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सोमवार, 3 जनवरी 2011

नारी उत्थान में निहित भारत विकास-------------मिथिलेश

नारी के महान बलिदान योगदान के कारण ही भारत प्राचीन में समपन्न और विकसित था . प्राचीन काल में नर-नारी के मध्य कोई भेद नहीं था और नारियां पुरुषों के समकक्ष चला करती थी फिर चाहे वह पारिवारिक क्षेत्र हो या धर्म , ज्ञान विज्ञानं या कोई अन्य , सर्वांगीण विकास और उत्थान में नारी का योगदान बराबर था . नारी न सिर्फ सर्वांगीण विकास में सहायक थी पुरुष को दिशा और बल भी प्रदान करती थी . भारत के विकास में नारी योगदान अविस्मरणीय है. शायद इनके योगदान बिना भारत के विकास का आधार ही न खड़ा हो पता . इतिहास में भी नारी का लम्बा हस्तकक्षेप रहा . प्राचीन भारत को जो सम्मान मिला उसके पीछे नारियों का सहयोग व सहकार कि भावना सन्निहित रही है .वर्तमान समय में भले ही नारी शिक्षा का अवमूल्यन हो रहा हो , अन्धानुकरण के उफान पर भले ही उसकी शालीनता , मातृत्वता को मलीन और धूमिल किया गया हो परन्तु प्राचीन भारत में ऐसा नहीं था . तब चाहे कोई क्षेत्र हो , ज्ञान का हो या समाज का हो, नारी को समान अधिकार प्राप्त थे . नर-नारी को समान मानकर समान ऋषिपद प्राप्त था .

वैदिक ऋचाओं की द्रष्टा के रूप में सरमा , अपाला, शची , लोवामुद्रा , गोधा ,विस्वारा आदि ऋषिकाओं का आदरपूर्वक स्थान था .यही नहीं सर्वोच्य सप्तऋषि तक अरुंधती का नाम आता है. नर और नारी में भेद करना पाप समझा जाता है . इसी कारण हमारे प्राचीन इतिहास में इसे अभेद मन जाता रहा है.ब्रह्मा को लिंग भेद से परे और पार मन जाता है . ब्रह्मा के अव्यक्त एवं अनभिव्यक्त स्वरुप को सामन्य बुद्धि के लोग समझ सके इसीलिए ब्रह्मा ने स्वयं को व्यक्त्त किया तो वे नर और नारी दोनों के रूप में प्रकट हुए . नर के रूप को जहाँ परमपुरुष कहा गया वाही नारी को आदिशक्ति परम चेतना कहा गया . नर और नारी में कोई भेद नहीं हैं . केवल सतही भिन्नता है और यही भ्रम नारी और पुरुष के बिच भेद कि दीवार खड़ी करती है. शास्त्रों में ब्रह्मा के तीनों रुपों को जहां ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहा गया तो वहीं नारियों को आदिशक्ति, महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली कहा गया । देवासुर संग्राम में जब देवताओं को पराजय का मुँह देखना पड़ा था तब देवीशक्ती के रुप में देवताओं की मदद करना तथा राक्षसों को पराजित करना अध्यात्म-क्षेत्र में नारी को हेय समझने वाली मान्यता को निरस्त करती है ।

नारी शक्ति के बिना भगवान शिव को शव के समान माना जाता है । पार्वती के बिना शंकर अधुरे हैं । इसी तरह विष्णु के साथ लक्ष्मी, राम के साथ सीता को हटा दिया तो वह अधूरा सा लगता है । रामायण से अगर सीता जी को हटा दिया तो वह अधूरा सा लगता है । द्रोपदी, कुंती गांधारी का चरित्र ही महाभारत को कालजयी बनाता है अन्यथा पांडवो का समस्त जीवन बौना सा लगता । नारी कमजोर नहीं है, अबला नहीं है, वह शक्ति पर्याय है । देवासुर संग्राम में शुंभ निशुंभ, चंड-मुंड, रक्तबीज, महिषासुर आदि आसुरी प्रोडक्ट को कुचलने हेतु मातृशक्ति दुर्गा ही समर्थ हुई । इसी तरह अरि ऋषि की पत्नी अनुसूइया ने सूखे-शुष्क विंध्याचल को हरियाली से भर देनें के लिए तपश्चर्या की और चित्रकूट से मंदाकिनी नदी को बहने हेतु विवश किया । यह घटना भागीरथ द्वारा गंगावतरण की प्रक्रिया से कम नहीं मानी जा सकती ।
साहस और पराक्रम के क्षेत्र में भी नारी बढ‌ी-च‌ढी़ । माता सीता उस शिवधनुष को बड़ी सहजता से उठा लेती जिसे बड़े-बड़े योद्धा नहीं उठा पाते थे । इनके अलावा नारियां वर्तमान समय में भी विभिन्न क्षेत्रों, जैसे-- प्रशासनिक क्षत्र में किरण वेदी , खेल में सानिया नेहवाल, सानिया मिर्जा, झूल्लन गोस्वामी, राजनीति में सोनिया गांधी, प्रतिभा देवी सिंह पाटील, मीरा कुमार, विज्ञान के क्षेत्र में कल्पना चावला, सुनिता विलियम्स, आदि सभी अपने क्षेत्रों में अग्रणी रही हैं और भारत स्वाभीमान को बढ़ाया है ।
इस तरह ऐसे बहुत से प्रमाण हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि भारत के विकास के लिए आदर्शवादी नारियों ने अपनी क्षमता योग्यता का योगदान दिया । समाज में नारी के विकास के लिए समुचित व्यवस्थाएं की जाए । नारी के
विकास से ही भारत अपनी प्रतिष्ठा, सम्मान, गौरव को पुनः प्राप्त कर सकता है ।

5 comments:

arganikbhagyoday ने कहा…

नारी केविकास से ही भारत अपनी प्रतिष्ठा, सम्मान, गौरव को पुनः प्राप्त कर सकता है

Priti Krishna ने कहा…

महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के ब्लॉग हिन्दी विश्‍व पर राजकिशोर के ३१ डिसेंबर के 'एक सार्थक दिन' शीर्षक के एक पोस्ट से ऐसा लगता है कि प्रीति सागर की छीनाल सस्कृति के तहत दलाली का ठेका राजकिशोर ने ही ले लिया है !बहुत ही स्तरहीन , घटिया और बाजारू स्तर की पोस्ट की भाषा देखिए ..."पुरुष और स्त्रियाँ खूब सज-धज कर आए थे- मानो यहां स्वयंवर प्रतियोगिता होने वाली ..."यह किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर के विश्‍वविद्यालय के औपचारिक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग ना होकर किसी छीनाल संस्कृति के तहत चलाए जाने वाले कोठे की भाषा लगती है ! क्या राजकिशोर की माँ भी जब सज कर किसी कार्यक्रम में जाती हैं तो किसी स्वयंवर के लिए राजकिशोर का कोई नया बाप खोजने के लिए जाती हैं !

मनोज कुमार ने कहा…

अच्छा आलेख।

SACCHAI ने कहा…

" shandar prastuti ke liye badhai "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

Dr. shyam gupta ने कहा…

कोई बात नहीं, नारियां छिनाल भी होती हैं.. (आजकल तो छिनालों को सेलीब्रिटी कहा जाता है) और ’लोपामुद्रा-इन्दिरागान्धी. भी---जिसको जो अच्छा लगता है वैसा ही बोलता है....

---वैसे बहुत अच्छा आलेख...