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सोमवार, 13 जुलाई 2009

ऐ दिल कहीं और चलें


हर ओर है आज दंगा, अत्याचार मचा,
माराकाटी के इस दौर से कोई नहीं बचा,
डरता हूँ मैं इस खूनी दौर से बहुत,
भाग कर इस दौर से ऐ दिल कहीं और चलें।
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नहीं जहाँ में चैन न अमन ही रहा,
मानव अब तो अपने साये से डर रहा,
कत्ल न कर दे कहीं खुद हमारा साया,
डर से कत्ल होने के ऐ दिल कहीं और चलें।
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लुट गये खजाने खुशियों के हम सभी के,
छीन ले गये हर खुशी दामन से हमारे,
गमगीन माहौल में जीना लगता है मुश्किल,
खुशी एक पल की पाने ऐ दिल कहीं और चलें।
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बसेगा कब चमन खुशहाली का यहाँ,
मिटाकर अँधेरा कब उजाला फैलेगा यहाँ,
चाह है एक सुन्दर शांतिमय संसार की,
जहाँ प्यारा सा बसाने ऐ दिल कहीं और चलें।

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सुन्दर कविता के लिए
डॉ.कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी को बधाई!

Science Bloggers Association ने कहा…

सच्‍चाई का दर्पण दिखा दिया आपने।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }