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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

प्रेम से परहेज नहीं है ........कविता ........[आशुतोष ओझा]



प्रेम से परहेज नहीं है
लेकिन
उसके ' नरभक्षी' होने से
डरता हूँ।
देह का अपना प्रमेय है
उसमें अंक नहीं
सिर्फ, रेखायें ही दिखती हैं
उनके उतार-चढ़ाव की कोणदृष्टि
से बनी ' गजगामिनी'
सभी को भाती है
लेकिन,
जांघों के बीच समां जाने को
परिणति नहीं मानता
प्रेम से परहेज नहीं है
लेकिन,
उसके 'नरभक्षी' होने से
डरता हूँ।

गंगा में डुबकी लगाना
मन वचन और कर्म से पावन है
लेकिन
खापों और पंचायतों के सम्मान में
असमय उसमें समा जाने की
' कायरता ' को
प्रेम के लिए परित्याग नहीं मानता
प्रेम से परहेज नहीं है
लेकिन
उसके ' नरभक्षी' होने से
डरता हूँ ।

प्रेम की संकरी गली में
'संत ' बनकर आराधना करना
सौभाग्य है
लेकिन
विरह, वियोग , विछोभ
बेबसी के निश्चित ' प्रसाद ' को
बेहूदा न्याय मानता हूँ।
प्रेम से परहेज नहीं है
लेकिन
उसके' नरभक्षी' होने से डरता हूँ ।।।।


11 comments:

Amitraghat ने कहा…

"गजब..शानदार लिखा आशुतोष, "खापों" वाला स्टेंजा बहुत अच्छा लगा शुभकामनायें फिर मिलेंगे..."
प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

bhupendra ने कहा…

बहुत शानदार। आपकी कविता की खास बात यह है कि इसमें समसामयिकता का पुट है। खाप पंचायत के कारनामों पर अपने जिस तरह निशाना साधा है, वह काबिलेतारीफ है। उम्मीद है कि भविष्य में आपकी और कविताएं पढ़ने को मिलेंगी। भविष्य के लिए आपको साधुवाद।

बेनामी ने कहा…

aap ne thik pharmaya hai sharir ki mansalta hi prem ki kasauti nahi hoti. lekin sath hi mera yeh bhi kahana hai ki virah aur dukh se prem ki pratistha aur badhti hai.
kavita me bhav aur kathya behtar hai. ummid hai aur achhi kavitayen padhane ko milti rahengi.
alok kumar

Mithilesh dubey ने कहा…

आशुतोष जी कमाल कर दिया आपने , काश कि आप जैसे प्यार के मंतव्य को हर कोई समझ पाता । लाजवाब प्रस्तुति ।

बेनामी ने कहा…

bhaya man ko bha gai aap ki kavita.
kya bat hai. prem rogi hai kya aap bhi.

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

आशुतोष जी इस समसामायिक कविता के लिए बधाई ।

neeshoo ने कहा…

आशुतोष जी , आपकी कविता बहुत ही अच्छी लगी , मैं अगर खुलकर कहूँ तो स्वछंद और खुलापन लिये है यह रचना । खासकर ये लाइन-
देह का अपना प्रमेय है
उसमें अंक नहीं
सिर्फ, रेखायें ही दिखती हैं
उनके उतार-चढ़ाव की कोणदृष्टि
से बनी ' गजगामिनी'
सभी को भाती है
लेकिन,
जांघों के बीच समां जाने को
परिणति नहीं मानता

ऐसे ही जोरदार लिखते रहिये ।

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

क्या खुब लिखा है आशुतोष जी , आपको बहुत-बहुत बधाई इस मनमोहन कविता के लिए ।

वन्दना ने कहा…

gazab ki shandar rachna..........badhayi ..........aise hi likhte rahiye.

अमृत पाल सिंह ने कहा…

बहुत खूब।

बेनामी ने कहा…

jjijoijoijojiojijiojij