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बुधवार, 13 अक्तूबर 2010

दोहे..............कवि कुलवंत सिंह

शुद्ध धरम बस एक है, धारण कर ले कोय .
इस जीवन में फल मिले, आगे सुखिया होय .

सत्य धरम है विपस्सना, कुदरत का कानून .
जिस जिस ने धारण किया, करुणा बने जुनून .

अणु अणु ने धारण किया, विधि का परम विधान .
जो मानस धारण करे, हो जाये भगवान .

अंतस में अनुभव किया, जब जब जगा विकार .
कण - कण तन दूषित हुआ, दुख पाये विस्तार .

हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख हो, भले इसाई जैन .
जब जब जगें विकार मन, कहीं न पाये चैन .

दुनियादारी में फंसा, दुख में लोट पलोट .
शुद्ध धरम पाया नही, नित नित लगती चोट .

मैं मैं की आशक्ति है, तृष्णा का आलाप .
धर्म नही धारण किया, करता रोज विलाप .

माया पीछे भागता, माया का अभिमान .
माया को सुख मानता, धन का करे न दान .

गंगा बहती धरम की, ले ले डुबकी कोय .
सच्चा धरम विपस्सना, जीवन सुखिया होय .

तप करते जोगी फिरें, जंगल, पर्वत घाट .
काया अंदर ढ़ूंढ़ ले, तीन हाथ का हाट .

अपनी मूरत मन गढ़ी, सौ सौ कर श्रृंगार .
जब जब मूरत टूटती, आँसू रोये हजार .

पत्नी, माता, सुत, पिता, नहीं किसी से प्यार .
अपने जीवन में सभी, स्वार्थ पूर्ति सहकार .

4 comments:

सुनील गज्जाणी ने कहा…

kulavant jee
pranam !
sunder dihe hai ,
badhai!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

कुलवंत जी के दोहे सचमुच शानदार हैं।
................
..आप कितने बड़े सनकी ब्लॉगर हैं?

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया और लाजवाब दोहा है! सब एक से बढ़कर एक है!

shiva ने कहा…

Bahut Sundar Dohey, Badhaye