सुनो,मोहब्बत तो हमेशा जज्बातों से की जाती है,महज़ शादी ही, मोहब्बत का साहिल नहीं,मंजिल तो इससे भी दूर, बहुत दूर जाती है ।जिन निगाहों में मुकाम- इश्क शादी हैउन निगाहों में फ़कत हवस बदन की है,ऐसे ही लोग मोहब्बत को दाग़ करते हैंक्योंकि इनको तलाश एक गुदाज़ तन की है ।जिस मोहब्बत से हजारों आँखें झुक जायें ,उस मोहब्बत के सादिक होने में शक हैजिस मोहब्बत से कोई परिवार उजड़ेतो प्यार नहीं दोस्त लपलपाती वर्क है ।मेरे लफ्जों में,...

ग़ज़ल....मोनी शम्सी

गमों की धूप से तू उम्र भर रहे महफ़ूज़,खुशी की छांव हमेश तुझे नसीब रहे.रहे जहां भी तू ऐ दोस्त ये दुआ है मेरी,मसर्रतों का खज़ाना तेरे करीब रहे.तू कामयाब हो हर इम्तिहां में जीवन के,तेरे कमाल का कायल तेरा रकीब रहे.तू राहे-हक पे हो ता-उम्र इब्ने-मरियम सा,बला से तेरी कोई मुन्तज़िर सलीब रहे.नहीं हो एक भी दुश्मन तेरा ज़माने में,मिले जो तुझसे वो बनके तेरा हबीब रहे.न होगा गम मुझे मरने का फिर कोई ’शमसी’,जो मेरे सामने तुझसा कोई तबीब र...

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

नारी .....(कविता)..... कवि दीपक शर्मा

कितनी बेबस है नारी जहां में न हंस पाती है, न रो पाती है औरों की खुशी और गम में बस उसकी उमर कट जाती है नारी से बना है जग सारा नारी से बने हैं तुम और हम नारी ने हमें जीवन देकर हमसे पाए अश्रु अपरम इन अश्रु का ही आंचल पकड़े बस उसकी उमर कट जाती है नारी का अस्तित्व देखो तो ज़रा कितना मृदु स्नेह छलकाता है कभी चांदनी बन नभ करे शोभित कभी मेघों सी ममता बरसाता है कुछ दी हुई उपेक्षित श्वासों में बस उसकी उमर कट जाती है सदियों को पलटकर देखो तो हर सदी ने यही...

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

कल रात नींद न आई ......कविता ......नीशू तिवारी

कल रात नींद न आई करवट बदल बदल कर कोशिश की थी सोने कीआखें खुद बा खुद भर आईतुम्हारे न आने परमैं उदास होता हूँ जबभीऐसा ही होता है मेरे साथफिर जलाई भी मैंने माचिस औरबंद डायरी से निकली थी तुम्हारी तस्वीर कुछ ही देर में बुझ गयी थी रौशनीऔर उसमे खो गयी थीतुम्हारी हसीजिसे देखने की चाहत लिए मैं गुजर देता था रातों कोसजाता था सपने तुम्हारेतारों के साथचाँद से भी खुबसूरतलगती थी तुमहाँ तुम से जब कहता येसबतुम मुस्कुराकरमुझे पागलकहकर कर चिढाती थीमुझे अच्छा लगता थातुमसे...

तुम, मैं...और हमारी असल सूरतें...........अनिल कान्त जी

सुनो आँखें बंद करो...क्यों...अरे बंद करो ना...पहले बताओ फिर...आँखें बंद करने पर मैं तुम्हें कहीं ले चलूँगा...कहाँ...ओह हो...कहता हुआ मैं उसकी आँखों पर अपनी नर्म हथेलियाँ रख देता हूँ...मैं तुम्हें अपनी फेवरेट जगह ले जा रहा हूँ अपने घर के पीछे का दरवाजा खोलते ही तुम दौड़ रही हो अपने पैरों तले बिछी हरी घास पर...उन पर बिखरी हल्की हल्की ओंस की बूँदें ऐसे चमक रही हैं जैसे मोती...दूर दूर तक फैला हुआ आसमान है...और उस पर अपनी खूबसूरती बिखेरता इन्द्रधनुष ऐसा लग रहा है मानों उसने अभी अभी होली खेली हो...उसे देखते ही तुम दौडी दौडी आकर मेरा हाथ पकड़ लेती हो और...

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

अगीत...........डा श्याम गुप्त

(ये प्रेम-अगीत, अतुकांत काव्य की एक विधा "अगीत" के नवीन छंद ’लयबद्ध अगीत’ में निबद्ध हैं) (१)गीत तुम्हारे मैंने गाये,अश्रु नयन में भर-भर आये,याद तुम्हारी घिर-घिर आई;गीत नहीं बन पाये मेरे।अब तो तेरी ही सरगम पर,मेरे गीत ढला करते हैं;मेरे ही रस,छंद,भाव सब ,मुझसे ही होगये पराये। (२)जब-जब तेरे आंसू छलके,सींच लिया था मन का उपवन;मेरे आंसू तेरे मन के,कोने को भी भिगो न पाये ।रीत गयी नयनों की गगरी,तार नहीं जुड पाये मन के ;पर आवाज मुझे देदेना,जब भी आंसू छलकें तेरे। (३)श्रेष्ठ कला का जो मंदिर था,तेरे गीत सज़ा मेरा मन;प्रियतम तेरी विरह-पीर...

दुम दबाकर.......(बाल कहानी) ......विमला भंडारी

काली बिल्ली ने सफेद बिल्ली को देखा और सफेद ने काली को। काली ने खुश होकर सफेद से कहा- ‘‘तुम्हें देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई।’’‘‘मुझे भी’’ सफेद ने जवाब दिया।‘‘कहां रहती हो?’’ काली ने पूछा।‘‘अभी नई-नई आई हूं, रहने की जगह तलाश कर रही हूं।’’‘‘मेरे घर रहोगी?’’ काली बिल्ली ने उससे आग्रह किया।‘‘मैं अकेली रहती हूं तुम साथ रहोगी तो अच्छा लगेगा।’’सफेद बिल्ली खुश होकर काली के साथ उसके घर चल दी। दोनों घर पहुंची।‘‘वाह! तुम्हारा घर तो बहुत सुन्दर है। क्या खूब तुमने...

रविवार, 4 अप्रैल 2010

नई सुबह................ (कहानी)......... निर्मला कपिला

आज मन बहुत खिन्न था।सुबह भाग दौड करते हुये काम निपटाने मे 9 बज गये। तैयार हुयी पर्स उठाया, आफिस के लिये निकलने ही लगी थी कि माँ जी ने हुकम सुना दिया *बहु एक कप तुलसी वाली चाय देती जाना।*मन खीज उठा , एक तो लेट हो रही हूँ किसी ने हाथ तो क्या बँटाना हुकम दिये जाना है ,फिर ये भी नही कि सब एक ही समय पर नाश्ता कर लें ,एक ही तरह का खा लें सब की पसंद अलग अलग । किसी को तुलसी वाली चाय तो किसी को इलाची वाली। मेरी तकलीफ कोई नही देखता।आज समाज को पढी लिखी बहु की जरूरत है जो नौकरी पेशा भी हो,कमाऊ हो। घर और नौकरी दो पाटों के बीच पिसती बहु को क्या चाहिये इसका समाधान...