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गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

झूठ-मूठ.....कविता.....- कुमार विश्वबंधु

जो कहा
सब झूठ

जो लिखा
सब झूठ

जो सोचा
सब झूठ

जो जिया
झूठ-मूठ

इस बाज़ार में
उड़ रहे हैं रुपये
गिर रहे हैं लोग !

8 comments:

knkayastha ने कहा…

बहुत सही लिखा है... आज सबकुछ कारोबार हो गया और जीवन के इस कारोबार में बने रहने के लिए हम भी यही करने लगते हैं...

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

कम शब्दों में सब कुछ कह दिया ....पर कविता कुछ अधूरी सी लग रही है ...

neeshoo ने कहा…

bahut khub .....wakai bahut hi shandaar likha aapne ...

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

aaj kal ki dasha ko acche se likha aapne ...badhai..

दिलीप ने कहा…

bahut sahi baat kahi sir...
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

Jandunia ने कहा…

हमारी तारीफ को झूठी मत मानिएगा।

सुमन'मीत' ने कहा…

सब पैसे क खेल है पैसा फैंको खेल देखो । बहुत बढिया ।

बेनामी ने कहा…

very good.i mean amazing.really!