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रविवार, 31 मई 2009

कैसा अपना बचपन था [ एक कविता ]

आईस पाइस का खेल खेलते ,
मिट्टी के घर बनाते थे,
फिर बिगाड़ देते थे ,
मां से थोड़े समान मांगते
फिर एक चूल्हे पर उसे पकाते थे,
बनता क्या कुछ याद नहीं,
फिर भी अच्छा लगता था ,

नदियों में किनारे पर जा जाकर,
भीगते और सब को भीगाते थे,
कंकड़ ,और शीपी को लेकर,
उसकी एक माला बनाते थे,
बंदरों की तरह उछलकर ,
छोटे पेड़ो पर चढ़जाते थे,
कभी बात बात पर गुस्सा होते ,
रोते , चिढ़ते , मारते ,
फिर भी एक साथ हो जाते थे,
ऐसा अपना बचपन था.

झूठी कहानी भूतों वाली से,
अपने साथियों को डराते थे,
स्कूल से झूठा बहाना बनाकर ,
खेतों में हम छिप जाते थे,
मम्मी के मार से बचने को ,
न जाने क्या क्या जतन बताते थे,

दादी से अपने हम झूठी बाते मनवाते थे,
कभी सबेरे उठकर रोते,
तो कभी सब को हसाते थे,
ऐसा ही अपना बचपन था ,

खेतों में लोट पोट कर ,
फसलों को तोड़ तोड़कर ,
गायों को खिलाते थे,
सुबह सुबह दूध को पीकर,
अपनी मूछ बनाते थे ,
और शीशे में देख खुद को ,
हम भी बड़े बन जाते थे ,
कुछ ऐसा अपना बचपन था ।

आज सभी बीती बातें ,
एक कोने में धुंधली हैं ,
सोच सोच कर अच्छा लगता है ,
कैसा अपना बचपन था ।

2 comments:

mahashakti ने कहा…

बहुत अच्‍छी, कविता बचपन का एहसास दिला रही है।

ड़ा.योगेन्द्र मणि कौशिक ने कहा…

कविता के माध्यम से बचपन का सजीव चित्र प्रस्तुत किया है। सुन्दर है.....!