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गुरुवार, 12 नवंबर 2009

”कंजूस कर्ण’-----------(डा० तारा सिंह )

संयोग से एक बार मुझे अपने दोस्त विभा के साथ उसके गांव जाने का मौका मिला । जब मैं उसके गाँव के करीब पहुँची, तो देखा, गाँव के ठीक बाहर एक विशालकाय मूर्ति के आगे मेला लगा हुआ है । लोग श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं । मैणे पूछा,’ विभा ! यह मूर्ति, किसकी है , जिसे लोग माल्यार्पण कर रहे हैं ।’ विभा ने कहा,’ नाम पढ़ो, खुद जान जाओगी । मैंने जब नाम पढ़ा तो आश्चर्यचकित रह गई , अरे ! यह कैसा नाम ? ’ हमारे प्रिय , कंजूस सेठ छेदीलाल कर्ण’ पढ़कर मुझे कुछ अजीब सा लगा । यह क्या, कंजूस और कर्ण , नाम एक ही व्यक्ति का ; यह कैसे ? अब मूर्ति के बारे में जानने की मेरी रुचि और भी बढ़ गई । मैंने पूछा, ;’ये कंजूस कर्ण कौन हैं ?’ विभा ने मुझे बताया,’आज से अनेकों साल पहले हमारे गाँव में एक कंजूस रहा करते थे , उनका नाम छेदीलाल था । वे एक नंबर के कंजूस थे । इसलिए लोग उन्हें कंजूस छेदीलाल कहा करते थे और अब मरने के बाद वे , कंजूस छेदीलाल कर्ण कहे जाते हैं ।’ मैंने पूछा, ऐसा क्यों ? मरने के बाद वे कर्ण कैसे बने ? लोग तो जो भी दान करते हैं, जीते जी करते हैं । इन्होंने मरने के बाद ऐसा क्या दान किया, जो कंजूस छेदीलाल से छेदीलाल कर्ण कहलाने लगे । तब विभा ने जो कुछ मुझे बताया, मैं भी मान गई; लोगों ने इनका नाम बहुत सोच – समझकर , सठीक रखा है । विभा ने बताया,’ जानती हो, हमारे गाँव में आज से दश साल पहले तक न तो एक स्कूल था, न अस्पताल, न ही कोई पूजा करने का मंदिर । आज हमारे गाँव में ये सब कुछ हैं और ये सभी इन्हीं के प्रताप से हैं । जब तक ये जिन्दे रहे , कंजूसी में इनके जॊड़ में दुसरा कोई कंजूस नहीं था । ये इतने कंजूस थे कि अपने घर का अनाज बचाने के लिए सप्ताह में दो दिन वे उपवास पर चले जाया करते थे और परिवार के लोगों से भी ऐसा ही करने कहते थे । अपनी बात की पुष्टि में उनका तर्क था, ऐसा करने से शरीर स्वस्थ व नीरोग रहता है । इसलिए इन्सान को सप्ताह में कम से कम दो रोज उपवास पर रहना चाहिए ।


ऐसे तो सेठ छेदीलाल को मरे वर्षों बीत गये । लेकिन आज भी कंजूसी के लिए उनक नाम उदाहरण स्वरूप सबों की जिह्वा पर रहता है । कहते हैं, एक बार सेठ जोरों से बीमार पड़े । बीमार इतना कि, चलना – फ़िरना असंभव हो गया । तब गांव वालों ने उन्हें सलाह दिया, सेठ ! ईश्वर की दया से आपके पास किसी चीज की कमी तो नहीं है । करोड़ों के मालिक हो आप ; ईश्वर न करे, बिना इलाज आपको कुछ हो जाये । यह हकीमी दवा छोड़िये, शहर जाइये । वहाँ जाकर किसी अच्छे डाक्टर को दिखाइये । जिंदगी रहेगी, तो बहुत पैसे जोड़ लेंगे ।’ सेठ छेदीलाल सुनते ही गरम हो उठे । बोले,’ मुझसे मुलाकात करने आये हो तुमलोग या मेरा सलाहकार बनने । दया करके , अपनी सलाह देने की कोशिष मत करो । मेरे घर में मेरा भरा – पूरा परिवार है; जरूरत पड़ेगी तो उनसे सलाह – मशवरा कर लूँगा । ’ बेचारे गाँव के लोग, आखिर करते भी क्या, राम – सलाम कर,’ जैसी मर्जी’ कहते चलते बने । गाँव के लोगों के चले जाने के बाद, सेठ देर तक मन ही मन उनके विचारों पर विचार किये । फ़िर सोचे, ’हाथ कंगन को आरसी क्या ? ब्राह्मण को बुलवा लेता हूँ और उन्हीं से पूछता हूँ कि मेरी बीमारी के इलाज में कितना खर्च आयेगा और अगर इलाज न कराऊँ तो श्राद्ध में कितना खर्च आयेगा ? ’ सेठ छेदीलाल ने ऐसा ही किया । ब्राह्मण को बुलवाया और दोनों प्रस्ताव उसके समक्ष रखा ’। ब्राह्मण ने काफ़ी देर सोच – विचार किया; फ़िर बताया,’ सेठ ! आपको देख कर मुझे जैसा लगता है कि आप लम्बे समय से बीमार हैं । रोग दूर तक जड़ जमा चुका है । इसके इलाज में पैसे कुछ अधिक लगेंगे ” सेठ ने पूछा, ’ कितना ?’ ब्राह्मण ने कहा, ’ अंदाज रखिए, लगभग एक लाख तो लग ही जायेंगे । ’सुनकर सेठ उठ बैठा , और बोला,’ श्राद्ध में ?’ ब्राह्मण बोला,’ उसमें क्या है, श्राद्ध तो ५०० रुपये में भी निकाले जा सकते हैं ।’ ब्राह्मण की बात सुनकर कंजूस छेदीलाल खुश हो गये और बोले तो ऐसा ही होने दो । आखिर ऐसा ही हुआ, सेठ छेदीलाल बिना इलाज मर गये । लेकिन अपने जमा धन को हाथ नहीं लगाया । शायद इस डर से कि छूने से कहीं धन कम न पड़ जाये ।


सेठ छेदीलाल ने अपना जीवन कंजूसी में तो बिताया ही, बच्चों की भी स्कूली शिक्षा नहीं होने दी । उनका तर्क था कि आजकल शिक्षा बड़ी मंहगी हो गई है और शिक्षा लेकर भी क्या होगा ? नौकरी कहाँ मिलती है? इसलिए ऐसे कामों में धन खर्च करना कहाँ की बुद्धिमानी है ? यही कारण है कि सेठ के सभी बच्चे अशिक्षित रह गये । सेठ की पत्नी तो इसी चिंता में दुनिया छोड़ गई कि उनके बेटे बड़े होकर कैसे जीयेंगे । कुछ पढ़ते – लिखते, तो बात बनती । लेकिन सेठ मरकर बच्चों को इन सभी चिंताओं से बचा लिए । अपने पीछे करोड़ों की सम्पत्ति छोड़ गये जो उनके बेटों को हाथ लगी । फ़िर क्या था ? अच्छे घर और ऐश – ओ – आराम के सभी सामान खरीद लाए । कुछ गाँव को भी उन्होंने दान स्वरूप दिये । गाँव में एक मंदिर बनवाये ; बच्चों का एक स्कूल, एक वृद्धाश्रम इत्यादि; सब उन्हीं कंजूस छेदीलाल के धन से तो है । गाँव के लोग यह सब देखकर इतने खुश हुए कि सेठ छेदीलाल को ’कंजूस’ न पुकारकर ’कंजूस कर्ण’ कहने लगे । उनके अनुसार जीते जी छेदीलाल जी कंजूस थे ; लेकिन मरने के बाद तो वे दानी कर्ण हो गये । आज उन्हीं कंजूस सेठ छेदीलाल की पुण्य -तिथि है; इसलिए गाँव के सभी बच्चे, बुजुर्ग , महिलाएँ उन्हें माल्यार्पण कर रहे हैं । कंजूस कर्ण की कहानी सुनकर उनके प्रति मेरे हृदय में श्रद्धा उमड़ आई और मैंने भी फ़ूल खरीदकर उनके चरणों पर अपना श्रद्धा सुमन अर्पित किया ।


2 comments:

Nirmla Kapila ने कहा…

ांच्छी कहानी है चलो बाद मे सही छेदी लाल का धन काम तो आया धन्यवाद्

शरद कोकास ने कहा…

मज़ा आ गया यह कहनी पढ़कर