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सोमवार, 17 जनवरी 2011

क्या यही है प्यार............(सत्यम शिवम)

मधु अधरों का मोहक रसपान,
नीर नैन बेजान,निष्प्राण,

ह्रदय प्राण का उद्वेलीत शव,
मन आँगन में स्नेह प्रेम का कलरव।

इस जहान में रहकर भी,
घुम आता है उस जहाँ के पार,
क्या यही है प्यार?

मुक राहों में स्वयं से अंजान,
बेजान काया को भी अभिमान।
अनछुए,अनोखे बातों से दबा लव,
अरमानों को लगे पँख नव।

सौ कष्टों से पूरित,
उर की व्यथा का इकलौता उद्धार,
क्या यही है प्यार?

निशदिन बस प्यार का गुणगान,
साथी की बातों का बखान।
नई दुनिया से इक नया लगाव,
नैन और अधरों से छलकता भाव।

ह्रदय में ही मिल जाता,
प्रेमियों को इक नया संसार,
क्या यही है प्यार?

8 comments:

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति..

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत सुंदर ... प्रबह्वी भावाभिव्यक्ति

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

निर्दय जगत में एक नया संसार मन के भावों का।

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

Dhanyawad aap sabhi ko....yuhi mera hausla badhate rahe.

arganikbhagyoday ने कहा…

pata nahi ji pyar kaia hota hai ?

शिव शंकर ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
जी धन्यवाद।