हमारा प्रयास हिंदी विकास आइये हमारे साथ हिंदी साहित्य मंच पर ..

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

लोग--------- (संतोष कुमार "प्यासा")

आखिर किस सभ्यता का बीज बो रहे हैं लोग अपनी ही गलतियों पर आज रो रहे हैं लोग हर तरफ फैली है झूठ और फरेब की आग फिर भी अंजान बने सो रहे है लोग दौलत की आरजू में यूं मशगूल हैं सब झूठी शान के लिए खुद को खो रहे हैं लोग जाति, धर्म और मजहब के नाम पर लहू का दाग लहू से धो रहे हैं लोग ऋषि मुनियों के इस पाक जमीं पर क्या थे और क्या हो रहे है लोग...

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का अद्भुत ‘प्रताप’ (जन्मतिथि 26 अक्टूबर पर)

साहित्य की सदैव से समाज में प्रमुख भूमिका रही है। स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान पत्र-पत्रिकाओं में विद्यमान क्रान्ति की ज्वाला क्रान्तिकारियों से कम प्रखर नहीं थी। इनमें प्रकाशित रचनायें जहाँ स्वतन्त्रता आन्दोलन को एक मजबूत आधार प्रदान करती थीं, वहीं लोगों में बखूबी जन जागरण का कार्य भी करती थीं। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी‘ साहित्य और पत्रकारिता के ऐसे ही शीर्ष स्तम्भ थे, जिनके अखबार ‘प्रताप‘ ने स्वाधीनता आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। प्रताप के जरिये न जाने कितने क्रान्तिकारी स्वाधीनता आन्दोलन से रूबरू हुए, वहीं समय-समय पर यह अखबार क्रान्तिकारियों...

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2009

समाज सेवा - लघुकथा (डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर)

श्रीमान जी व्यवस्था की अव्यवस्था से लड़ते-लड़ते जब हार गये तब गहन अंधकार के बीच विकास की नई रोशनी उन्हें दिखलाई दी या कहिये कि उनके मन-मष्तिष्क में प्रस्फुटित हो गई। आनन-फानन में एक संस्था का गठन, शहर के बीचोंबीच शानदार कार्यालय, क्षेत्रीय विधायक जी द्वारा उदघाटन, दो-चार फोटो, फ्लैश, पत्रकार और फिर समाचार-पत्रों में सुर्खियाँ।नेताजी का भाव-विभोर करता भाषण और श्रीमान जी के हृदय को छूने वाले उद्देश्य; संस्था के गठन का उद्देश्य, ग्रामीणों, असहायों के विकास को संकल्पित निश्चय। सभी कुछ लाजवाब, सभी कुछ सराहनीय।श्रीमान जी का कार्य प्रारम्भ हो चुका था।...

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009

झर -झर जीवन ---------( डा श्याम गुप्ता )

यह मेरा निर्झर मन है ,जो झर झर झर झर झर बहता अविरल गति से बहते बहते ,जीवन की कविता कहता जीवन क्या है ,मलयानिल -पुरवाई बहती रहती है सुख दुःख आते रहते हैं ,यह दुनिया चलती रहती है जीवन क्या है मंद मंद धुन पर ढलता संगीत है जीवन लय है ताल है सुर है ,जीवन सुन्दर गीत है प्रियतम-प्रिय का मिलना जीवन , साँसों का चलना है जीवन मिलना और बिछुड़ना जीवन,जीवन हार ,जीत भी जीवन कोइ कहता नर से जीवन,कोइ कहता नारी जीवन नर-नारी जब सुसहमत हों,आताही तब घर में जीवन जीवन तो बस इक कविता है,कवी जिसमें भरता है जीवन सारा जग यदि कवी बनजाये,पल-पल मुस्काये ये जीवन गीत का बनना,...

सोमवार, 19 अक्टूबर 2009

मेरा काम न हुआ तो, ....... छाप देंगे ---(कुलदीप कुमार मिश्र)

हमको जानते हो... हम कौन हैं? जरा तमीज से बात करो हमसे वरना हम........छाप देंगे। क्या बात है। आज शहर हो या प्रदेश या फिर देश-दुनिया किसी भी स्थान पर देखने को मिल जाते हैं 'प्रेस' को अपने नाम के साथ जोडऩे वाले। प्रेस का मतलब इनके लिये किसी संस्थान में नौकरी करने वाला एक कर्मचारी नहीं बल्कि खुद प्रेस मालिक अर्थात अखबार वाला होता है। हर किसी से बोलने का लहेजा भी कुछ अलग होता है इनका। मेरा काम नहीं हुआ तो हम........छाप देंगे। सिर्फ इतना बोलने पर इन लोगों के बड़े से बड़े काम हो जाते हैं। ये लोग सिर्फ नाम से काम चलाते रहते हैं। अखबार तो कभी निकलता नहीं...

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

सफ़र में हूँ अब तो सफर काटता है (जतिन्दर परवाज़)

वो नज़रों से मेरी नज़र काटता हैमुहब्बत का पहला असर काटता हैमुझे घर में भी चैन पड़ता नही थासफ़र में हूँ अब तो सफर काटता हैये माँ की दुआएं हिफाज़त करेंगीये ताबीज़ सब की नज़र काटता हैतुम्हारी जफ़ा पर मैं ग़ज़लें कहूँगासुना है हुनर को हुनर काटता हैये फिरका-परसती ये नफरत की आंधीपड़ोसी, पड़ोसी का सर काटता...

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

स्वप्न .यह धरती का है -----------(किशोर कुमार)

स्वप्न .यह धरती का है ..-गोल धरती ....जैसे पानी की एक बूंद ...उसके सपनों के महासागर से उछलकर ..मछली की तरह मै ....कहां जा पाता हू बाहर ......-लौट आता हू .....शहर से गाँव ...गाँव में अपने घर आंगन ....-फ़िर विचारो के जलाशय में ....डूबे हुवे मन को ...ढूडने के लिए बैठा रहता हूँ ....बिछा कर एक जाल......-स्वप्न यह धरती का है ....पर डूबा रहता हूँ मै ...कभी ...किसी के कश् में धुंवो सा छितरा कर अदृश्य हो जाता हूँ .....कभी..गरीब -फुटपाथ के किनारे सिक्को सा उछल जाता हूँ ....-और फ़िर चढ़ने -उतरने के दर्द को पग-dndiyo सा ...पहाडे की तरह रटता हूँ मै ....याकाँटों...

सोमवार, 12 अक्टूबर 2009

शिक्षा का बदलता स्वरूप----------(कुलदीप कुमार मिश्र)

शिक्षा का बदलता स्वरूपबिना गुरु के ज्ञान असम्भववर्तमान समय में लोग कहते हैं कि गुरु व शिष्य के बीच सेवा भाव का लोप हो गया है। लेकिन ऐसा नहीं है। गुरु अपने शिष्य को विद्यालय से अलग बुलाकर विशेष तरीके से उसको शिक्षित करता है। शिष्य भी अपने कत्र्तव्य से पीछे नहीं हटता है। अपने गुरु व गुरुजी के घर के सारे कामों को बखूबी जिम्मेदारी से करता है। आधुनिक गुरु अर्थात अध्यापक लोग अपने शिष्यों यानी छात्रों के लिये विशेष शिक्षा केन्द्रजैसे कोचिंग सेण्टर व इंस्टीट्यूट जैसे कुटीर व लघु शिक्षा केन्द्रों (उद्योग धन्धों) का शुभारम्भ किया बल्कि उसे पूर्ण रूप से विकसित...

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

दिल की बात है कविता---------" डा० श्याम गुप्त "

न मैं कवि न शायर,गज़लगोन न मैं कोई गीतकार हूं ।उठती है दिल में बात जो,मैं उसी का निबहगार हूं । इस दिल में जब भी उठी सदा, ये दिल कभी जो मचल गया । वो गुबार उनकी याद का , यूं ज़ुबां पै आके फ़िसल गया। कोई देश पे कुर्बां हुआ, कोई राष्ट्र हित कुछ कर गया। कोई अपनी सारी ज़िन्दगी, इन्सानियत पै लुटा गया । जो कसीदे उन के लिख दिये, जो ज़ुबां से गीत फ़िसल गया। वही नग्मे सुर में गा दिये , ...

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

मेरे इस संसार को यारों किसने खाक बना डाला-------"कुलदीप कुमार मिश्र"

मेरे इस संसार को यारों किसने खाक बना डालाआग लगा दी दुनिया ने बस्ती को राख बना डालाचले नहीं थे काँटों पर हम तपती रेत मिली मुझकोफिर भी निकल पड़े हम घर से फूल समझ उसको यारोंमुझे क्या पता लोग मेरे एक दिन दुश्मन हों जायेंगेमेरे बिस्तर से मुझे हटा उस पर ख़ुद ही सो जायेंगेआया था तूफान एक दिन जब मै छोटा थासभी लोग हँसते थे यारों, जब मै रोता थागया लड़कपन जब से मेरा तब से मै कुछ बड़ा हुआरेत को लेकर मुट्ठी में फिर से थोड़ा मै खड़ा हुआमेरी इस दुनिया को यारों किसने नर्क बना डालाज़हर पिला कर उसने तो लोगों को सर्प बना डालामेरे इस संसार को यारों किसने खाक बना डालाआग...

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

यूँ ही उदास है दिल--------जतिन्दर परवाज़

यूँ ही उदास है दिल बेकरार थोड़ी हैमुझे किसी का कोई इंतजार थोड़ी हैनजर मिला के भी तुम से गिला करूँ कैसेतुम्हारे दिल पे मेरा इख़्तियार थोड़ी हैमुझे भी नींद न आए उसे भी चैन न होहमारे बीच भला इतना प्यार थोड़ी हैख़िज़ा ही ढूंडती रहती है दर-ब-दर मुझकोमेरी तलाश मैं पागल बहार थोड़ी हैन जाने कौन यहाँ सांप बन के डस जाएयहाँ किसी का कोई ऐतबार थोड़ी...

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009

प्रिये...................................कविता ( नीशू तिवारी )

प्रिये ,आज तुम फिर क्यों ?इतनी देर से आयी हो ,तुम्हारे इंतजार में मैंनेकितने ही सपने सजायेपर तुम्हारे बगैर ये कितनेअधूरे से हैं ।मैंने तो कितनी ही बारतुमसे शिकायत कीपरतुमने हमेशा ही अपनीमुस्कुराहट से ,जीत लिया मुझे,तुमसे इस तरह तुम्हारी शिकायत करनाअच्छा लगता है मुझे ,प्रिये,तुम्हारा इंतजार करते- करतेमैंनें बंद कर ली थी आंखें,बंद आंखों में तुम्हारीयादे तैरने लगी थी ,एक उम्मीद थी किशायद इन यादों के साथनींद के आगोश मेंसमा जाऊं मैं ,करवटें बदल- बदल करकोशिश की थी ,रात भर सोने कीपरसफल न हो सका था ।कमरे के दरवाजे सेमंदिर के जलते दियेकी रोशनी ,चांद की...

बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

हिन्दी शब्द कहां से आया ?????????

जैसा की हम जानते है कि हिन्दी हमारी मातृ भाषा है। हिन्दी प्रमियो के लिए यह माह कुछ खास होता है, कारण साफ है हिन्दी दिवस जल्द ही बीता है। तो क्यों ना ये भी जाना जायें कि हिन्दी "शब्द" कहाँ से और कैसे आया। हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा है और भारत की सबसे ज्यादा बोली और समझी जानेवाली भाषा है। चीनी के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है। हिन्दी और इसकी बोलियाँ उत्तर एवं मध्य भारत के विविध प्रांतों में बोली जाती हैं । भारत और विदेश में ६० करोड़ (६०० मिलियन) से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरिशस,...

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

मेरे प्यार के बदले----------------(किशोर कुमार खोरेन्द्र)

-मेरे प्यार के बदलेतुम मुझेअपने मन मे रख लोतुम्हारे अश्रु सारे पी जाउंगानिहार लूँगा मै तुम्हेजब देखोगी तुम दर्पणतुम मुझे अपने नयन मे रख लो-मेरे प्यार के बदलेतुम मुझे अपने स्मरण मे रख लोतुम्हारी कल्पनाओ मे स्मृतियों का रंग बन जाऊँगाआह्लादित हो जाउंगा तुम्हारी गरीमा सेतुम मुझे अपने शरण मे रख लो-मेरे प्यार के बदलेतुम मुझे अपने सपनो के आँगन के कण -कण मे रख लोबिछुड़ने न दूंगा प्रणय-पल को स्वप्न मे भीमिट जाऊंगा मै भी संग तुम्हारेतुम मुझे अपने निज समर्पण मे रख लो-देह कहा अमर हैआजमरण ,कल नूतन बचपन हैमेरे प्यार के बदलेहे प्रिये -तुम मुझे -अपने साथ भावी...

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

ऎ मेरे मन ---------------

ए मेरे मनए मेरे मनए मेरे मन......।कैसे समझाऊं तुझे, कैसे बतलाऊं तुझे?कौन है तेरा यहां, कौन है तेरा यहां ?ए मेरे मन..ए मेरे मन..ए मेरे मन.........।कौन है जो तेरी यादों में समाया आकर,किसके तू गीत गुनुगुनाता है।किसके वादों में लिपट कर खुद को खोया,किसकी बातों में बहक करके गीत गाता है।ए मेरे मन...एमेरे मन...ए मेरे मन............।कौन सी शोख अदाओं मेंअटक कर भूला,कौन ज़ुल्फ़ों की घनी छांव में बुलाता है?किसकी बाहों में लिपटने के सज़ाये सपने,किससे मिलने की धुन सज़ाता है?ए मेरे मन...ए मेरे मन...ए मेरे मन...........।कौन किसका है इस ज़माने में,प्यार सिसका है...

रविवार, 4 अक्टूबर 2009

बारिशों में नहाना भूल गए-------------(जतिन्दर परवाज़ )

बारिशों में नहाना भूल गएतुम भी क्या वो जमाना भूल गएकम्प्यूटर किताबें याद रहींतितलियों का ठिकाना भूल गएफल तो आते नहीं थे पेडों परअब तो पंछी भी आना भूल गएयूँ उसे याद कर के रोते हैंजेसे कोई ख़जाना भूल गएमैं तो बचपन से ही हूँ संजीदातुम भी अब मुस्कराना भूल ...

शनिवार, 3 अक्टूबर 2009

तुम्हें याद करते ही --------{किशोर कुमार खोरेन्द्र }

-क्यामैठीक ठीक व्ही हूजो मै होना चाहता थायाहो गया हू वहीजो मै होना चाहता हूकाई को हटाते हीजल सा स्वच्छकिरणों से भरा उज्जवलयाबूंदों से नम ,हवा मे बसीमिट्टी की सुगंधया -सागौन के पत्तो से ..आच्छादित -भरा-भरा सा सुना हरा वन-मै योगीक हूअखंड ,अविरल ,-प्रवाह हूलेकीनतुम्हें याद करते ही -जुदाई मे .....टीलो की तरहरेगिस्तान मे भटकता हुवानजर आता हूनमक की तरह पसीने से तर हो जाता हूस्वं को कभीचिता मे ...चन्दन सा -जलता हुवा पाता हू - और टूटे हुवे मिश्रित संयोग साकोयले के टुकडो की तरहयहाँ -वहांस्वयम बिखर जाता हू -सर्वत्र-लेकीन तुम्हारे प्यार की आंच सेतप्त लावे...

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

मजबूर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

जिस किसी ने भी 'मजबूरी का नाम, महात्मा गांधी' जैसी कहावत का आविष्कार किया, उसकी तारीफ की जानी चाहिए।महात्मा गांधी का नाम जपना और नीलाम होती उनकी नितांत निजी वस्तुओं को भारत लाना सरकार की मजबूरी है। महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी ने गांधी जी की वस्तुओं को भारत लाने का मुद्दा इतना उछाल दिया कि विशुद्ध मजबूरी में मनमोहन सिंह सरकार को सक्रिय होना पड़ा। लेकिन इस सक्रियता के पीछे कितनी उदासीनता थी, इसका पता सरकार और नीलामी में इन वस्तुओं को खरीदने वाले शराब- निर्माता और प्रसिद्ध उद्योगपति विजय माल्या के दावों- प्रतिदावों से साफ हो जाता है। सरकार...