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सोमवार, 30 नवंबर 2009

अनजाने रिश्ते का एहसास

अनजाने रिश्ते का एहसास,


बयां करना मुश्किल था ।

दिल की बात को ,

लबों से कहना मुश्किल था ।।


वक्त के साथ चलते रहे हम ,

बदलते हालात के साथ बदलना मुश्किल था ।

खामोशियां फिसलती रही देर तक,

यूँ ही चुपचाप रहना मुश्किल था ।।


सब्र तो होता है कुछ पल का ,

जीवन भर इंतजार करना मुश्किल था ।

वो दूर रहती तो सहते हम ,

पास होते हुए दूर जाना मुश्किल था ।।


अनजाने रिश्ते का एहसास ,
बयां करना मुश्किल था ।।

8 comments:

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

वक्त के साथ चलते रहे हम ,
बदलते हालात के साथ बदलना मुश्किल था ।
खामोशियां फिसलती रही देर तक,
यूँ ही चुपचाप रहना मुश्किल था ।।


सब्र तो होता है कुछ पल का ,
जीवन भर इंतजार करना मुश्किल था ।
वो दूर रहती तो सहते हम ,
पास होते हुए दूर जाना मुश्किल था ।।

मिथिलेश जी बहुत सुन्दर, काव्य में भी लाजबाब पकड़ है आपकी !

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत सुंदर।

Kusum Thakur ने कहा…

रिश्ते के एहसास को बहुत खूबसूरत शब्दों में अभिव्यक की है आपने ।बहुत बहुत आशीर्वाद !

नीरज गोस्वामी ने कहा…

क्या खूब कहा है...वाह...
नीरज

shikha varshney ने कहा…

ek sachhci baat bahut saral tarike se bayan ki aapne...badhai swikaren

निर्मला कपिला ने कहा…

सब्र तो होता है कुछ पल का ,
जीवन भर इंतजार करना मुश्किल था ।
वो दूर रहती तो सहते हम ,
पास होते हुए दूर जाना मुश्किल था ।।
वाह बहुत सुन्दर मगर बेटा एक बात बताओ कि तुम्हारे पास समय ही कब होता है ये एहसास महसूस करने का हर वक्त तो इतने लम्बे लम्बे आलेख ठेलते रहते हो तभी तो वो दूर रहती है । बहुत सुन्दर रचना बधाई

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना.

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
Email- sanjay.kumar940@gmail.com