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रविवार, 6 सितंबर 2009

हिन्दी पखवाड़े में आज का व्यक्तित्व ---रांगेय राघव


हिन्दी पखवाड़े को ध्यान में रखते हुए हिन्दी साहित्य मंच नें 14 सितंबर तक साहित्य से जुड़े हुए लोगों के महान व्यक्तियों के बारे में एक श्रृंखला की शुरूआत की है । जिसमें भारत और विदेश में महान लोगों के जीवन पर एक आलेख प्रस्तुत किया जा रहा है । । आज की कड़ी में हम " रांगेय जी" के बारे में जानकारी दे रहें ।आप सभी ने जिस तरह से हमारी प्रशंसा की उससे हमारा उत्साह वर्धन हुआ है उम्मीद है कि आपको हमारा प्रयास पसंद आयेगा

रांगेय राघव एक ऐसा नाम जिसने बहुत कम समय में हिन्दी साहित्य के विकास के लिए वह कर दिखाया जिसकी तुलना शब्दो से की जाये तो वह तौहीन होगी। रांगेय राघव जी का बचपन से ही हिन्दी से लगाव रहा, इनके बारे मे कहा जाता था कि "जितने समय में कोई पुस्तक पढ़ेगा उतने में वे लिख सकते थे"। रांगेय राघव जी का जन्म १७ जनवरी, १९२३ को हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रंगनाथ वीर राघवाचार्य और माता का नाम श्रीमती वन -कम्मा था। इनका परिवार मूलरूप से तिरुपति, आंध्र प्रदेश का निवासी था। जब इन्होनें लिखना शुरु किया था उस समय भारत अपने आजादि के लिए संघर्षरत था। ऐसे वातावरण में उन्होंने अनुभव किया- अपनी मातृभाषा हिंदी से ही देशवासियों के मन में देश के प्रति निष्ठा और स्वतंत्रता का संकल्प जगाया जा सकता है। रांगेय राघव ने जीवन की जटिलतर होती जा रही संरचना में खोए हुए मनुष्य की, मनुष्यत्व की पुनर्रचना का प्रयत्न किया, क्योंकि मनुष्यत्व के छीजने की व्यथा उन्हें बराबर सालती थी। उनकी रचनाएँ समाज को बदलने का दावा नहीं करतीं, लेकिन उनमें बदलाव की आकांक्षा जरूर हैं। इसलिए उनकी रचनाएँ अन्य रचनाकारों की तरह व्यंग्य या प्रहारों में खत्म नहीं होतीं, न ही दार्शनिक टिप्पणियों में समाप्त होती हैं, बल्कि वे मानवीय वस्तु के निर्माण की ओर उद्यत होती हैं और इस मानवीय वस्तु का निर्माण उनके यहाँ परिस्थिति और ऐतिहासिक चेतना के द्वंद से होता है। उन्होंने लोग-मंगल से जुड़कर युगीन सत्य को भेदकर मानवीयता को खोजने का प्रयत्न किया तथा मानवतावाद को अवरोधक बनी हर शक्ति को परास्त करने का भरसक प्रयत्न भी। कुछ प्रसिद्ध साहित्यिक कृतियों के उत्तर रांगेय राघव ने अपनी कृतियों के माध्यम से दिए। इसे हिंदी साहित्य में उनकी मौलिक देन के रूप में माना गया। ये मार्क्सवादी विचारों से प्रेरित उपन्यासकार थे। ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ के उत्तर में ‘सीधा-सादा रास्ता’, ‘आनंदमठ’ के उत्तर में उन्होंने ‘चीवर’ लिखा। प्रेमचंदोत्तर कथाकारों की कतार में अपने रचनात्मक वैशिष्ट्य, सृजन विविधता और विपुलता के कारण वे हमेशा स्मरणीय रहेंगे। इनकी प्रमुख कृतियो मे घरौंदा , सीधा साधा रास्ता , मेरी भव बाधा हरो , साम्राज्य का वैभव , देवदासी ,समुद्र के फेन , अधूरी मूरत , जीवन के दाने ,रामानुज ,कला और शास्त्र , महाकाव्य विवेचन , तुलसी का कला शिल्प आदि थी। रागेय राघव ने वादों के चौखटे से बाहर रहकर सही मायने में प्रगितशील रवैया अपनाते हुए अपनी रचनाधर्मिता से समाज संपृक्ति का बोध कराया। समाज के अंतरंग भावों से अपने रिश्तों की पहचान करवाई। सन् १९४२ में वे मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित दिखे थे, मगर उन्हें वादग्रस्तता से चिढ़ थी। उनकी चिंतन प्रक्रिया गत्यात्मक थी। उन्होंने प्रगतिशीस लेखक संघ की सदस्यता ग्रहण करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें उसकी शक्ति और सामर्थ्य पर भरोसा नहीं था। साहित्य में वे न किसी वाद से बँधे, न विधा से। उन्होंने अपने ऊपर मढ़े जा रहे मार्क्सवाद, प्रगतिवाद और यथार्थवाद का विरोध किया। उनका कहना सही था कि उन्होंने न तो प्रयोगवाद और प्रगतिवाद का आश्रय लिया और न प्रगतिवाद के चोले में अपने को यांत्रिक बनाया। उन्होंने केवल इतिहास को, जीवन को, मनुष्य की पीड़ा को और मनुष्य की उस चेतना को, जो अंधकार से जूझने की शक्ति रखती है, उसे ही सत्य माना। रांगेय राघव जी सन् १९४६ में प्रकाशित ‘घरौंदा’ उपन्यास के जरिए वे प्रगतिशील कथाकार के रूप में चर्चित हुए। १९६२ में उन्हें कैंसर रोग से पीड़ित बताया गया था। उसी वर्ष १२ सितंबर को उन्होंने मुंबई (तत्कालीन बंबई) में देह त्यागी, और हिन्दी साहित्य ने अपना एक बेटा खो दिया।

10 comments:

Mithilesh dubey ने कहा…

रांगेय राघव जी का जिवन प्रेरणा स्रोत है। आज के युवा पिढी को इनसे सिख लेनी चाहिये, और युवावों को चाहिये कि वे हिन्दी साहित्य के विकास के लिए अपनी सहभागिता निश्चित करें।

tulsibhai ने कहा…

bahut hi badhiya jankari jo jankari prernadayi hai hum yuva varg ke liye ...isse ye pratit hota hai ki hume bhi kuch karna chahiye apani hindi bhasa ke liye "

----- eksacchai {AAWAZ}

http://eksacchai.blogspot.com

http://hindimasti4u.blogspot.com

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

मैं ने उन की रचनाओं से बहुत कुछ सीखा है। उन की स्मृति को शत शत प्रणाम!

neeshoo ने कहा…

बहुत बहुत आभार आपका इस आलेख के लिए ।

Suman ने कहा…

इस आलेख के लिए


बहुत बहुत आभार


suman

Nirmla Kapila ने कहा…

्रांगेय राघव जी हिन्दी साहित्य के गौरव हैं उनको शत शत नमन । और अपको भी धन्यवाद इस सुन्दर श्रिंखला के लिये

rajesh kushwaha ने कहा…

रांगेय राघव जी का व्यक्तिव बहुत अच्छा है ।
रचना अति सुन्दर है ।

Raju Ranjan ने कहा…

hindi ke vikas me sri raghav ji ke bare me padhkar behad sukhad anubhuti hui.hindi sahityakash me mhaanta ka doosra naam unhen unki jiwani prilakshit krti pratit hoti hai.unhen hmaara shat-shat- naman hai...

Gege Dai ने कहा…


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chenyingying9539 9539 ने कहा…

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