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मंगलवार, 18 मई 2010

तुम्हारी खामोशियाँ .......(गजल)................अनामिका (सुनीता)


आज ये खामोशियाँ सिमटती क्यों नहीं
हाल-ऐ-दिल आपके लब सुनते क्यों नहीं..

कभी तो फैला दो अपनी बाहों का फलक
मेरी आँखों की दुआ तुम तक जाती क्यों नहीं..

दर्द-ऐ-दिल बार-बार पलकों को भिगो जाता है ...
आपका खामोश रहना मुझे भीतर तक तोड़ जाता है..

मुहोब्बत मेरी जिंदगी की मुझसे रूठने लगी है ..
अंधेरे मेरी जिंदगी की तरफ़ बढ़ने लगे है..

बे-इंतिहा मुहोब्बत का असर आज होता क्यों नहीं..
मेरी आत्मा में बसे हो तुम, ये तुम जानते क्यों नहीं..

दिन-रात मेरी दुआओ में तुम हो ये तुम मानते क्यों नहीं ..
कोई वजूद नही मेरा तुम बिन, ये तुम जानते क्यों नहीं॥

खामोश लब तुम्हारे आज बोलते क्यों नहीं
भेद जिया के मुझ संग खोलते क्यों नहीं..!! 

16 comments:

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

दिन-रात मेरी दुआओ में तुम हो ये तुम मानते क्यों नहीं ..
कोई वजूद नही मेरा तुम बिन, ये तुम जानते क्यों नहीं॥

बहुत अच्छी लगी ये लाइन ....यूं ही लिखती रहें

faij ने कहा…

bahut hi unda gazal lagi ...padh kar mza aa gya .. badahi

neeshoo ने कहा…

pyar par sundar gazal ...shabd kuch kamjor lage ...aabhar

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

bahut khub ...gazal bahut hi shaandar hai ..ye sher bahut hi accha laga .
दिन-रात मेरी दुआओ में तुम हो ये तुम मानते क्यों नहीं ..
कोई वजूद नही मेरा तुम बिन, ये तुम जानते क्यों नहीं॥

M VERMA ने कहा…

खामोश लब तुम्हारे आज बोलते क्यों नहीं
भेद जिया के मुझ संग खोलते क्यों नहीं..!!
बेहतरीन रचना एहसास की

वन्दना ने कहा…

आज ये खामोशियाँ सिमटती क्यों नहीं
हाल-ऐ-दिल आपके लब सुनते क्यों नहीं..
बहुत ही सुन्दर भाव्।

sangeeta swarup ने कहा…

भावों को बेहतरीन शब्द दिए हैं....सुन्दर रचना

बेनामी ने कहा…

thik hai.
parkar accha laga.
aapse aur behtar GAZAL ki umeed hai.'



Ashutosh

'अदा' ने कहा…

sundar kavita...
badhaii..

सुमन'मीत' ने कहा…

एहसास से सरोबर रचना । सुन्दर........

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

सुन्दर रचना. बधाई.

अमिताभ श्रीवास्तव ने कहा…

are waah, bahut khoob, badhaai

संजय भास्कर ने कहा…

bahut khub ...gazal bahut hi shaandar hai

"KaushiK" ने कहा…

achhi rachna hai....urdu ke lafjon ka paryog achhe se kiya hai....isse bhi behtar ki umeed rahegi.

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

आप सब ने मेरी रचना को सराहना के शब्द दिए इसके लिए में आप सब की दिल से आभारी हूँ.

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

सुन्दर भावाव्यक्ति, बधाई--

यह मुकम्मिल गज़ल नहीं---इसे नज़्म, कलाम या कविता कहिये , गज़ल कहने का और प्रयास करें.