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गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

शाश्वत मौन ==== कविता=== डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

एक मौन,
शाश्वत मौन,
तोड़ने की कोशिश में
और बिखर-बिखर जाता मौन।
कितना आसान लगता है
कभी-कभी
एक कदम उठाना
और फिर उसे वापस रखना,
और कभी-कभी
कितना ही मुश्किल सा लगता है
एक कदम उठाना भी।
डरना अपने आपसे और
चल देना डर को मिटाने,
कहीं हो न जाये कुछ अलग,
कहीं हो जाये न कुछ विलग।
अपने को अपने में समेटना,
अपने को अपने में सहेजना,
भागना अपने से दूर,
देखना अपने को मजबूर,
क्यों....क्यों....क्यों???
कौन देगा
इन प्रश्नों के जवाब?
फिर पसर सा जाता है
वही मौन... वही मौन...
जैसे कुछ हुआ ही न हो,
जैसे कुछ घटा ही न हो।
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किसी भी गलत को होता देखने के बाद उसका विरोध करने न करने को लेकर होते द्वंद्व के बाद लिखी कविता।

7 comments:

RaniVishal ने कहा…

विचारो कि कश्मकश का सुन्दर चित्रण...आभार!!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खुब , सुन्दर चित्रण किया है आपने अन्तर द्वंद का ।

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

सुन्दर चित्रण किया है आपने अन्तर द्वंद का ।

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

बहुत ही जानदार रचना लगी ।

वन्दना ने कहा…

antardwand ko bahut hi sundar shabdon se paribhashit kiya hai.

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

बहुत ही बढिया प्रस्तुति अन्तद्वंद के उपर ।

neeshoo ने कहा…

कविता वाकई सुन्दर बनी है ।