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बुधवार, 27 जनवरी 2010

अवतरण ---- (डा श्याम गुप्त )

यह कंचन सा रूप तुम्हारा,

निखर उठा सुरसरि धारा में,

जैसे सोनपरी सी कोई ,

हुई अवतरित सहसा जल में,

अथवा पद वंदन को उतरा ;

स्वयं इंदु ही गंगा- जल में ||

7 comments:

SACCHAI ने कहा…

" bahut hi acchi rachana ..acche bhavoan ke saath ."

----- eksacchai { AAWAZ }
http://eksacchai.blogspot.com

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

यह कंचन सा रूप तुम्हारा,

निखर उठा सुरसरि धारा में,

जैसे सोनपरी सी कोई ,

हुई अवतरित सहसा जल में,

अथवा पद वंदन को उतरा ;

स्वयं इंदु ही गंगा- जल में ||

बहुत खूब....

Mithilesh dubey ने कहा…

यह कंचन सा रूप तुम्हारा,

लाजवाब कल्पना लगी, बेहद उम्दा भाव ।

neeshoo ने कहा…

चन्द शब्दो में आपने सब कुछ पिरो दिया है ।

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

बेहद लाजवाब अभिव्यक्ति लगी, बहुत-बहुत बधाई आपको इस सुन्दर रचना के लिए ।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

Sundar rachna. Badhaayi.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपका पोस्ट पढ़कर तो आनन्द आ गया!
इसे चर्चा मंच में भी स्थान मिला है!
http://charchamanch.blogspot.com/2010/01/blog-post_28.html