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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

काव्य के गुण व अगीत------- (डा श्याम गुप्त)

काव्याचार्यों द्वारा स्थापित काव्य के गुण -माधुर्य, ओज एवं प्रसाद गुण , काव्य व काव्य कृति के आवश्यक अंग हैं , अर्थात काव्य में शब्द, अर्थ व भाव सौन्दर्य होना चाहिए ताकि पाठकों को रसास्वादन एवं आह्लाद ( माधुर्य ) से बुद्धि प्रकाशित होकर मन व चिट्टा स्फूर्त व ज्ञान मय होजाय (ओज गुण ) और परिणामी भाव में चित्त प्रफुल्लित होकर उसकी वृत्तियों में नवीनता व विषय का विकासोन्मुखी भाव उत्पन्न हो ( प्रसाद गुण ).| काव्य के वर्ण्य विषय के अनुसार कविता में ये गुण मुख्य या गौण हो सकते हैं | मेरे विचार से जन सामान्य व पाठकों के जन मन रंजन के लिए काव्य का सर्वप्रथम गुण सहज भाव-संप्रेषणता होना चाहिए, अर्थात भाषा सरल,सहज,अभिधात्मक या अर्थ व भाव लक्षणा त्मक सबकी समझ में आने बाली होनी चाहिए |
काव्य या साहित्य का दूसरा मुख्य गुण है,सा +हिताय + य: , अर्थात जिसमें समाज के व्यापक हित की बात हो,जो समष्टि, व्यष्टि ,सृष्टि व संस्कृति के समग्र हित की बात करे'
जिसे अधिकतम जन समझ पाए | ऐसी कविता ही तीनों गुण युक्त व सत्यम शिवं सुन्दरम होकर कालजयी हो सकती है| यथा --
" बात गहरी लफ्ज सादे शायरी का राज है , ये बयान करने का सबसे खुशनुमा अंदाज़ है |" ---खुमार बाराबंकवी
इसके लिए न किसी गुण, कला आदि को प्रयत्न पूर्वक लाने की आवश्यकता है न विधा विशेष की | कवि के ज्ञान, विषय ज्ञान व साहित्य ज्ञान, प्रज्ञा, विवेक के अनुसार ये गुण कविता में स्वतः ही आजाते हैं |
अगीत विधा रचनाओं में भी ये गुण स्वाभाविक रूप में विद्यमान होते हैं| लम्बे गीतों की अपेक्षा अगीतों में लघु कलेवर के कारण ये गुण समाहित करना अधिक कौशल का कार्य है |निम्न उदाहरणों से स्पष्ट है कि अगीतों में भी ये सारे गुण विद्यमान हैं एवं यह विधा अपनी रचनाओं व कृतियों द्वारा पुष्टता व सफलता के साथ उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर अग्रसर हो रही है | माधुर्य गुण प्रधान एक अगीत देखें --

" श्रेष्ठ कला का जो मंदिर था,
तेरे रूप सजा मेरा मन,
प्रियतम तेरी विरह पीर में
पतझड़ सा वीरान होगया;
जैसे धुन्धलाये शब्दों की,
धुंधले अर्धमी चित्रों की,
कला बीथिका एक पुरानी |" ----- डा श्याम गुप्त ( प्रेम काव्य से )
सरल शब्दों में भाव व्यंजना-युक्त गहन बात कही गयी है,जो पाठक के ह्रदय में उतर कर आह्लाद युक्त माधुर्य गुण प्रधानता से उपन्ना करता है | इसी प्रकार निम्न अगीत में नए युग के आगमन का ज्ञान, शान्ति की आशा, राष्ट्र के आह्वान से स्फूर्त भाव उत्पन्न होकर कविता को ओज गुण प्रधान बनाता है--
"नव युग का मिलकर निर्माण करें ,
मानव का मानव से प्रेम हो ;
जीवन में नव बहार आये |
सारा संसार एक हो,
शान्ति और सुख से
यह राष्ट्र लहलहाए || " ---डा रंग नाथ मिश्र 'सत्य'
अभिधात्मक शैली में सीधे सीधे पाठक से भाव सम्प्रेषण करती हुई कविता प्रेम का सीधे सीधे अर्थ कह जाती है ,पाठक के चित्त में सहज अर्थ निष्पत्ति के साथ प्रेम का विकासमान भाव उत्पन्न करती हुई प्रसाद गुण युक्त कविता का उदाहरण प्रस्तुत है---

""तुमसे मिलने आऊँगा,
बार बार आऊँगा:
चाहो तो प्यार करो,
चाहो ठुकरा दो|
भाव बहुत गहरे हैं ,
इनको दुलारालो ||"" ----डा रंग नाथ मिस्र 'सत्य'
ये तीनों गुण समन्वित रूप में भी एक ही कविता में विद्यमान हो सकते हैं | समन्वित गुणों से युक्त एक त्रिपदा अगीत देखिये---
"" पायल खनका कर दूर हुए,
हम कुछ ऐसे मजबूर हुए;
उस नाद-ब्रह्म मद चूर हुए ||"" -----डा श्याम गुप्त

उपरोक्त अगीत में रूप रस सौन्दर्य की कल्पना से आह्लादित व रसास्वादन से आनंदित पाठक का चित्त ( माधुर्य गुण ) सोचने पर बेवश होता है एवं प्रेम की विविधताओं से स्फूर्त व प्रकाशवान हो उठता है ( ओज गुण निष्पत्ति ) पायल के स्वर का नाद ब्रह्म से तादाम्य चित्त को प्रेम-श्रृंगार के अध्यात्म भाव तक की विकासमान यात्रा कराता है ( प्रसाद गुण ), अतः इस रचना मन तीनों गुण समन्वित भाव में प्रस्तुत हुए हैं ||

9 comments:

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

गुप्ता जी आपने अपने कहे अनुसार बेहतरीन जांनकारी प्रदान की है, तहे दिल से आभार व्यक्त करता हूँ ।

Mithilesh dubey ने कहा…

हिन्दी साहित्य मे रुची रखने वालो के लिए बेहद उम्दा जानकारीं दी है आपने , आभार ।

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा…

उम्‍दा जानकारी। लेकिन आज हिन्‍दी साहित्‍य के शि‍क्षक तो गरिष्‍ठता को ही साहित्‍य की संज्ञा देते हैं। वे ऐसे बिम्‍बों को प्रोत्‍साहित करते हैं जो सर से ऊपर निकल जाए। यही कारण है कि आज साहित्‍य आम जनता से दूर होता जा रहा है।

Dr. shyam gupta ने कहा…

डा श्रीमती अजीत गुप्ता जी -आपका कहना एक दम सत्य है, क्लिष्टता , अति-कलात्मकता, दूर दूर से सप्रयास ढूंढ कर लाई गई व्यन्जना आदि से कविता में भाव प्रधानता व सहज़ अर्थ प्रतीति नहीं रहती तथा साहित्य को जन-समाज़ से दूर करती है , और कविता केवल अभिजात्य होकर रह जाती है, मूल गुण व उद्देश्य से दूर ।

neeshoo ने कहा…

सर जी आजकल तो हिन्दी साहित्य में ज्यादा प्रयोग नव कविता का ही रहा है । ऐसे में कहीं न कहीं हम ये कह सकते हैं कि त्रिपदा अगीत आदि विधाओं का चलन कुछ कम हुआ है । इस आलेख से बहुत कुछ नया भी जानने को मिला । धन्यवाद

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

अतिमहत्वपूर्ण एवं खोजपरक जानकारी ।

Dr. shyam gupta ने कहा…

-अगीत विधा१९६६ से स्थापित है , छन्द-विधा के ( तुकान्त) मठधारी इसका विरोध करते रहे हैं, जैसे अतुकान्त कविता के लिये निराला का. परन्तु यह उत्तरुत्तर आगे प्रगतिशील है. निराला युग से आगे यह, अतुकान्त कविता में सन्क्षिप्तता को लेकर आगे बढ रही है। विशद रूप में आगे हि.सा.मन्च पर आलेख लिखने का प्रयत्न करूंगा.

Gege Dai ने कहा…


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