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रविवार, 13 सितंबर 2009

हिन्दी पखवाड़े में आज का आखिरी व्यक्तित्व ----"फणीश्वर नाथ रेणु"

हिन्दी साहित्य मंच " हिन्दी दिवस " के उपलक्ष्य में हिन्दी पखवाड़ा मना रहा है । और साहित्य से जुड़े हुए साहित्यकारों के बारे में एक श्रृंखला चला रहा था । इस श्रृंखला की आज आखिरी कड़ी प्रस्तुत की जा रही । आप सभी को हिन्दी साहित्य मंच का प्रयास पसंद आया । आप सभी ने हमारा उत्साह अपने विचारों से बढ़ाया इसके लिए हिन्दी साहित्य मंच आप सभी के प्रति आभार प्रकट करता है । आप सभी को हिन्दी दिवस की आगामी शुभकामनाएं । हिन्दी के विकास के लिए अपना प्रयास जारी रखें ।




फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म ४ मार्च, 1921 को बिहार के अररिया जिले के फॉरबिसगंज के निकट औराही हिंगना ग्राम में हुआ था । प्रारंभिक शिक्षा फॉरबिसगंज तथा अररिया में पूरी करने के बाद इन्होने मैट्रिक नेपाल के विराटनगर के विराटनगर आदर्श विद्यालय से कोईराला परिवार में रहकर की । इन्होने इन्टरमीडिएट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1942 में की जिसके बाद वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पङे । बाद में 1950 में उन्होने नेपाली क्रांतिकारी आन्दोलन में भी हिस्सा लिया जिसके परिणामस्वरुप नेपाल में जनतंत्र की स्थापना हुई । १९५२-५३ के समय वे भीषण रूप से रोगग्रस्त रहे थे जिसके बाद लेखन की ओर उनका झुकाव हुआ । उनके इस काल की झलक उनकी कहानी तबे एकला चलो रे में मिलती है । उन्होने हिन्दी में आंचलिक कथा की नींव रखी । सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय, एक समकालीन कवि, उनके परम मित्र थे । इनकी कई रचनाओं में कटिहार के रेलवे स्टेशन का उल्लेख मिलता है ।

फणीश्वर नाथ रेणु एक हिन्दी साहित्यकार थे । इन्होंने प्रेमचंद के बाद के काल में हिन्दी में श्रेष्ठतम गद्य रचनाएं कीं । इनके पहले उपन्यास मैला आंचल को बहुत ख्याति मिली थी जिसके लिए उन्हे पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था ।

इनकी लेखन-शैली वर्णणात्मक थी जिसमें पात्र के प्रत्येक मनोवैज्ञानिक सोच का विवरण लुभावने तरीके से किया होता था । पात्रों का चरित्र-निर्माण काफी तेजी से होता था क्योंकि पात्र एक सामान्य-सरल मानव मन (प्रायः) के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता था । इनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी । एक आदिम रात्रि की महक इसका एक सुंदर उदाहरण है । इनकी लेखन-शैली प्रेमचंद से काफी मिलती थी और इन्हें आजादी के बाद का प्रेमचंद की संज्ञा भी दी जाती है ।

अपनी कृतियों में उन्होने आंचलिक पदों का बहुत प्रयोग किया है । अगर आप उनके क्षेत्र से हैं (कोशी), तो ऐसे शब्द, जो आप निहायत ही ठेठ या देहाती समझते हैं, भी देखने को मिल सकते हैं आपको इनकी रचनाओं में ।
रेणु जी के प्रमुख उपन्यास मैला आंचल ,परतीपरिकथा ,जूलूस ,दीर्घतपा ,कितने चौराहे हैं। इनकी प्रसिद्ध कहानी पंचलाइट रही। तथा कथा संग्रह एक आदिम रात्रि की महक काफी चर्चित रहा। इस महान साहित्यकार नें ११ अप्रैल, 1977 को दुनिया को अलविदा कहा।

6 comments:

mukesh ने कहा…

सच कहा समीर लाल जी लेखनी और व्यक्तित्व अद्भुत है !!

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

आपको हिन्दी में लिखता देख गर्वित हूँ.

भाषा की सेवा एवं उसके प्रसार के लिये आपके योगदान हेतु आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ.

Mithilesh dubey ने कहा…

सफलता पुर्वक इस श्रृंखला समापन के लिए बधाई।

Nirmla Kapila ने कहा…

bबहुत बडिया रही ये श्रिंखला बहुत से महान साहित्यकारों से रूबरू हुये आभार और सफल लेखनहेतु बधाई

neeshoo ने कहा…

बहुत बहुत बधाई । हिन्दी दिवस पर

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

बहुत बढिया श्रृंखला रही.......
हिन्दी दिवस की सबको शुभकामनाऎँ!!!