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रविवार, 13 सितंबर 2009

"आँख में चुभने लगा है"- गजल (जतिन्दर परवाज की )


शजर पर एक ही पत्ता बचा है



हवा की आँख में चुभने लगा है



नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से



समन्दर बारिशों में भीगता है



कभी जुगनू कभी तितली के पीछे



मेरा बचपन अभी तक भागता है



सभी के ख़ून में ग़ैरत नही पर



लहू सब की रगों में दोड़ता है



जवानी क्या मेरे बेटे पे आई



मेरी आँखों में आँखे डालता है



चलो हम भी किनारे बैठ जायें



ग़ज़ल ग़ालिब सी दरिया गा रहा है

8 comments:

Mithilesh dubey ने कहा…

परवाज जी क्या बात है। एक और लाजवाब गजल। बधाई.......

Apoorv ने कहा…

नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से
समन्दर बारिशों में भीगता है

एक निहायत ही खूबसूरत सी कशिश है ग़ज़ल में..एक एक शेर जैसे नगीने सा जड़ा गया हो..बधाई

neeshoo ने कहा…

शजर पर एक ही पत्ता बचा है

हवा की आँख में चुभने लगा है

नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से

समन्दर बारिशों में भीगता है




खूबसूरत गजल ।

दिनेश शर्मा ने कहा…

सभी के ख़ून में ग़ैरत नही पर
लहू सब की रगों में दोड़ता है
सही कहा ।

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

वाह वाह
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हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

बेहद खूबसूरत गजल ।

बेनामी ने कहा…

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बेनामी ने कहा…

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