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सोमवार, 7 सितंबर 2009

आपको मेरा नमन है

यह कविता में अपने गुरुओ के लिये लिख रही हूँ , आज में जो कुछ भी हूँ बस उनकी ही कॄपा है। ईश्वर से प्रार्थना है की उनका हाथ सदा मेरे सर पर रहे।


मैं थी शिशु
अज्ञान - अबोध - अचेतन
सभी से अन्भिज्ञा थी मैं
उसने अपनों से परिचित कराया
जीवन की पाठशाला का
उसी से पहला पाठ पाया
प्रथम गुरु !! सर्वोच्च माता को मेरा नमन है ।

पशुतव से जो मनात्तव तक ले आये
आप ज्ञान के दर्पण हो
आपको मेरा नमन है ।

अपने ही भावो को व्यक्त करना सिखाया
आप शब्द दाता है
आपको मेरा नमन है ।

अज्ञान के तिमिर को हर कर
जो ज्ञान दीप आपने जलाये
आपको मेरा नामन है ।

आप स्वयं जले "पर" की खातिर
जीवन में ज्ञान के जुगनू जलाये
आपको मेरा नामन है ।
आप मेरे जीवन में मेरूदंड बन कर खड़े है
हर क्षण मुझे रास्ता दिखाये, आप वो दिये हो
आपको मेरा नामन है

आप बिन जीवन कैसा जीवन
कल्पना करना कठिन है
कल्पना करना सिखाया
आपको मेरा नमन है ।

अंधेरी ज़िन्दगी में
ज्ञान की किरणे बिखेरी
कभी प्यार कभी फटकार से
जीवन की बगिया सहेजी
आप बागवान हो
आप को मेरा नामन है

जहाँ भी हुआ अंधेरा
आप बन कर प्रभात आये
अपने साथ अक्षय ज्ञान रत्नो की सौगात लाये
क्या है ये संसार हम जान पाये
आपको मेरा नमन है

मेरे जीवन में सदा
आप का दर्जा प्रथम है
ईश्वर के उस अंश को
मेरा नमन है
शत-शत नामन है

8 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना.अच्छा है. गुरु के प्रति ऐसी भावना तो अब लुप्त ही होती जा रही है. बहुत सुन्दर रचना.बधाई.

विनय ‘नज़र’ ने कहा…

बहुत ख़ूब रचना है
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BlueBird

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत खुब। लाजवाब रचना

kush ने कहा…
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हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

अत्यन्त सुन्दर भाव।

kush ने कहा…

आपकी रचना गुरू को समर्पित है
आपकी रचना अति सुन्दर है।

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
neeshoo ने कहा…

गार्गी जी , बहुत ही सुन्दर रचना के लिए बधाई । आपका लेखन शानदार लगा । शुभकामनाएं ।