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गुरुवार, 20 जनवरी 2011

युवा बनाम भारतीय संस्कृति-------------[शिव शंकर]

एक समय था जब हमारे युवाओं के आदर्श, सिद्धांत, विचार, चिंतन और व्यवहार सब कुछ भारतीय संस्कृति के रंग में रंगे हुए होते थे। वे स्वयं ही अपने संस्कृति के संरक्षक थे, परंतु आज उपभोक्तावादी पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध से भ्रमित युवा वर्ग को भारतीय संस्कृति के अनुगमन में पिछडेपन का एहसास होने लगा है। आज अंगरेजी भाषा और अंगरेजी संस्कृति के रंग में रंगने को ही आधुनिकता का पर्याय समझा जाने लगा है। जिस युवा पिढी के उपर देश के भविष्य की जिम्मेदारी है , जिसकी उर्जा से रचनात्मक कार्य सृजन होना चाहिए,उसकी पसंद में नकारात्मक दृष्टिकोण हावी हो चुका है। संगीत हो या सौंदर्य,प्रेरणास्त्रोत की बात हो या राजनीति का क्षेत्र या फिर स्टेटस सिंबल की पहचान सभी क्षेत्रो में युवाओं की पाश्चात्य संस्कृति में ढली नकारात्मक सोच स्पष्ट परिलछित होने लगी है। आज मरानगरों की सडकों पर तेज दौडती कारों का सर्वेक्षण करे तो पता लगेगा कि हर दूसरी कार में तेज धुनों पर जो संगीत बज रहा है वो पॉप संगीत है। युवा वर्ग के लिए ऐसी धुन बजाना दुनिया के साथ चलने की निशानी बन गया है। युवा वर्ग के अनुसार जिंदगी में तेजी लानी हो या कुछ ठीक करना हो तो गो इन स्पीड एवं पॉप संगीत सुनना तेजी लाने में सहायक है।

हमें सांस्कृतिक विरासत में मिले शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत के स्थान पर युवा पीढी ने पॉप संगीत को स्थापित करने का फैसला कर लिया है। नए गाने तो बन ही रहे है,साथ ही पुराने गानो को भी पॉप मिश्रत नए रंग रूप मे श्रोताओ के समक्ष पेश किये जा रहे है। आज बाजार की यह स्थिति है कि नई फिल्म के गानो का रिमिक्स यानि तेज म्यूजिक डाले गए कैसेट आ जाने के बाद संमान्य कैसेट के बिक्री में बहुत ज्यादा गिरावट आई है। आज सब कुछ पॉप में ढाल कर युवाओं को परोसा जा रहा है और पसंद भी किया जा रहा है। आज विदेशी संगीत चैनल युवाओं की पहली पसंद बनी हुई है। इन संगीत चैनलो के ज्यादा श्रोता 15 से 34 वर्ष के युवा वर्ग है। आज युवा वर्ग इन चैनलो को देखकर अपने आप को मॉडर्न और उचे ख्यालो वाला समझ कर इठला रहा है। इससे ये एहसास हो रहा है कि आज के युवा कितने भ्रमित है अपने संस्कृति को लेकर और उनका झुकाव पाश्चात्य संस्कृति की ओर ज्यादा है। ये भारतिय संस्कृति के लिए बहुत दुख: की बात है।

आज युवाओ के लिए सौंदर्य का मापदण्ड ही बदल गया है। विश्व में आज सौंदर्य प्रतियोगिता कराये जा रहे है, जिससे सौंदर्य अब व्यवासाय बन गया है। आज लडकिया सुन्दर दिख कर लाभ कमाने की अपेक्षा लिए ऐन -केन प्रकरण कर रही है। जो दया, क्षमा, ममता ,त्याग की मूर्ति कहलाती थी उनकी परिभाषा ही बदल गई है। आज लडकियां ऐसे ऐसे पहनावा पहन रही है जो हमारे यहॉ इसे अनुचित माना जाता है। आज युवा वर्ग अपने को पाश्चात्य संस्कृति मे ढालने मात्र को ही अपना विकाश समझते है।आज युवाओ के आतंरिक मूल्य और सिद्धांत भी बदल गये है। आज उनका उददेश्य मात्र पैसा कमाना है। उनकी नजर में सफलता की एक ही मात्र परिभाषा है और वो है दौलत और शोहरत । चाहे वो किसी भी क्षेत्र में हो । इसके लिए वो कुछ भी करने को तैयार है। राजनीति का क्षेत्र भी युवाओ में आए मानसिक परिवर्तन से अछुता नहीं है। इतिहास पर दृष्टि डाले तो पता चलता है कि स्वतंत्रता संग्राम पूरी तरह युवाओ के त्याग,. बलिदान ,साहस व जटिलता पर ही आधारित था। अंगरेजो के शोषण, दमन और हिंसा भरी राजनीति से युवाओं ने ही मुक्ति दिलाई थी। भारतीय राजनीति के दमकते सूर्य को जब आपात काल का ग्रहण लगा तब इसी युवा पीढी ने अपना खून पसीना एक कर उनके अत्याचारो को सहते हुए अपने लोकतंत्र की रक्षा की थी। आज जबकि परिस्थितियॉ और चुनौतियॉ और ज्यादा विकट है एभारतीय राजनीति अकंठ भ्रष्टाचार में डूब चुकी है,देश आर्थिक गुलामी की ओर अग्रसर है, ऐसे में भ्रष्टाचार और कुशासन से लोहा लेने के बजाय समझौतावादी दृष्टिकोण युवाओ का सिद्धांत बन गया है। उनके भोग विलाश पूर्ण जीवन में मूत्यों और संघर्षो के लिए कही कोई स्थान नहीं है।

भारतीय संस्कृति में सदा से मेहनत, लगन, सच्चाई का मूल्यांकन किया जाता रहा है,परंतु आज युवाओ का तथाकथित स्टेटस सिंबल बदल चुका है, जिन्हे वो रूपयो के बदले दुकानो से खरीद सकते हे। कुछ खास . खास कंपनियों के कपडे, सौंदर्य. प्रसाधन एवं खाध सामग्री का उपयोग स्तर दर्शाने का साधन बन चुका है। महंगे परिधान ,आभूषण, घडी ,चश्मे, बाइक या कार आदि से लेकर क्लब मेंबरशिप, महॅंगे खेलो की रूचि तक स्टेटस. सिंबल के प्रदर्शन की वस्तुए बन चुकी है। संपन्नता दिखाकर हावी हो जाने का ये प्रचलन युवाओं को सबसे अलग एवं श्रेष्ठ दिखाने की चाहत के प्रतीक लगते हैं। आखिर युवाओं की इस दिग्भ्रांति का कारण क्या है ?

इसका जवाब यही है कि कारण अनेक है। सबसे प्रमुख कारण है ,प्रचार -.प्रसार माध्यम ।युवा पीढी तो मात्र उसका अनुसरण कर रही है। आज भारत में हर प्रचार माध्यम के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता के स्थान पर पश्चिमी मानदंडों के अनुसार प्रतिद्धंद्धी को मिटाने की होड लगी हुई है। सनसनीखेज पत्रकारिता के माध्यम से आज पत्र. पत्रिकाए, ऐसी समाजिक विसंगतियो की घटनाओं की खबरो से भरी होती हैंए जिसको पढकर युवाओ की उत्सुकता उसके बारे में और जानने की बढ जाती है। युवा गलत तरह से प्रसारित हो रहे विज्ञापनों से इतने प्रभावित हो रहे है कि उनका अनुकरण करने में जरा भी संकोच नहीं कर रहें है। अगर भारत सरकार को भरतीय संस्कृति की रक्षा करनी है तो ऐसे प्रसारणो पर सख्ती दिखानी चाहिए ,जो गलत ढंग से प्रस्तुत किये जाते हैं। इन प्रसारणो से समाज में गलत संदेश जाता है। इन्ही पत्र. पत्रिकाए ,विज्ञापनो को गलत ढंग से पेश कर समाज मे युवाओ को भ्रमित किया जाता है। अगर हमारी संस्कृति को प्रभावी बनाना है तो युवाओ को आगे आना होगा । लेकिन आज युवाओ का झुकाव पाश्चात्य संस्कृति की ओर है ,जो हमारे संस्कृति के लिए गलत है। आज सरकार और देशवासियो को मिलकर संस्कृति के रक्षा के लिए नए कदम उठाने की जरूरत आन पडी है,जिससे संस्कृति को बचाया जा सके।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, लेकिन ये परिवर्तन हमें पतन के ओर ले जायेगा । युवाओ को ऐसा करने से रोकना चाहिए नहीं जिस संस्कृति के बल पर हम गर्व महसूस करते है, पूरा विश्व आज भारतीय संस्कृति की ओर उन्मूख है लेकिन युवाओं की दीवानगी चिन्ता का विषय बनी हुई है। हमारे परिवर्तन का मतलब सकारात्मक होना चाहिए जो हमे अच्छाई से अच्छाई की ओर ले जाए । युवाओ की कुन्ठीत मानसिकता को जल्द बदलना होगा और अपनी संस्कृति की रक्षा करनी होगी । आज युवा ही अपनी संस्कृति के दुश्मन बने हुए है। अगर भारतीय संस्कृति न रही तो हम अपना अस्तित्व ही खो देगें।संस्कृति के बिना समाज में अनेक विसंगतियॉं फैलने लगेगी ,जिसे रोकना अतिआवश्यक है। युवाओ को अपने संस्कृति का महत्व समझना चाहिये और उसकी रक्षा करनी चाहिए । तभी भारतीय संस्कृति को सुदृढ और प्रभावी बनाया जा सकता है।

6 comments:

shalini kaushik ने कहा…

बहुत सही बात उठाई है आपने.आज भारतीय संस्कृति के लिए यही बात चिंता का विषय बन गयी है कि युवा वर्ग में पश्चिमी संस्कृति का अन्धानुकरण बढ़ता जा रहा है.

मेरे ब्लॉग.कौशल पर "jo bhi ray ho avashay den...अवश्य आयें.आपकी राय मेरे लिए और ब्लोग्परिवर के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है..

shikha kaushik ने कहा…

बहुत विचारणीय विषय उठाया है आपने .

आलोकिता ने कहा…

bahut hi sarthak lekhan.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

भरोसा रखें, चिन्तनशील युवा देश के मानसिक परिवेश में बदलाव लायेंगे।

arganikbhagyoday ने कहा…

daktar maikale jindabad sir !

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति यादव जी , हम युवाओं को इस पर चिंतन करने की जरुरत है ।