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शनिवार, 15 जनवरी 2011

प्रभा तुम आओ {गीत} सन्तोष कुमार "प्यासा"



आलोकित हों छिटके ओसकण
तरुवर के
गुंजित हो चहुदिश, सुन राग
सरवर के
नव-प्राण रश्मि लेकर
हे प्रभा! तुम आओ
संचारित हो नव उर्जा
पुलकित हों जन-तन-मन-जीवन
दिक् दर्शाओ रविकर
मिटें निराशा के तिमिर-सघन
मनोरम उपवन सा, धरा में
स्नेह सुरभि महकाओ
नव-प्राण रश्मि लेकर
हे प्रभा! तुम आओ
ज्यों विस्तृत होतीं, द्रढ़ साख संग
कोमल बेलें
त्यों उर में सौहार्द भर
हम दीनो को निज संग लेले
सजीव हो परसेवा की उत्कंठा
जीवन में ज्ञान सुधा बरसाओ
नव-प्राण रश्मि लेकर
हे प्रभा! तुम आओ...

7 comments:

आलोकिता ने कहा…

sundar prastuti

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सबके जीवन में स्वर्णिम आलोक हो।

anupama's sukrity ! ने कहा…

ज्यों विस्तृत होतीं, द्रढ़ साख संग
कोमल बेलें
त्यों उर में सौहार्द भर
हम दीनो को निज संग लेले
सजीव हो परसेवा की उत्कंठा
जीवन में ज्ञान सुधा बरसाओ
नव-प्राण रश्मि लेकर
हे प्रभा! तुम आओ...

बहुत ही सुंदर भाव -
कोमल रचना -
शुभकामनायें

मनोज कुमार ने कहा…

आशा से भरी रचना। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ (दूसरा भाग)

arganikbhagyoday ने कहा…

achchha hai ji ..!

डॉ.उमाशंकर चतुर्वेदी 'कंचन' ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना है बधाई हो

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

सुंदर कविता संतोष जी