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रविवार, 9 मई 2010

माँ .......(कविता)..............मोनिका गुप्ता


माँ को है

विरह वेदना और आभास कसक का

ठिठुर रही थी वो पर

कबंल ना किसी ने उडाया

चिंतित थी वो पर

मर्म किसी ने ना जाना

बीमार थी वो पर

बालो को ना किसी ने सहलाया

सूई लगी उसे पर

नम ना हुए किसी के नयना

चप्पल टूटी उसकी पर

मिला ना बाँहो का सहारा

कहना था बहुत कुछ उसे

पर ना था कोई सुनने वाला

भूखी थी वो पर

खिलाया ना किसी ने निवाला

समय ही तो है उसके पास पर

उसके लिए समय नही किसी के पास

क्योंकि

वो तो माँ है माँ

और

माँ तो मूरत है

प्यार की, दुलार की, ममता की ठंडी छावँ की,

लेकिन

कही ना कही उसमे भी है

विरह, वेदना, तडप और आभास कसक का

शायद माँ को आज भी है इंतजार अपनो की झलक का

6 comments:

neeshoo ने कहा…

monika ji bahut hi marmik kavita maa par ....such samne aa gya ...badhai aapko

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

माँ को है

विरह वेदना और आभास कसक का

ठिठुर रही थी वो पर

कबंल ना किसी ने उडाया

bahut hi pyari line kavita ki ...dhanyavaad iss kavita ke liye ..

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

मोनिका जी ...आपकी लिखी इस कविता की जितनी तारीफ की जाये कम होगी ...बहुत ही मर्स्पर्शी कविता लगी आप की .....सरल शब्दों में आपने माँ के प्यार को दर्शाया है आपने

मोनिका गुप्ता सिरसा हरियाणा ने कहा…

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद ... मै भी हिन्दी साहित्य मंच का हिस्सा बनना चाहती हू ... इस क्षेत्र मे कुछ करना चाहती हू ...
मोनिका गुप्ता सिरसा

kunwarji's ने कहा…

"माँ को है
विरह वेदना और आभास कसक का
ठिठुर रही थी वो पर
कबंल ना किसी ने उडाया"


सच में रुला दिया......

faij ने कहा…

maa par bahut hi marmik rachna