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रविवार, 18 अप्रैल 2010

अगीत -----डा श्याम गुप्त के पांच अगीत ....

( नव अगीत ---अगीत विधा का यह एक नवीन छंद है---३ से ५ तक पंक्तियाँ , तुकांत बंधन नहीं . )

१. नज़दीकियाँ -

मोबाइल,
उनके पास भी है
हमारे पास भी है ;
हम इतने करीब हैं कि ,
अभी तक नहीं मिलपाये हैं |

२. झुनुझुना --

चुनाव हारने के बाद 

वे झुनुझुना बजा रहे हैं ;
और क्या करें 
समझ नहीं पारहे हैं |

३.दूरियां---
दूरियां ,
 दिलों को करीब लाती हैं;
इन्तजार के बाद,
मिलन केअनुभूति,
अनूठी हो जाती है ।

४.समत्व---
जो आधि व व्याधि
दोनों में ही सम रहता है;
उसे ही शास्त्र,
समाधिस्थ व समतावादी कहता है ।

५.मूर्ख--
कुत्ते की उस पूंछ के समान है,
जो नतो गुप्त अन्ग ही ढकती है
न मच्छरों के उडाने के काम आती है।

3 comments:

Shekhar kumawat ने कहा…

bahut khub


shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस सुन्दर पोस्ट की चर्चा यहाँ भी तो है!
http://charchamanch.blogspot.com/2010/04/blog-post_19.html

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बहुत सुन्दर रचनायें हैं ! एक से बढ़कर एक ! बस कुत्ते की पूँछ के बारे में यही कहना है कि अपने मालिक के सामने हिला हिला कर प्यार पाने का काम ज़रूर अति है !