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बुधवार, 31 मार्च 2010

'इत्तेफाक' एक प्रेम कहानी ........................अनिलकांत जी


ऐसा नहीं था कि जो हो रहा था मैं इन सब से बेखबर था....लेकिन शायद मैं अपने वजूद की तलाश में था....मैं खुद की तलाश में था....और इसी तलाश में कब उससे टकरा गया पता ही नहीं चला....ये भी एक अजीब इत्तेफाक है कि उसका और मेरा मिलना भी एक इत्तेफाक से हुआ.....ये इत्तेफाक भी बड़े अजीब होते हैं....कभी कभी जिंदगी के मायने ही बदल देते हैं 

किताबों में डूबे रहना मेरा शौक भी था और सच कहूं तो मेरी कमजोरी कह लें या एकमात्र सहारा....या तो किताबें मुझे तलाशती या मैं किताबों को....इसी तलाश में मेरा एक दिन उसी जगह जाना हुआ जहाँ मैं अक्सर जाया करता....उस किताब वाले के पास जहाँ एक सी शक्लों वाले लोग अक्सर दिखाई देते...हाँ शायद पढ़ते पढ़ते सबकी शक्लें एक सी ही लगती मुझे....या उन सब ने एक सी किताबे पढ़ पढ़ कर एक सी शक्लें कर ली थीं... 

उस रोज़ मैं बस वहाँ खड़ा उस किताब वाले को बड़ी तसल्ली से देख रहा था...सच कहूं तो उसकी शक्ल को पहचानने की पूरी कोशिश कर रहा था....कि इसकी शक्ल में भी आखिर कोई बात होगी....आखिर इसने इतनी किताबे बैची हैं...हो सकता है कुछ पढ़ी भी हों....वैसे तो कई बार वो बता चुका था कि वो अपने समय का 8 वीं पास है....वो बोला बाबूजी कौनसी किताब दूँ.... 

कुछ सोचकर गया नहीं सो कुछ बोलता....अंततः कई लोगों से सुन रखा था 'रसीदी टिकट' के बारे में....पर कभी मौका नहीं मिला उसे पढने का....या सच कहूँ कभी मन नहीं किया....और कभी किया भी तो वो किताब दुकान पर मौजूद ना होने की वजह से पढ़ी नहीं....मैंने उसे बोला कि 'रसीदी टिकट' मिलेगी क्या....वो हल्का सा मुस्कुराया और बोला हा साहब...सिर्फ आखिरी पीस ही बचा है....आपकी किस्मत अच्छी है....मैंने किताब हाथ में ली...और पर्स से पैसे निकाल उसे दिए....तभी एक आवाज़ आई जिसकी फरमाइश भी रसीदी टिकट थी....लड़की की आवाज़ थी....जो मेरे नजदीक ही खड़ी थी....अरे नहीं मैडम आखिरी ही थी जो अभी अभी इन साहब ने खरीद ली...वो लड़की मुझे देखती है.... 

पर मुझ से कुछ बोलती नहीं...कब तक आ जायेगी दोबारा....जी यही कोई हफ्ते दस दिन में आ जायेगी....इतना लेट....जल्दी नहीं आ सकती....मैडम हफ्ते दस दिन में ही मेरा किताबे लेने जाना हो पायेगा....मैं उनकी बातें सुन रहा था.....और मेरा आज भी उस किताब को ऐसा पढने का कोई ख़ास मन ना था....मैंने कहा आप ले लीजिये इसे....आप पढ़ लीजिये...वैसे भी मेरा अभी मन नहीं....मैं बाद में पढ़ लूँगा....वो थोडी खुश सी हुई....वो अपने पर्स से पैसे निकालने लगी...अरे क्या कर रही हैं आप...पैसे रहने दीजिए...जब आप पढ़ लें तो इन बाबा को किताब दे जाना मैं इन से ले लूँगा... 

पक्का आपको अभी नहीं पढ़नी....कहीं आप मेरी वजह से तो नहीं ऐसा कर रहे....मैं मुस्कुराया....मैंने कहा रख लीजिये...उसने किताब अपने हाथ में ले ली....मैं फुटपाथ पर पैदल चलने लगा....वो भी ना जाने क्यों पैदल ही चलने लगी...वो चाहती तो रिक्शा कर सकती थी....मैं तो ऐसा ही था...पैदल चलना मेरा शौक ही हुआ करता था.... 

वो साथ चलते हुए बोली थैंक यू.....मैं मुस्कुरा दिया....मैंने कहा पढ़ लीजिये अच्छी लगे तो बताना...मैं भी पढ़ लूँगा....वो भी हल्का सा मुस्कुरा दी....तो क्या आप इधर रोज़ आते हैं....हाँ आप कह सकती हैं....जब भी मन बेचैन सा होता है चला आता हूँ.....हाँ वो पहले भी मैंने एक बार आपको यहाँ देखा है....अच्छा.....वो बोली लगता है आप किताबों का बहुत शौक रखते हैं.....मैं बोला क्यों आप नहीं रखती...किसी और के लिए ले जा रही हैं.....वो हँस दी अरे नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है ....मैं उतना नहीं पढ़ती शायद जितना आप पढ़ते हों.... 

अच्छा क्या करते हैं आप....ऐसा कुछ ख़ास नहीं पर फिर भी....एक बैंक में मुलाजिम हूँ....वो हँस दी...मुलाजिम....मैंने हँसते हुए पूँछा और आप....जी मैं कॉलेज में लेक्चरर हूँ....तभी शायद रास्ता ख़त्म सा हुआ....और मेन रोड आ गया....वो दोबारा शुक्रिया अदा करती हुई बोली....अच्छा ठीक है अब मैं चलती हूँ.....मैंने कहा ठीक है.... 

कुछ था जो होना था....शायद उस खुदा ने कुछ सोच रखा था....अभी तक मैं ये नहीं जान पाया था कि आखिर आज जो हुआ वो सिर्फ एक घटना थी या ऐसा इत्तेफ़ाक जो मेरा हाथ पकड़ कर कहीं ले जाना चाहता है....खैर जो भी था....मैं उस रोज़ समझ नहीं सका....करीब दो रोज़ बाद मेरा फिर उधर जाना हुआ....मैं पैदल ही चला जा रहा था उस फुटपाथ पर...उस से आज में फिर टकरा गया.....वो पीछे से रिक्शे पर आ रही थी....शायद उसकी मुझ पर नज़र पड़ी....उसने कहा अरे सुनिए....मैंने पीछे मुड़कर देखा....वो रिक्शे से उतरी....और मुस्कुराती हुई मेरे पास आई...बोली अरे ये तो बहुत अच्छा हुआ कि आप मुझे मिल गए....मैं आपकी ही किताब वापस करने जा रही थी.....मैंने कहा ख़त्म कर दी...वो बोली हाँ....मैं मुस्कुराया और बोला कि तुम तो हमारी भी उस्ताद निकली....वो हँस पड़ी....अरे मुझे किताब अच्छी लगी तो मैं खुद को रोक ना सकी.....मैंने कहा चलो अच्छी बात है 

उसने कहा कि चलो कहीं बैठें....कॉफी पीते हैं....मैंने कहा हाँ यहीं पास में एक रेस्टोरेंट है....वो अच्छी कॉफी बनाता है....हम दोनों पैदल ही फुटपाथ को नापते हुए चल दिए....शायद उसके साथ चलना मुझे अच्छा लग रहा था....कुछ ही देर में रेस्टोरेंट आ गया..... 
हम दोनों उस शहर के खासम खास रेस्टोरेंट में थे....खास इस वजह से कि वहाँ कॉफी अच्छी मिलती थी और शांति का एहसास होता....उस रोज़ बजने वाला मधुर संगीत एक अलग ही धुन छेड़ रहा था....वो मेरे सामने बैठी थी....'रसीदी टिकट' उसके पास ही थी....हमारे बीच एक खामोशी की दीवार खड़ी हो चली थी...उसे तोड़ते हुए मैंने पूँछा तो कैसी लगी आपको किताब....उसकी ओर से खामोशी टूटी...वो बोली...सच कहूँ तो मुझे बेहद प्यारी लगी ये किताब...एक एक शब्द से जैसे लगाव हो चला था....जैसे जैसे पढ़ती गयी वैसे वैसे में इसमें डूबती गयी....एक बार ख़त्म होने के बाद भी मन कर रहा था कि फिर एक बार पढूं....मैं मुस्कुराते हुए बोला तो पढ़ लेतीं आप.... 

ये इश्क भी अजीब होता है ना....इंसान को क्या का क्या बना देता है...उसने मेरी ओर देख कर बोला....जैसे शायद मेरी आँखों में झाँक कर पूंछ रही हो....कि आपको क्या लगता है....मैंने कॉफी का घूँट भरा जिसे दुकान पर काम करने वाला वो लड़का अभी अभी रख कर गया था....घूँट गले से उतर जाने के बाद मैं हल्का सा मुस्कुराया....पर कुछ बोला नहीं....वो कहने लगी....आप कम बोलते हैं शायद....नहीं तो...ऐसा तो कुछ नहीं है....मैंने इशारा करते हुए कहा...आप कॉफी पीजिये ठंडी हो रही है.... 

तो आप क्या पढ़ाती हैं....मेरा मतलब किस विषय की लेक्चरर हैं आप...कॉफी का दूसरा घूँट भरने के बाद मैंने उससे पूँछा....जी समाजशास्त्र....ह्म्म्म्म....बहुत खूब....अच्छा विषय है आपका....हाँ कह सकते हैं....वो बोली....और आपने क्या किया हुआ है....एम.एस.सी मैथ से...अरे वाह....वो बोली....फिर आप बैंक में क्या कर रहे हैं...शक्ल से तो आप पढने लिखने वाले लगते हैं....हमारी तरह लेक्चरर क्यों नहीं बन गए....मैं मुस्कुराया....जी वो हमारे बस का रोग नहीं है....अच्छा जी...तो बैंक की नौकरी में खुश हैं आप....खुश होने की वजह अभी तक मिली नहीं....मैं बोला ...जो करना चाहा उसका मौका नहीं मिला....और जो हुआ वो होता गया...बस आगे देखते हैं क्या होता है....आगे के लिए ऐसा कुछ सोचा नहीं 

हमारी बातें थी उनके विषय बदलते जाते और हम कॉफी के घूट भरते जाते...बातों ही बातों में मुझे उसका नाम स्वेता और उसे मेरा नाम आदित्य पता चला....कुछ था जो मुझे उस से जोड़ रहा था....वरना एक भी पल ऐसा नहीं आया कि मुझे लगा हो कि अब मुझे चलना चाहिए...उस रोज़ 5-6 कॉफी हम लोगो ने ख़त्म की...जिसमें पता चला कि उसके पिताजी एक प्रोफेसर हैं और वो अपने माँ बाप की इकलौती संतान है....वो यहाँ मेरी ही तरह इस शहर में अकेली है....किताबों से उसे मेरी तरह ही लगाव है....पर फर्क है कि मैं बस किसी खोज में लगा हूँ...और उसे पूरी तरह पता है कि उसे कब क्या करना है....हाँ शायद उसे ये भी पता था कि उसे लेक्चरर बनना था....उसके अन्दर कहीं भी छल, कपट, झूट और मक्कारी जैसी कोई चीज़ मुझे दिखाई नहीं दी...जिसे में अक्सर दूसरे लोगों में देखता था....शायद यही वजह थी कि मैं लोगों से दूर भागता था 

और उसकी बातों में मैं उससे वो किताब 'रसीदी टिकट' लेना ही भूल गया...बातों ही बातों में पता चला कि उसे फूलों से लगाव है, साहिर साहब के लिखे गीत पसंद हैं....उसे मंदिर जाने से ज्यादा अच्छा चर्च जाना लगता है...हिन्दू होते हुए भी उसकी ये बात मुझे थोडी अलग लगी...हालांकि मेरी और भगवान की बिलकुल नहीं बनती थी....और एक लम्बा अरसा बीत चुका था जब मैं आखिरी बार मंदिर गया था 

काफी लम्बा समय बीत जाने के बाद उसने कहा कि अब उसे चलना चाहिए...हालांकि वो मेरी बातों से समझ चुकी थी कि भगवान में मेरी ज़रा भी दिलचस्पी नहीं है...फिर भी ना जाने क्यों उसने मुझे रविवार के दिन चर्च चलने के लिए बोला....मैं क्या कहता....मैं उसकी ओर देखकर मुस्कुराया....साफ़ तौर पर ना बोलने वाला इंसान था मैं....लेकिन मैंने उससे ना चाहते हुए भी हाँ बोल दी....आखिर और करता भी क्या....उस शहर में ऐसा था भी कौन जिसके साथ मैं समय बिताने वाला था.... 

घर लौट कर मैं अपने बिस्तर पर करवट बदल रहा था...आज उससे की हुई बातें दिमाग में चल रही थीं....ऐसा क्यों हो रहा था....शायद मुझे भी नहीं पता था....ऐसा नहीं था कि पहले कभी किसी लड़की से मैंने बात नहीं कि थी....पर इसमें ऐसा कुछ खास था....जो मुझे अपनी ओर खींचे जा रहा था....शायद ऐसा कुछ जिससे मुझे राहत मिलती हो....खैर जैसे तैसे मैं सुबह होने से पहले सोया.... 

दो दिन बाद रविवार था....मुझे ठीक याद था कि मुझे जाना है...जबकि मैं उस दिन ना जाने की सोच कर आया था....मैं चर्च के कुछ ही दूरी पर खडा था....समय था कि बहुत बड़ा लम्बा फासला सा तय करने जैसा लग रहा था....अपनी ऐसी हालत में सिगरेट पीने की आदत पर में काबू ना कर सका...पास ही से एक सिगरेट खरीद मैंने सिगरेट सुलगा ली....और उसके आने का इंतज़ार करने लगा....वो एक बहुत ही प्यारे सूट में आई...शायद आज मैंने उसे जी भर कर देखा....वो बहुत ही प्यारी लग रही थी....दूर उसे आते देख मैंने अपनी सिगरेट फेंक दी....वो पास आई और मुस्कुराते हुए बोली...आप सिगरेट पीते हैं....

मैंने कहा हाँ...कभी कभी पीता हूँ....उसने कुछ नहीं बोला...जबकि मैं सोच रहा था कि शायद ये भी दूसरी लड़कियों की तरह ऐसा कुछ बोलेगी कि छोड़ दो या बुरी बात है...पर उसने ऐसा कुछ नहीं बोला....उसने अपने बैग से पानी की बोतल निकाली और मुझे दी....मैंने मुंह में पानी डालकर गला साफ़ किया....वो मुझे अपने साथ चर्च के अन्दर ले गयी....ये पहली बार था जब मैं किसी चर्च में आया था....एकदम शांति....गिने चुने लोग....वो एक जगह बैठ गयी....मैं भी उसके पड़ोस में बैठ गया.... 

फिर मैं कभी सामने देखता...और कभी उसके चेहरे को...उसने अपनी आँखें बंद कर रखी थी....उस पल वो मुझे बहुत मासूम और नेक इंसान लगी....यूँ लगा कि बहुत ही प्यारी आत्मा है...शायद उसने कुछ माँगा भी हो....पता नहीं क्या....लेकिन माँगा ही होगा....ज्यादातर लोग माँगने ही तो जाते हैं....यही सोच रहा था मैं....उसने कुछ रुपये वहाँ दान में दिए....इससे ये तो पता चला कि कम से कम उसने अपनी प्रार्थना में पैसे तो नहीं माँगे होंगे...वो बोली पता है...ये पैसे गरीब बच्चों के काम में आते हैं...उनकी पढाई, खाना, कपड़े वगैरह....मुझे उसकी बातों ने प्रभावित किया 

अभी बस हम चर्च के बाहर पैदल चल ही रहे थे कि पास ही एक बच्चा सड़क पार कर रहा था कि एक गाडी अनियंत्रित होकर उसे टक्कर मारकर चली गयी....उधर अफरा तफरी मच गयी....मैंने बच्चे को गोद में उठाया....और रिक्शे में बैठ पास ही अस्पताल ले जाने लगा...स्वेता भी मेरे पीछे दूसरे रिक्शे पर आई...डॉक्टर को दिखाने पर....डॉक्टर ने उसकी पट्टी की और कुछ दवा लेने को बोल दिया.....उसकी दवा खरीद कर उस बच्चे को उसके घर पहुंचा दिया....उसके माँ बाप हमे बहुत रोकते रहे लेकिन देर ज्यादा हो जाने के कारण हमने फिर कभी आने का वादा किया 

उस बच्चे के घर से वापस लौटते समय वो काफी देर खामोश रही....फिर बोलने लगी कि इस दुनिया में ज्यादातर लोग ऐसे क्यों होते हैं....जब उस बच्चे को चोट लगी तो सब बस खड़े देख रहे थे.....समझ नहीं आता कि लोग ऐसे क्यों होते हैं....मैंने उसे रिलेक्स होने के लिए बोला....कहा कि ये सब तो चलता रहता है....वो बोली नहीं आखिर क्यों हम इतने स्वार्थी हो जाते हैं....समझ नहीं आता....मैं उसकी ओर देख कर मुस्कुराया और कहा चलो कोई नहीं अब वो ठीक है....चिंता मत करो....मैंने उसे घर वापस जाने के लिए बोला....रिक्शे पर उसे बैठा कर मैं पैदल चलने को हुआ....वो बोली आदित्य आप अपना मोबाइल नंबर दे दीजिये....मुझसे नंबर लेने के बाद वो चली गयी....मैं उसके ओझल हो जाने तक उसे देखता रहा....मेरे घर पर पहुँचने पर एक मैसेज आया..."मुझे फक्र है कि आप जैसा इंसान मेरा दोस्त है"...उसके नीचे नाम लिखा था स्वेता....मैंने उसे बदले में मैसेज किया कि चलो अब आराम कर लो कल शाम को हम लोग मिलते हैं.... 

हम दोनों की मुलाकातों का एक लम्बा दौर चल निकला....हम दोनों आपस में एक दूसरे से बहुत घुल मिल गए थे....हम दोनों घंटो एक दूसरे के साथ बैठे बातें करते रहते.....वो बातें करते करते थकती ना थी...और मुझे उसको सुनते रहना अच्छा लगता....शायद अब हम दोस्ती के रिश्ते से आगे बढ़ने लगे थे....वो जब तब मेरे लिए कुछ न कुछ बना के भी लाती....फिर एक दिन मैंने कहा कि चलो इस रविवार को पास में ही एक सुन्दर सी झील है वहां घूमने चलेंगे....उसने कहा ठीक है
 
हमारी मुलाकातों और ढेर सारी बातों का ही ये असर था कि स्वेता मुझे आदित्य से 'आदि' कहने लगी थी....जो उसके मुंह से सुनने में उतना ही अच्छा लगता...जितना कि मुझे स्वेता अच्छी लगती....मुझे पता ही ना चला कि मुझे कब उससे प्यार हो गया...शायद पता भी ना चलता...लेकिन कहते हैं ना कि कभी कभी किस्मत हम पर मेहरबान होती है....

जैसा कि मैंने उससे कहा था कि हम लोग आने वाले रविवार को झील के पास घूमने चलेंगे....रविवार के दिन स्वेता को साथ ले मैं उस झील के किनारे पहुँच गया....झील की सुन्दरता और वहां का आकर्षण और पंक्षियों के चहचहाने और इधर से उधर होने की गूँज हमारे कानों में पड़ती तो दिल खुश हो जाता....काफी लोग वहां घूमने के लिए आये थे....कुछ पल के लिए वो खामोश रही....अपनी अँगुलियों से मिट्टी में आडी- तिरछी लकीरें खीचती रही....मैंने पूंछा क्या हुआ स्वेता....आज बहुत चुप चुप हो....क्या हुआ.....ह्म्म्म...कुछ नहीं....नहीं कोई बात तो है....अरे नहीं कुछ भी तो नहीं....अच्छा...या बताना नहीं चाहती....नहीं न कोई बात नहीं है....अच्छा चलो ठीक है....अच्छा बोलो आइसक्रीम खानी है....वो देखो वहाँ आइसक्रीम वाला है....उसने हाँ में गर्दन हिलाई....मैं आइसक्रीम लेकर आया.... 

जब आइसक्रीम ख़त्म कर ली तो उसकी खामोशी को तोड़ने के लिए मैंने पूँछा....अच्छा बताओ कि 'रसीदी टिकट' फिर पढ़ी....हाँ दोबारा पढ़ी थी....तो कैसी लगी.....सच कहूँ तो उसमें....इंसान के जज्बात हैं...जिसे इंसान महसूस करता है....हर किसी के बस का नहीं कि उस हद तक इंसान शब्दों में अपने एहसास को बयां कर सके....फिर इतना बोलने के बाद उसने चुप्पी साध ली....मैं झील की तरफ देख रहा था....वो काफी देर तक सिर्फ और सिर्फ मेरी ओर देखती रही...फिर कुछ देर सोचते हुए उसने मुझसे सवाल किया...अच्छा आदि आपको कभी किसी से इश्क हुआ है....ह्म्म्म्म....क्या कहा....मैंने उसकी ओर देखते हुए पूँछा....कुछ देर मेरी ओर देखने के बाद बोली ...कुछ नहीं....और धीमे से बोली बुद्धू....नहीं तुम कुछ पूंछ रही थी....कुछ नहीं....अरे नहीं बोलो...आपको कभी इश्क हुआ है.....मैं मुस्कुराया....पता नहीं...वैसे डर लगता है....वो बोली किससे....मैंने कहा इश्क से.....क्यों डर क्यों लगता है....क्योंकि इश्क करके ज्यादातर लोग मिल नहीं पाते...प्रेम कहानियाँ ज्यादातर अधूरी रह जाती हैं....वो मुस्कुरायी...बस इस लिए डरते हो....ह्म्म्म्म्म शायद....वैसे आज तक मुझे पता नहीं चला कि मुझे कभी इश्क जैसा कुछ हुआ हो....तुम्हें हुआ है क्या...मैंने पूँछा...मेरी आँखों में देखकर फिर दूसरी ओर देखने लगी वो....उसने कुछ जवाब नहीं दिया 

फिर उसने पूँछा अच्छा वो वहाँ लोग कहाँ जा रहे हैं...बड़ी भीड़ है....मैंने कहा....इश्क के मारे हैं....क्या मतलब....अरे मतलब ये कि वहाँ पास में ही एक मंदिर है....और यहाँ के लोग कहते हैं कि अगर कोई सच्चे दिल से किसी को चाहता है और यहाँ आकर उसे मांगता है....तो उसकी मन्नत पूरी होती है....उसके चेहरे पर एक अजीब सी ख़ुशी चमक उठी...अच्छा वाकई....चलो हम भी घूमने चलते हैं वहाँ....मैंने कहा क्या करोगी जाकर....छोडो बैठो...सब फालतू की बातें हैं....अरे चलो ना मुझे मंदिर देखना है....मैंने कहा मैं तो नहीं जा रहा....वो बोली प्लीज प्लीज प्लीज....चलो ना....मैंने कहा ठीक है...चलते हैं...पर मैं सिर्फ तुम्हारी वजह से जा रहा हूँ.... 

वहाँ पहुँच वो मंदिर में पूरी श्रद्धा के साथ ध्यान मग्न हो गयी....पता नहीं मन ही मन क्या माँगा उसने....मैं तो बस खड़े खड़े उसे ही देखता रहा....वहाँ ना जाने कितने चाहने वाले आये थे...अपनी अपनी मन्नते लेकर....वहाँ पास ही बैठे कुछ भिक्षुओं को कुछ देने के लिए मुझसे बोली पर्स निकालो अपना...मैंने कहा क्यों...अरे निकालो ना....उसमें से उसने २०० रुपये निकाल कर और उनके फल खरीद कर सबमें बाँट दिए....मैंने कहा अब खुश...अब चलें...वो मुस्कुरायी...बोली नाराज़ हो क्या...मैं भी मुस्कुरा गया....फिर हम झील के किनारे पहुँचे....तो ना जाने कैसे मेरा पैर मुड गया...और मेरे पैर में मोच आ गयी.....उफ्फ दर्द के कारण बुरा हाल हो गया मेरा.....स्वेता ने मुझे संभाला...और मुझे रिक्शे में बिठा कर डॉक्टर के पास ले गयी...डॉक्टर ने कुछ दवा दी और फिर उसके बाद मैं स्वेता के कंधे का सहारा लेकर ही रिक्शे मैं उसके साथ बैठा...मुझे मेरे कमरे तक वो लेकर गयी.... 

कमरे की हालत देखकर वो दंग रह गयी....कपडे जो थे वो इधर के उधर....कमरे में सिगरेट के टुकड़े पड़े हुए थे....उसे ज़रा भी देर ना लगी ये जानने में कि मैं निहायत ही आलसी किस्म का इंसान हूँ...और जो अपना ख्याल नहीं रखता....मुझे बिस्तर पर लिटा वो बोली ये क्या हालत बना रखी है कमरे की...इसी तरह रहा जाता है क्या....क्या इसी तरह जिंदगी बिताओगे....मैं हँसा तो मेरा पैर हिल गया....और अचानक से दर्द हुआ....रहने दो हँसने की कोई जरूरत नहीं है.....और फिर उसने सारे कपडे एक एक करके मेरे देखते देखते धो डाले...मेरे मना करने पर भी वो ना मानी....कुछ ही देर में कमरे की हालत बदल गयी....वो कॉफी बनाकर मेरे लिए लायी...क्यों करते हो ये सब....जिंदगी से ज़रा भी लगाव नहीं....शादी क्यों नहीं कर लेते.....मैंने कहा क्या करूँगा शादी करके...ऐसा ही भला हूँ....और शादी करने के लिए भी लड़की की जरूरत होती है....कहाँ से लाऊं लड़की....क्यों कमी है क्या लड़कियों की...किसी को पसंद करते हो तो उससे कर लो....मैंने कहा....ये इश्क भी अजीब है....वो बोली या हो सकता है कोई तुम्हें पसंद करती हो....मैंने कहा इस सरफिरे को कौन पसंद करेगी....और मैंने फिर एक गलत सवाल पूंछ लिया....वैसे तुम कब शादी कर रही हो...बुलाओगी ना....बस शायद वही गलत हुआ....उसने कुछ ना बोला....उस रोज़ वो मेरे लिए खाना बना कर चली गयी....और अगले दो रोज़ तक भी स्वेता आती और ज्यादा बात ना करके खाना बनाकर और मुझे खिलाकर चली जाती...मेरी किसी बात का जवाब हाँ या ना में देती.... 

लेकिन उस रोज़ वो कुछ उदास थी....वो आई उसकी आँखों में कई सारे सवाल थे....मैं भी कुछ परेशान हो चला था....वो खाना बनाकर और मुझे वो किताब 'रसीदी टिकट' देकर कहने लगी मैं कुछ दिनों के लिए घर जा रही हूँ....पर क्या हुआ....कुछ नहीं...और इतना कह कर वो चली गयी....उसका जाना मुझे बहुत अजीब लगा....बिस्तर पर करवटें बदल मुझसे रहा ना गया...मैंने वो किताब पलटी...उसमें एक ख़त रख छोडा था उसने.... 

जिसे पढ़ा और पढता ही चला गया...उसके बाद मैं अपने आप को कोस रहा था...क्या किया उस बेचारी के साथ....उसने लिखा कि आदि क्या आपको किसी की मोहब्बत की पहचान नहीं....या एक लड़की क्या चाहती है...ये भी उस लड़की को ही बोलना पड़ेगा....घर वाले पूंछते रहते हैं कि शादी कर लो...कोई पसंद हो तो बता दो...क्या बता दूं .....मुझे वो पसंद है जो...इश्क को एक फालतू काम समझता है...जा रही हूँ....मुझे नहीं पता आगे क्या होगा..... 

मैं जानता था कि उसके शहर को जाने वाली ट्रेन अभी 1 घंटे बाद ही है....मैं जिंदगी भर अपने आप को कोसना नहीं चाहता था....मैं बाहर को जैसे का तैसा निकल लिया....रहा सहा दर्द तो मालूम ही नहीं पड़ा....शायद अब कोई दर्द मुझे ना रोक पाता....रिक्शे में बैठ मैं स्टेशन पहुँचा....वो दूर एक बैंच पर बैठी थी...गुमसुम...चुपचुप...खामोश सी....कुछ सोचती सी....मैं उसके पास पहुँचा....वो ख़त हाथ में पकड़ उसके चेहरे की तरफ देखा..उसने मुझे एक नज़र देख...अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया....जब मैं दूसरी तरफ से उसे देखा तो फिर उसने अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया....स्वेता.....अच्छा बाबा सॉरी....माफ़ कर दो.....मैं कौन होती हूँ.....सॉरी...सॉरी ...सॉरी.... 

अच्छा कान पकड़ता हूँ...मैं घुटनों के बल उसके सामने ही बैठ गया....और कान पकड़ लिए...सॉरी ...सॉरी...माफ़ कर दो ना प्लीज....मुझे क्या पाता था कि....क्या कि....वो बोली....यही कि तुम भी मुझसे प्यार कर सकती हो.....वो फिर दूसरी तरफ देखने लगी ....अच्छा बाबा सॉरी...कोई सवाल नहीं...बाप रे इतना गुस्सा.....उसने मेरी आँखों में देखा....और देखती रही....मैं बोला वैसे तो मुझे भी ना जाने क्यों बहुत दिनों से ऐसा महसूस हो रहा था...लेकिन...मतलब...लेकिन....मुझे डर लगता था...और सच कहूं तो मुझे ठीक से पता ही नहीं था प्यार कैसे होता है...वो इस बात पर हँस पड़ी...बुद्धू...अच्छा बोलो माफ़ किया ना.....ओके ठीक है बाबा....आई लव यू.....मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ....बहुत ज्यादा...ह्म्म्म हाँ सबसे ज्यादा.....वो मुस्कुराने लगी...बुद्धू...पागल....और ये क्या उन्हीं कपडों में चले आये.....मैंने खुद को देखा...क्यों बुरा लग रहा हूँ क्या....उसने सर हिलाया....और कुछ बुद्धू सा कुछ बोला..... 

वो बोली अच्छा ठीक है आप कल मेरे घर आना...मैं पापा से आपको मिलाऊँगी....क्यों...किसलिए...आपको शादी नहीं करनी तो क्या...मेरे पापा को मेरी शादी करनी है....मैं मुस्कुरा गया....ओह....अच्छा ठीक है...उसने अपना पता लिखकर दिया.....ट्रेन ने आवाज़ दी....मैंने उसे ट्रेन में बिठाया....ट्रेन चलने को हुई....तभी वहाँ से एक फूल वाला गुजरा...मैंने एक गुलाब दौड़ते हुए स्वेता को पकडाया....और तेज़ आवाज़ में कहा आई लव यू.....उसने भी कहा आई लव यू ...... 

अगले रोज़ में एक अच्छे बच्चे की तरह उनके पिताजी के दरबार में हाज़िर हो गया....बैठने के कमरे में जहाँ एक ओर किताबें रखी हुई थीं....और दूजी ओर कुछ जीते हुए इनाम....कुछ चित्रकारी.....जिनसे पता चला कि स्वेता को इसका भी शौक है.....मैं खडा होकर किताबे देखने लगा....कुछ ही देर में स्वेता के पिताजी जिन्हें मैंने अंकल कहकर संबोधित किया का उस कमरे में प्रवेश हुआ..... 

आंटी जी मिठाई, नमकीन, बिस्कुट और कॉफी लेकर आई....अंकल जी, आंटी जी और मैं काफी देर तक खामोश से रहे...फिर आंटी जी ने कहा लो बेटा....कुछ लो....मैंने थोडा सा झिझकते हुए कॉफी उठाई....पास ही वो किताब रखी हुई थी जिसे मैं देख रहा था.....तो आप पढने का शौक रखते हैं या यूँ ही.....स्वेता के पिताजी बोले....जी पढ़ लेता हूँ ...अच्छा लगता है पढना.....फिर इस तरह से बात शुरू हुई और काफी लम्बे समय तक किताबों में ही उलझी रही....आंटी जी बोली चैन लेने दोगे बच्चे को या बस यही सब....बस हँसी का माहौल बन गया....मैं भी मुस्कुरा गया....और अंततः अंकल जी बोले कि बेटा बाकी सब तो स्वेता ने आपके बारे में बहुत कुछ बता दिया है....और हमे ख़ुशी है कि उसने तुम्हें पसंद किया है....आंटी जी बोली बेटा तुम हमें पसंद हो....हमारी एक ही बेटी है.....बस गुस्सा थोडा होती है लेकिन दिल की बहुत अच्छी है....मैं मुस्कुरा गया.....हाँ सो तो है...मैंने कहा....तभी अन्दर से स्वेता की आवाज़ आई क्या कहा.....मैंने कहा कुछ नहीं .....मैंने तो कुछ कहा ही नहीं....और सब हँसने लगे...स्वेता भी हँसने लगी..... 

दो महीने बाद हमारी शादी हो गयी.....पहली रात को जब मैं कमरे में दाखिल हुआ...तो मैंने उसका हाथ पकड़ कर कहा अच्छा ये फ्रेंच किस क्या होती है....नाम कुछ सुना सुना सा लगता है.....वो मुस्कुरा गयी....बोली क्यों सिर्फ सुना ही है....हाँ सिर्फ सुना है....अच्छा बच्चू....जानती हूँ कितने बुद्धू हो....जाओ जाओ.....मैंने कहा सच्ची मुच्ची नहीं जानता....सिखाओ न .....वो मुस्कुरा गयी.....बुद्धू ...ऐसा कुछ बोला शायद उसने ....

18 comments:

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

अनिल जी कहानी का प्रवाह अच्छा रहा।

प्रेम पर आपकी लेखनी गजब की चलती है।

neeshoo ने कहा…

mza aa gya re bahi ..............kya khub likha hai aapne anil ji ... aise hi likhte rahiye hmare liye

बेनामी ने कहा…

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