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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

प्रस्तर प्रतिमा ------[ डाo श्याम गुप्त ]

वे बहुत बड़े ज्ञानी हैं ,
विद्वान् हैं,नामी हैं, मानी हैं;
ऊँचे पद पर बैठे हैं ,
स्वयं में बहुत ऊंचाई समेटे हैं |
जनता उनके पास पहुँच भी नहीं पाती है,
उनकी ओर देखने पर ,
लोगों की टोपी गिर जाती है |
वे जन जन के काम कहाँ आते हैं,
वे आदमी कहाँ ,
पत्थर की निर्जीव मूर्ति नज़र आते हैं ||

5 comments:

Mithilesh dubey ने कहा…

सच बयाँ करती खूबसूरत रचना ।

Udan Tashtari ने कहा…

तथाकथित पूज्यनियों का यही हाल है.

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

श्याम जी आभार आपका ।

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

श्याम जी आपने सच्चाई को उकेरती अच्छी रचना प्रस्तुत की , ।

neeshoo ने कहा…

अगीत के माध्यम से अच्छा व्यंग्य किया है आपने सर जी ।