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सोमवार, 30 नवंबर 2009

अनजाने रिश्ते का एहसास

अनजाने रिश्ते का एहसास,बयां करना मुश्किल था ।दिल की बात को ,लबों से कहना मुश्किल था ।।वक्त के साथ चलते रहे हम ,बदलते हालात के साथ बदलना मुश्किल था ।खामोशियां फिसलती रही देर तक,यूँ ही चुपचाप रहना मुश्किल था ।। सब्र तो होता है कुछ पल का ,जीवन भर इंतजार करना मुश्किल था ।वो दूर रहती तो सहते हम , पास होते हुए दूर जाना मुश्किल था ।।अनजाने रिश्ते का एहसास ,बयां करना मुश्किल था ।।...

शनिवार, 28 नवंबर 2009

तुम्हें याद करते ही --------{किशोर कुमार खोरेन्द्र

-क्यामैठीक ठीक व्ही हूजो मै होना चाहता थायाहो गया हू वहीजो मै होना चाहता हूकाई को हटाते हीजल सा स्वच्छकिरणों से भरा उज्जवलयाबूंदों से नम ,हवा मे बसीमिट्टी की सुगंधया -सागौन के पत्तो से ..आच्छादित -भरा-भरा सा सुना हरा वन-मै योगीक हूअखंड ,अविरल ,-प्रवाह हूलेकीनतुम्हें याद करते ही -जुदाई मे .....टीलो की तरहरेगिस्तान मे भटकता हुवानजर आता हूनमक की तरह पसीने से तर हो जाता हूस्वं को कभीचिता मे ...चन्दन सा -जलता हुवा पाता हू - और टूटे हुवे मिश्रित संयोग साकोयले के टुकडो की तरहयहाँ -वहांस्वयम बिखर जाता हू -सर्वत्र-लेकीन तुम्हारे प्यार की आंच सेतप्त लावे...

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

आज तुम फिर मुझसे खफा हो .........जानता हूँ मैं

आज तुम फिर खफा हो मुझसे,जानता हूँ मैं,न मनाऊगा तुमको,इस बार मैं।तुम्हारा उदास चेहरा,जिस पर झूठी हसी लिये,चुप हो तुम,घूमकर दूर बैठी,सर को झुकाये,बातों को सुनती,पर अनसुना करती तुम,ये अदायें पहचानता हूँ मैं,आज तुम फिर खफा हो मुझसे,जानता हूँ मैं।नर्म आखों में जलन क्यों है?सुर्ख होठों पे शिकन क्यों है?चेहरे पे तपन क्यों है?कहती जो एक बार मुझसे,तुम कुछ भी,मानता मै,लेकिन बिन बताये क्यों?आज तुम फिर खफा हो मुझसे,जानता हूँ मै।।प्रस्तुति-- न...

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

भूख का एहसास - लघुकथा (कुमारेन्द्र सिंह सेंगर)

उसने पूरी ताकत से चिल्लाकर कुछ पाने की गुहार लगाई। कई बार आवाज लगाने और दरवाजा भड़भड़ाने पर अंदर से घर की मालकिन बाहर निकलीं।-‘‘क्या है? क्यों शोर कर रहे हो?’’-‘‘कुछ खाने को दे दो, दो दिन से कुछ खाया नहीं’’ उस बच्चे ने डरते-डरते कहा।.............‘‘बहुत भूख लगी है’’ लड़के ने अपनी बात पूरी की।मालकिन ने उसको ऊपर से नीचे तक घूरा और कुछ कहती उससे पहले अंदर से उसके बेटे ने साड़ी खींचते हुए अपनी माँ से सवाल किया-‘‘मम्मी, भूख क्या होती है?’’उस औरत ने अपने बच्चे को गोद में उठाकर दरवाजे के बाहर खड़े बच्चे को देखा और कुछ लाने के लिए घर के अंदर चली ...

बादलों में चांद छिपता

बादलों में चांद छिपता है,निकलता है ,कभी अपना चेहरा दिखाता है ,कभी ढ़क लेता है ,उसकी रोशनी कम होती जाती हैफिर अचानक वही रोशनीएक सिरे से दूसरे सिरे तक तेज होती जाती है ।मैं इस लुका छिपी के खेल कोदेखता रहता हूँ देर तक,जाने क्यूँ बादलों सेचांद का छिपना - छिपानाअच्छा लग रहा है ,खामोश रात में आकाश की तरफ देखना ,मन को भा रहा है ,उस चांद में झांकते हुएन जाने क्यूँ तुम्हारा नूर नजर आ रहा है ।ऐसे में तुम्हारी कमी का एहसासबार - बार हो रहा है ।तुम्हारी यादें चांद ताजा कर रहा है,मैं तुमको भूलने की कोशिश करके भी ,आज याद कर रहा हूँ ,इन यादों की तड़प सेमन विचलित...

बुधवार, 25 नवंबर 2009

इंण्डिया कहकर गर्व का अनुभव करते हैं -------(मिथिलेश दुबे)

सन् १९४७ में भारत और भारतवासी विदेश दासता से मुक्त हो गये। भारत के संविधान के अनुसार हम भारतवासी 'प्रभुता सम्पन्न गणराज्य' के स्वतन्त्र नागरिक है। परन्तु विचारणीय यह है कि जिन कारणो ने हमें लगभग १ हजार वर्षो तक गुलाम बनाये रखा था , क्या वे कारण निशेःष हो गये है? जिन संकल्पो को लेकर हमने ९० बर्षो तक अनवरत् संघर्ष किया था क्या उन संकल्पो को हमने पूरा किया है? हमारे अन्दर देश शक्ति का अभाव है। देश की जमीन और मिट्टी से प्रेम होना देशभक्ति का प्रथम लक्षण माना गया है। भारत हमारी माता है उसका अंग- प्रत्यंग पर्वतो, वनो नदियो आदि द्वारा सुसज्जित है उसकी...

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

खामोश रात में तुम्हारी यादें

खामोश रात में तुम्हारी यादें,हल्की सी आहट केसाथ दस्तक देती हैं,बंद आखों से देखता हूँ तुमको,इंतजार करते-करतेपरेशां नहीं होता अब,आदत हो गयी है तुमको देर से आने की, कितनी बार तो शिकायत की थी तुम से ही,परक्या तुमने किसी बात पर गौर किया ,नहीं न ,आखिर मैं क्यों तुमसे इतनी ,उम्मीद करता हूँ ,क्यों मैं विश्वास करता हूँ,तुम पर,जान पाता कुछ भी नहीं ,पर तुमसे ही सारी उम्मीदें जुड़ी हैं,तन्हाई में,उदासी में ,जीवन के हस पल में, खामोश दस्तक के साथ आती हैं तुम्हारी यादें,महसूस करता हूँ तुम्हारी खुशबू को,तुम्हारे एहसास को,तुम्हारे दिल की धड़कन का बढ़ना, और तुम्हारे...

सोमवार, 23 नवंबर 2009

कमली .......................(कहानी )....................नीशू तिवारी

बचपन से ही तंग गलियों में बीता बचपन हमेशा ही एक हसीन सपना बुनता था उसका । मां , बाबा और कमली यही दुनिया थी उसकी । किसी तरह से कमली को उसके बाबा ने पेट तन काट कर पढ़ाने की कोशिश की । आज कमली इण्टर ( १२ वीं ) में दाखिल हुई थी । कमली तो खुश थी ही साथ ही साथ उसके बाबा की खुशी का ठिकाना न रहा था । कमली पढ़ाई में अव्वल रही थी हमेशा से ........इस कारण मां और बाबा ने हमेशा कमली को पढ़ाने के लिए कोई कोर कसर न छोड़ी थी । पैसे की कमी होते हुए भी किसी तरह से गुजारा चलता , स्कूल में कमली को टीचर जी ने मुफ्त ही ट्यूशन देने की बात कही थी । कमली भी पूरे मन से...

आज की जरूरत--------- {निर्मला कपिला }

नारी आज जरूरत आन पडीनि्रीक्षण् की परीक्षण कीउन सृजनात्मक संम्पदाओं केअवलोकन कीजिन पर थीसमाज की नींव पडीप्रभू ने दिया नारी कोकरुणा वत्सल्य का वरदानउसके कन्धों पररख दियासृष्टी सृजनशिशु-वृँद क चरित्र और्भविश्य का निर्माणबेशक तुम्हारी आज़ादी परतुम्हारा है हकमगर फर्ज़ को भी भूलो मतअगर बच्ची देश का भविश्यहो जायेगा दिशाहीनअपनी सभ्यता संस्कृति से विहीनतो तेरे गौरव मे क्या रह जायेगा?क्यों कि बदलते परिवेश मेआज़ादी के आवेश मेपत्नि, माँ के पास समयकहाँ रह जायेगाउठ,कर आत्म मंथनकि समाज को दिशा देने कीजिम्मेदारी कौन निभायेगाए त्याग की मूरतीतेरा त्यागमयी रूपकब...

रविवार, 22 नवंबर 2009

मजबूर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी----------( मिथिलेश दुबे)

जिस किसी ने भी 'मजबूरी का नाम, महात्मा गांधी' जैसी कहावत का आविष्कार किया, उसकी तारीफ की जानी चाहिए।महात्मा गांधी का नाम जपना और नीलाम होती उनकी नितांत निजी वस्तुओं को भारत लाना सरकार की मजबूरी है। महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने गांधी जी की वस्तुओं को भारत लाने का मुद्दा इतना उछाल दिया कि विशुद्ध मजबूरी में मनमोहन सिंह सरकार को सक्रिय होना पड़ा। लेकिन इस सक्रियता के पीछे कितनी उदासीनता थी, इसका पता सरकार और नीलामी में इन वस्तुओं को खरीदने वाले शराब- निर्माता और प्रसिद्ध उद्योगपति विजय माल्या के दावों- प्रतिदावों से साफ हो जाता है। सरकार...

शनिवार, 21 नवंबर 2009

शाम >>

शाम की छाई हुई धुंधली चादर से ढ़क जाती हैं मेरी यादें ,बेचैन हो उठता है मन,मैं ढ़ूढ़ता हूँ तुमको ,उन जगहों पर ,जहां कभी तुम चुपके-चुपके मिलने आती थी ,बैठकर वहां मैंमहसूस करना चाहता हूँ तुमको ,हवाओं के झोंकों में ,महसूस करना चाहता हूँ तुम्हारी खुशबू को ,देखकर उस रास्ते कोसुनना चाहता हूँ तुम्हारे पायलों की झंकार को ,और देखना चाहता हूँ टुपट्टे की आड़ में शर्माता तुम्हारा वो लाल चेहरा ,देर तक बैठ मैं निराश होता हूँ ,परेशान होता हूँ कभी कभी , आखें तरस खाकर मुझपे,यादें बनकर आंसू उतरती है गालों पर ,मैं खामोशी से हाथ बढ़ाकर ,थाम लेता हूं उन्हें...

शुक्रवार, 20 नवंबर 2009

हे भगवान ! खानें में इतना जहर

क्या आपको पता है हम और आप नित्य ही जहर का सेवन करते हे, । आप लोग सोच रहें होंगे कि ये कैसे हो सकता है। अगर हम नित्य जहर खाते तो मर नहीं जाते क्या ? बात तो सही है, जिस जहर का सेवन हम नित्य कर रहे है वह हमें इतने आसानी से थोड़ीं न मरने देगा। श्रृष्टि के आंरभ से ही भोजन की एक अनिवार्य आवश्यकता रही है। मानव के लिए ही नहीं, पशु-पक्षियों एंव वनस्पतियों के लिए। प्राचिनकाल में मनुष्य शिलाग्रहों (गुफाओं) में निवास करते थे, । पशु पक्षियों का माश भी उनके उदरपोषण का साधन था। वैदिक युग में कृषि की शुरुआत हुई। वैदिक सूक्तों में कृषि तथा अन्न से संबधित इंद्र,...

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

मनोरंजन या संस्कृति पे आघात

"भारत की महान संस्कृति पर क्या "हमला नही हो रहा है ?" क्या आपको नही लगता की हमारे घरो मे नित्यदिन चलने वाले मानोरंजक सीरियल जिन्हे हम अपने परिवार के साथ देखते है, हमारी संस्कृति की ख़राब पेशकश इन सीरियलो द्वारा हो रही है ?आपके बच्चो पर इनका क्या असर होगा ?। देखने मे ये सीरियल पारिवारिक लगते है और बङे चाव से हम अपने परिवार के साथ बैठ कर देखते है। और अचानक कोई ऐसा दृश्य जो की आपत्तीजनक अवस्था मे होता है, तब हम उस चैनल को हटा देते है क्यो? हमे लगता है की सायद हम ऐसा करेगें तो बच्चे उस अश्लिल दृश्य को न देख पाये। पर जब हम ऐसा करते होगे तब बच्चो के...

बुधवार, 18 नवंबर 2009

" कविता प्रतियोगिता सूचना "---- भाग लें और जीतें इनाम----

हिन्दी साहित्य मंच "तृतीय कविता प्रतियोगिता" दिसंबर माह से शुरु हो रही है। इस कविता प्रतियोगिता के लिए किसी विषय का निर्धारण नहीं किया गया है अतः साहित्यप्रेमी स्वइच्छा से किसी भी विषय पर अपनी रचना भेज सकते हैं । रचना आपकी स्वरचित होना अनिवार्य है । आपकी रचना हमें नवंबर माह के अन्तिम दिन तक मिल जानी चाहिए । इसके बाद आयी हुई रचना स्वीकार नहीं की जायेगी ।आप अपनी रचना हमें " यूनिकोड या क्रूर्तिदेव " फांट में ही भेंजें । आप सभी से यह अनुरोध है कि मात्र एक ही रचना हमें कविता प्रतियोगिता हेतु भेजें ।प्रथम द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर आने वाली रचना को...

असफलता और निराशा में सफलता व आशा का दर्शन करें

"सफलता का एक कोई पल नही,विफलता की गोद में ही गीत है।हार कर भी जो नही हारा कभी,सफलता उसके ह्रदय का गीत है।"असफलता को सफलता की प्रेरणा और निराशा को आशा की जननी मानने वाले व्कति ही सफल होते है।जब कोई घुङसवार घोङे से गिरता है, तब वह तुरन्त अपने कपङे झाङकर और चोटिल शरीरांगो को सहलाकर दुबारा घोङे पर बैठ जाता है, क्योकिं उसको विश्वास रहता है कि दो चार बार गिरने के बाद ठीक तरह से घुङसवारी करना आ जाएगा जो चढेगा नही वह गिरेगा क्यो? जो गिरकर बैठ जाएगा वह चढना क्योकंर सीख पाएगा? दोष गिरने मे नहीं, गिरकर न उठने मे है।घुङसवार की मानसिकता से क्या हम कोई शिक्षा...

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

जैसे इन सब को पता है कि..............................................तुम आ चुकी हो

हवाओं में प्यार की खुशबू,बिखरी हुई है ,फिजाएं भी महकी,हुई है,खामोश रातें रौशन ,हुई हैं,चांदनी भी चंचल ,हुई है ,बूदें जैसे मोती,हुई हैं,सूरज की किरणें चमकीलीहुई हैं,बागों की कलियां खिल सी ,गयी हैं,अम्बर से घटाएं ,बहने लगी हैं,मिट्टी की खुशबू,फैली हुई हैं, चारो तरफजैसे इन सब को पता है कि-तुम आ चुकी हो,वापस आ चुकी हो।।द्वारा भेजा गया nee...

सोमवार, 16 नवंबर 2009

कचरे से बने समुद्री डाकू

अफ्रीका के ऊपरी छोर पर बसा सोमालिया देश पिछले दो वर्षों से लगातार खबरों में है। पुरानी कहानियों के साथ डूब गए समुद्री डाकू यहां अपने नए रूप में फिर से तैरने लगे हैं। हम सब जानते हैं कि कचरे से खाद बनती है पर यदि कचरा बहुत अधिक जहरीला हो तो उससे क्या बनेगा? स्वतंत्र पत्रकार श्री क्रिस मिल्टर बता रहे हैं कि भयानक जहरीले कचरे से बने हैं ये भयानक समुद्री डाकू! सन् 2008 और 2009 में सोमालिया के समुद्री डाकुओं ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुख्याति अर्जित कर ली है। इस दौरान उन्होंने हथियार ढोने वाले जहाज, तेल टेंकर और क्रूज जैसे जहाजों का अपहरण किया है और...