हमारा प्रयास हिंदी विकास आइये हमारे साथ हिंदी साहित्य मंच पर ..

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

लोग--------- (संतोष कुमार "प्यासा")

आखिर किस सभ्यता का बीज बो रहे हैं

लोग अपनी ही गलतियों पर आज रो रहे हैं

लोग हर तरफ फैली है झूठ और फरेब की

आग फिर भी अंजान बने सो रहे है

लोग दौलत की आरजू में यूं मशगूल हैं

सब झूठी शान के लिए खुद को खो रहे हैं लोग

जाति, धर्म और मजहब के नाम पर

लहू का दाग लहू से धो रहे हैं

लोग ऋषि मुनियों के इस पाक जमीं

पर क्या थे और क्या हो रहे है लोग

8 comments:

KAVITA RAWAT ने कहा…

लोग दौलत की आरजू में यूं मशगूल हैं

सब झूठी शान के लिए खुद को खो रहे हैं लोग

जाति, धर्म और मजहब के नाम पर

लहू का दाग लहू से धो रहे हैं

Bahut khub, achha laga.
Badhai.

अजय कुमार ने कहा…

संतोष जी अच्छी ग़ज़ल है
एक विनम्र निवेदन है -शायद 'लोग ' शब्द जो लाइन के आखिर में होना चाहिए ,वो अगले लाइन के शुरू में लग गया है | ऐसा मुझे लग रहा है ,गुस्ताखी माफ़

MANOJ KUMAR ने कहा…

बेहद रोचक और मार्मिक

santosh kumar "pyasa" ने कहा…

ajy kumar ji vo likhne me kuchh samsya ho gai hai

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर सामयिक रचना है।बधाई।

Kraxpelax ने कहा…

My Poetry Blog

http://singleswingle.blogspot.com/

SONNET XXXIX FOR KATIE

I went downtown, saw Katie in the nude
on Common Avenue, detracted soltitude
as it were, like a dream-state rosely hued,
like no one else could see her; DAMN! I phewed;

was reciprokelly then, thank heaven, viewed,
bestowed unique hard-on! but NOT eschewed,
contrair-ee-lee, she took a somewhat rude
'n readidy attude of Sex Prelude; it BREWED!

And for a start, i hiccuped "Hi!", imbued
with Moooood! She toodledooed: "How queued
your awe-full specie-ally-tee, Sir Lewd,
to prove (alas!), to have me finely screwed,

and hopef'lly afterwards beloved, wooed,
alive, huh? Don't you even DO it, Duu-uuude!"

My Poetry Blog

http://singleswingle.blogspot.com/

More...

Adiós, mis vacas! Que pasa en esta temporada de tristeza?
La soledad se cultiva en las ciudades;
viva la muerte.
Uno no debe imaginar que el hombre es bueno.
El paisaje se despierta en un fiel espejo, pregunte.

La noche ha porches de la siesta en ruinas con pistacho.
Débiles enemigos se disipa amigos sin
valor. La calle es corta.
Hay falta de coherencia, la esperanza y la fe.
Todas las puertas evitadas saludan: No pasarán.

My tentatively spanish poetry blog;

http://hollb.blogspot.com/

My Swedish Bhagavad Gita blog, which I consider important, should make some sense through Goggle translate:

http://kraxpelax-bhagavadgita.blogspot.com/

My Music Blog:

http://eutonal.blogspot.com

My good old I Ching Blog, in Engliush, certainly lives, too:

http://winmir.blogspot.com/

Feel free to announce your blog on mine.

- Peter Ingestad, Sweden

गुर्रमकोंडा नीरजा ने कहा…

अच्छा लगा
सभ्यता और आधुनिकता के नाम पर पता नहीं हम कहाँ खो रहे हैं

mustkeem ने कहा…

वहुत अच्छा लिखा है सर आपने