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गुरुवार, 3 सितंबर 2009

"लौट आये वो"

वक्त बीतता गया उन लम्हों के साथ,
जिसमें थी मेरी तन्हाई,
अन सुलझे हुए मुद्दों पर
आज नहीं होती है लडाई,
सोचता था ,
चाहता था,
जो कुछ भी मैं,
वो सब कुछ मिल गया,
पर
अब भी कसक उठती जहन में,
किस बात से थी रूसवाई,
सब बदला नहीं आज भी,
जो साथ हम आज भी,
बुनता हूँ यादों का ताना बाना
कुछ अकेले में,
वो प्यार या थी बेवफाई,
कभी-कभी रो लेता मैं चुप होकर
आंसू जिसे मोती कहती थी वो,
अब आते नहीं क्यों ?
मालूम नहीं ,
जो कुछ हुआ अच्छा हुआ,
हम साथ अब,
शायद यह थी-
प्यार की आजमाइश,
कहना भी डर डर के,
हर लफ्ज को,
फिर से न आये ये ,
रूसवाई।,

प्रस्तुत कर्ता
(नीशू)

5 comments:

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना नीशू जी, दिल को छु गयी। इस सुन्दर रचना के लिए बधाई

दिगम्बर नासवा ने कहा…

sundar ehsaas hai is rachna mein ... pyaar, judaai ka lajawaab prastutikaran hai ... badhaai

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

नीशू जी , बेहतरीन कविता प्यार की गहराई आपने उकेरी है ।

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

बहुत सुन्दर...

एकलव्य ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना