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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नव वर्ष तुम्हारा स्वागत है...

नव वर्ष तुम्हारा स्वागत हैखुशियों की बस चाहत हैनया हो जोश, नया उल्लासखुशियाँ फैले अपरम्पारमिटे मँहगाई और भ्रष्टाचारजीवन स्तर में भी हो सुधारनैतिकता के ऊँचे मूल्य गढ़ेंसबकी मर्यादा रहे बरकरारकोई भूखा पेट न सोयेगरीबों का भी हो उद्धारऐ नव वर्ष के प्रथम प्रभातस्तुति तुम्हारी बारम्बार।आकांक्षा यादव...

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

डॉ0 वीणा श्रीवास्तव का स्मृति-उपवन है "कितने अपने"

मनुष्य कितना ही विकास क्यों न कर ले किन्तु वह स्वयं को स्मृतियों से मुक्त नहीं कर पाता है। पता नहीं यह मोहपाश है अथवा बीते पलों को न भुला पाने की विवशता कि व्यक्ति जाने-अनजाने ही स्मृतियों के विशाल उपवन में विचरण करने लगता है। सुखद पलों की सोंधी महक एसे भटकाती है तो दुःखद पलों के काँटों की चुभन एक टीस पैदा करती है। डॉ0 वीणा श्रीवास्तव की स्मृतियों का उपवन उन्हें भी कभी महकाता है तो कभी एक टीस सी देता दिखता है। इन स्मृतियों का वे आज जिस तरह स्वयं...

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

प्रतीक्षा के पल तुम्हारे.................(सत्यम शिवम)

प्रतीक्षा के पल तुम्हारे प्रिय,इतने प्यारे होंगे क्या पता था।मधुरस साथ तुम्हारा है प्रिय,हर क्षण, प्रतिपल ह्रदय में घुल कर,संगीतबद्ध हुआ आत्मा का कण कण,तेरी सुरीली प्रणय राग सुनकर। गुँजित हुआ झंकरित सा ह्रदय स्वर,गंगा सी पावन नदी सा बहा था। प्रतीक्षा के पल तुम्हारे प्रिय,इतने प्यारे होंगे क्या पता था। संसर्ग मिलन का होता अनोखा,प्रतीक्षा के पल बन जाते है सुहाने,चाँदनी रात में हमदोनों जो छत पे,ढ़ुँढ़ लेते है फिर मिलने के बहाने। थम क्यों ना...

रविवार, 26 दिसंबर 2010

मेरे सपने ने आज तोडा था मुझको ...neeshoo tiwari

सपनों के टूटने की खनक सेनींद भर सो न सका रात के अंधेरे में कोशिश की उनको बटोरने की कुछ इधर उधर गिरकर बिखर गए थेहाँ टूट गए थेएक अहसास चुभा सीने मेंजिसके दर्द से आँखें भर आई थी मैंने तो रोका था उस बूंद को कसमों की बंदिशों से शायद अब मोल न था इन कसमों काफिर उंघते हुए आगे हाथ बढ़ाया थावादों को पकड़ने के लिए लेकिन वो दूर था पहुँच से मेरी क्यूंकि धोखे से उसके छलावे को मैंने सच समझा था कुछ देर तक सुस्ताने की कोशिश की तो सामने नजर आया था उसके चेहरे का बिखरा टुकड़ा हाथ बढ़ाकर पकड़ना चाहा था लेकिन कुछ ही पल में चकनाचूर हो गया वो चेहरा मैं हारकर...

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

गंगा की घाटों पे वो..............(सत्यम शिवम)

गंगा की घाटों पे वो फिरता, न जाने है कितना अकेला। इक बहाव में बह गया वो, आज की शाम, जाने कब से निर्झर है ये शांत। युगों युगों से देखा है जिसने कई सदी। शाम की आरती का है समय, तन्हाईयों ने कर दिया फिर से अकेला। गंगा की घाटों पे वो फिरता,न जाने है कितना अकेला। ये शाम अब भी वैसा है,आसमां में चाँद,गँगा की धार में बहते कई नाव।गँगा के उस पार अब भी दिखता है इक गाँव। वो लोगों का जमावड़ा भी वैसे ही है,जैसा कभी हुआ करता था पहले। बदला तो है बस जहा मेरा,कल...

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

"ब्लॉगर मीट का आयोजन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

प्रिय ब्लॉगर मित्रो! अपार हर्ष के साथ आपको सूचित कर रहा हूँ कि नववर्ष 2011 के आगमन पर देवभूमि उत्तराखण्ड के खटीमा नगर में  एक ब्लॉगरमीट का आयोजन 9 जनवरी, 2011, रविवार को किया जा रहा है! इस अवसर पर आप सादर आमन्त्रित है। विस्तृत कार्यक्रम निम्नवत् है- खटीमा की दूरी निम्न नगरों से निम्नवत् है- मुरादाबाद से 160 किमी रुद्रपुर से 70 किमी बरेली से 95 किमी पीलीभीत से 38 किमी हल्द्वानी से 90 किमी देहरादून से 350 किमी हरिद्वार से 290 किमी दिल्ली से...

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

उसके सपने................(सत्यम शिवम)

उसके सपने है कुछ ऐसे, मुट्ठी में सिमटे, हथेली पे बिखरे, थोड़े से कच्चे, छोटे छोटे बच्चे, बिल्कुल सच्चे, कितने अच्छे। उसके सपने है कुछ ऐसे, है छोटा सा कद, आसमा का तलब,नन्हे से पावँ, नैनों में जलद,बिखरे से है लट, मुख पे है ये रट,उसे बनना है सब से ही अलग। उसके सपने है कुछ ऐसे, सरवर की डगर, छोटा सा है घर,पनघट का सफर, हैरान सा पहर,दुर्गम है जहान, उस पार वहाँ,पर मँजिल का निशा, बयाँ करता है उसका हौसला। उसके सपने है कुछ ऐसे, अट्टालिका से गिरी, खिड़की पे...

रविवार, 19 दिसंबर 2010

" 19 दिसम्बर की वह सुबह "--------(लेख)----मिथिलेश दुबे

रोज की तरह उस दिन भी सुबह होती है, लेकिन वह ऐसी सुबह थी जो सदियों तक लोगों के जेहन में रहेगी । दिसंबर का वह दिंन तारीख 19 , फांसी दी जानी थी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को । बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी दी जानी थी । रोज की तरह बिस्मिल ने सुबह उठकर नित्यकर्म किया और फांसी की प्रतीक्षा में बैठ गए । निरन्तर परमात्मा के मुख्य नाम ओम् का उच्चारण करते रहे । उनका चेहरा शान्त और तनाव रहित था । ईश्वर स्तुति उपासना मंन्त्र ओम् विश्वानि देवः सवितुर्दुरुतानि परासुव यद्रं भद्रं तन्न आसुव का उच्चारण किया । बिस्मिल बहुत हौसले के इंसान थे । वे...

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

सफर में ठोकर............... (सत्यम शिवम)

ठोकर ये कैसी मिली है सफर में, डुब गया है मन अब अँजाने भँवर में। हौसला मेरा अब ना पस्त हो जाये, मंजिल से पहले ही ना रास्ते खो जाये। एक मजाक बना हूँ मै नफरत के इस शहर में, मै घोलना चाहता हूँ, प्यार दुनिया के इस जहर में। ये जहर कही मेरी जिंदगी में ना घुल जाये, अरमाँ मेरे ना यूँ चकनाचूर हो जाये। सच्चाई का ना मोल है अब यहाँ, ईमानदारी भटक रही है यहाँ वहाँ, हैवानियत का नँगा नाच तो देखो, इंसानियत को दफनाते है खुद इंसान यहा। सच्चाई बस पागलपन समझी जाती...

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

बच्चे (कविता) सन्तोष कुमार "प्यासा"

कहते हैं रूप भगवान का होते हैं बच्चे भला फिर क्यूँ फिर भूख से तडपते, बिलखते  है बच्चे ? इल्म की सौगात क्यूँ न मयस्सर होती इन्हें मुफलिसी का बोझ नाजुक कंधो पर ढोते हैं बच्चे ललचाई हैं नजरें, ख़ुशी का "प्यासा" है मन फुटपाथ को माँ की गोद समझ कर सोते है बच्चे दर-दर की ठोकरें लिखती है, किस्मतें इनकी  भूख की हद जब होती है पार, जुर्म का बीज फिर बोते हैं बच्चे भला क्या दे पायेंगें कल, ये वतन को अपनी कुछ पाने की उम्र में खुद  को खोते ...

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

ऐ रात की तन्हाईयों, क्यों गुमशुम हो?........... (सत्यम शिवम)

ऐ रात की तन्हाईयों, क्यों गुमशुम हो,अँधेरे में ढ़ुँढ़ती परछाईया,क्यों तुम हो? एकाकी नभ का हर एक सितारा,फासलों के गम को झेल लो, फूलों पे मँडराते भ्रमरों,कोमल तन से तुम खेल लो। जी लो जीवन एक पल में सारा,आँख ना तेरा कभी नम हो। ऐ रात की तन्हाईयों,क्यों गुमशुम हो,अँधेरे में ढ़ुँढ़ती परछाईया,क्यों तुम हो? मस्ती की धुन पर थिरक बादल,बरस कर आसमा तु रो ले, जल जल कर दीपक का स्व तन,खुद का अस्तित्व ही खो ले। हँसता हुआ छोड़े तु जमाना,मर के भी ना तुझे गम हो। ऐ...

रविवार, 12 दिसंबर 2010

हाइकु ----------(दिलबाग विर्क )

तोड़ लेती है टहनियों से फूल स्वार्थी दुनिया व्यवस्था बुरी जब हम पिसते अन्यथा नहीं चाँदी काटना सत्ता का मकसद मेरे देश में नेता सेवक चुनावों के दौरान फिर मालिक इच्छा सबकी बदल दें...

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

आजान का वो स्वर सुना है (सत्यम शिवम)

मस्जिद में लगे ध्वनि विस्तारक यंत्रों से, आजान का वो स्वर सुना है। नमाजों में, दुआओं में, मुसलमानों के पाक इरादों में, दिख जाता मुझे आज भी वो खुदा है। खुदा ना जुदा है बंदो से, बंदगी उसकी अब भी वही है, मजहब वही है, खुदा वही है, इंसानियत ही बस आज सुना सुना है। मस्जिद में लगे ध्वनि विस्तारक यंत्रों से, आजान का वो स्वर सुना है। भाईचारा बद्सलूकी का हमराही बना, अलविदा कहा उस कौम को, खुदा भी ताकता रहा बंदो को, इशारा दिया जुबा को मौन से। वो ईद की...

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

रघुनाथ सहाय व सुधीर गुप्ता को मिला द्वितीय मिथलेश-रामेश्वर स्मृति प्रतिभा सम्मान, 2010

झाँसी। विगत दिनों झाँसी में चित्रांश ज्योति पत्रिका परिवार की ओर से दो सत्रों में आयोजित समारोह में समाज की अनेक प्रतिभाओं को समारोह के मुख्य अतिथि श्री प्रदीप जैन आदित्य (केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री) एवं विशिष्ट अतिथि स्थानीय विधायक श्री कैलाश साहू ने सम्मानित किया। सम्मान समारोह में बोलते हुए श्री जैन ने जहाँ सही मार्गदर्शन एवं प्रगति के लिए साहित्य व कला की उचित भूमिका के निर्वहन को ज़रूरी बताया और कहा कि साहित्यकार व कलाकार ही समाज...

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

क्या यही संस्कृति हमारी है??-----(कविता)----रेनु सिरोया

हाथ थाम कर चलो लाडले वरना तुम गिर जाओगे,आँख के तारे हो दुलारे हमको दुखी कर जाओगे,राजा बेटा पढ़ लिख कर तुम्हे बड़ा आदमी बनना है,नाम कमाना है दुनियां में कुल को रोशन करना है,सब कुछ गिरवी रखकर माँ बाप ने उसे पढाया,जी सके वो शान जग में इस काबिल उसे बनाया,बड़ा ऑफिसर बन गया बेटा माँ बाप की खुशियाँ चहकी,सब दुःख दूर हमारे होंगे ऐसी उम्मीदे महकी,बड़ी ख़ुशी से सुन्दर कन्या से उसका ब्याह रचाया,ढोल नगाड़े शहनाई संग दुल्हन घर में लाया,कुछ बरस में नन्हा पोता घर...

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

"तुम्हारी बातें ही आईना थी "------------मिथिलेश दुबे

तुम्हारी बातें ही आईना थीजिंसमे देखता था तुमको मैंटुकड़ो-टुकड़ो में मिलती थी खुशीदिन में कई बार।।उन दिनो यूं ही हम तुम खुश हुआ करते थेन तुमने मुझे देखा था औरन ही मैने तुमकोबना ली थी एक तस्विरतुम्हारी उन बातो सेसजा लिए थे सपनें रातों मेंतुम्हारी उन बातो सेमहसुस करता था तुमको हर पलकल्पंनाये न छोड़ती थी साथजिसपर बैठ कर तय करता था सफर अपना।।अच्छ लगता यूँ ही सब कुछसोचकर बाते तेरी मुस्कुराहटउतर आती थी होठो परकितना हसीन था वो पलवो साथजब बातें ही हमारी आवाजहमारें जज्बात बयां करती थी।।मै प्यार की गहराई तुम्हे समझाताऔर प्यार की ऊंचाईतुम चुपचाप ही सुनती...