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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

गीत तुम्हारे मैंने गाये--------[अगीत]-------डाo श्याम गुप्त

गीत तुम्हारे मैंने गाये,
अश्रु नयन में भर-भर आये,
याद तुम्हारी घिर-घिर आई;
गीत नहीं बन पाये मेरे।
अब तो तेरी ही सरगम पर,
मेरे गीत ढला करते हैं;
मेरे ही रस,छंद,भाव सब ,
मुझसे ही हो गये पराये।

6 comments:

वन्दना ने कहा…

sundar bhavavyakti.

Mithilesh dubey ने कहा…

सुन्दर रचना ।

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

गीत तुम्हारे मैंने गाये,
अश्रु नयन में भर-भर आये,

बढ़िया लगी रचना गुप्ता जी ।

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

सुन्दर अगीत के लिए श्याम जी आभार आपका ।

neeshoo ने कहा…

चन्द लफ्जो में बहुत कुछ कह दिया आपने श्याम जी , बधाई ।

Dr. shyam gupta ने कहा…

यह लयबद्ध अगीत आप् सब को पसन्द आया , सभी का धन्यवाद. सन्क्षिप्तता में अपनी पूरी बात कहदेना अगीत का प्रमुख गुण है, जो आदर्णीय निराला जी के अतुकान्त काव्य विधा को आगे बढाते हुए एक अन्य विधा है ।