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गुरुवार, 16 जुलाई 2009

ताजमहल

ताजमहल के नीचे तहखाने में
कुलबुलाने लगती हैं दो आत्मायें
चिपट जाती हैं वे एक दूसरे से
कहीं कोई अलग न कर दे उन्हें
दबे पाँव बाहर आती हैं
अपनी ही रची सुंदरता को निहारने
पर ये क्या ?
बाहर देखा तो यमुना जी सिमटती नजर आयीं
दूर-दूर तक गड़गड़ करती मशीनें
कोलाहल और धुँओं के बीच
काले पड़ते सफेद संगमरमर
कैमरों के फ्लैश के बीच
उनकी बनायी सुंदरता पर दावे करते लोग
अचानक उन्हें ताज दरकता नजर आया
वे तेजी से भागकर
अपनी-अपनी कब्रों में सिमट गए !!
कृष्ण कुमार यादव

9 comments:

www.dakbabu.blogspot.com ने कहा…

Sundar hai.

हिंदी साहित्य संसार : Hindi Literature World ने कहा…

आज के दौर में यथार्थ को प्रतिबिंबित करती एक अनुपम कविता.

बेनामी ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना बेहतरीन प्रस्तुति आभार !

बेनामी ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना बेहतरीन प्रस्तुति आभार !

Akanksha Yadav ने कहा…

बाहर देखा तो यमुना जी सिमटती नजर आयीं
दूर-दूर तक गड़गड़ करती मशीनें
कोलाहल और धुँओं के बीच
काले पड़ते सफेद संगमरमर
....Yahin to ham prakriti ka nuksan kar rahe hain.

Amit Kumar Yadav ने कहा…

अजी दिल खुश कर दिया इस कविता ने. दिल की बात जुबान पर आ गई.

Dr. Brajesh Swaroop ने कहा…

अचानक उन्हें ताज दरकता नजर आया
वे तेजी से भागकर
अपनी-अपनी कब्रों में सिमट गए !!
..KK Ji ki kavitaon ka kathya aur shilp dekhte banta hai..badhai.

स्वप्न मञ्जूषा ने कहा…

अचानक उन्हें ताज दरकता नजर आया
वे तेजी से भागकर
अपनी-अपनी कब्रों में सिमट गए !!

waah waah..
bahut khoob..
atisundar..

shyam gupta ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति.