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बुधवार, 1 अप्रैल 2009

देश का गौरव बन जाओ.............[एक कविता] निर्मला कपिला की


गौरव बन जाओ
सतलुज की लहरों ने
जीवन का सार बताया
सीमा मे बँध कर रहने का
गौरव उसने समझाया
कहा उन्मुक्त बहूँ तो
सिर्फ उत्पात मचाती हूँ
भाखडा बाँध मे हो सीमित
गोबिन्द सागर कहलाती हूँ
देती हूँ बिजली घर घर में
सब को सुख पहुँचाती हूँ
फसलों को पानी देती हूँ
सब की प्यास बुझाती हूँ
जो समाज क नियम् मे जीयेगा
वही समाज बनायेगा
जो तोडेगा इसके कायदे
वो उपद्रवी कहलायेगा
तुम भी अनुशासन मे रहना सीखो
मानव धर्म कमाओ
सतलुज की लहरों की मनिंद
देश के गौरव बन जाओ

4 comments:

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

निर्मला जी प्रभावपूर्ण और जीवन संदेश देती आपकी ये रचना । हिन्दी साहित्य मंच पर आपकी सहभागिता के लिए धन्यवाद । हमारा प्रयास हिन्दी विकास

neeshoo ने कहा…

सुन्दर रचना के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

निर्मला जी, बहुत ही सुन्दर कविता....आभार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहिन निर्मला कपिला जी।
सुन्दर रचना के लिए बधाई।