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शनिवार, 23 मई 2009

विजय की दो रचनाएं - " तस्वीर " और " बीती बातें "

तस्वीर


मैंने चाहा कि


तेरी तस्वीर बना लूँ इस दुनिया के लिए,


क्योंकि मुझमें तो है तू ,हमेशा के लिए....



पर तस्वीर बनाने का साजो समान नही था मेरे पास.


फिर मैं ढुढ्ने निकला ; वह सारा समान , ज़िंदगी के बाज़ार में...



बहुत ढूंढा , पर कहीं नही मिला; फिर किसी मोड़ पर किसी दरवेश ने कहा,


आगे है कुछ मोड़ ,तुम्हारी उम्र के ,


उन्हें पार कर लो....


वहाँ एक अंधे फकीर कि मोहब्बत की दूकान है;


वहाँ ,मुझे प्यार कर हर समान मिल जायेगा..





मैंने वो मोड़ पार किए ,सिर्फ़ तेरी यादों के सहारे !!


वहाँ वो अँधा फकीर खड़ा था ,


मोहब्बत का समान बेच रहा था..


मुझ जैसे,


तुझ जैसे,


कई लोग थे वहाँ अपने अपने यादों के सलीबों और सायों के साथ....


लोग हर तरह के मौसम को सहते वहाँ खड़े थे.


उस फकीर की मरजी का इंतज़ार कर रहे थे....


फकीर बड़ा अलमस्त था...


खुदा का नेक बन्दा था...


अँधा था......



मैंने पूछा तो पता चला कि


मोहब्बत ने उसे अँधा कर दिया है !!


या अल्लाह ! क्या मोहब्बत इतनी बुरी होती है..


मैं भी किस दुनिया में भटक रहा था..


खैर ; जब मेरी बारी आई


तो ,उस अंधे फकीर ने ,


तेरा नाम लिया ,और मुझे चौंका दिया ,


मुझसे कुछ नही लिया.. और


तस्वीर बनाने का साजो समान दिया...


सच... कैसे कैसे जादू होते है जिंदगी के बाजारों में !!!!



मैं अपने सपनो के घर आया ..


तेरी तस्वीर बनाने की कोशिश की ,


पर खुदा जाने क्यों... तेरी तस्वीर न बन पाई.


कागज़ पर कागज़ ख़त्म होते गए ...


उम्र के साल दर साल गुजरते गये...


पूरी उम्र गुजर गई


पर


तेरी तस्वीर न बनी ,


उसे न बनना था ,इस दुनिया के लिए ....न बनी !!



जब मौत आई तो , मैंने कहा ,दो घड़ी रुक जा ;


वक्त का एक आखरी कागज़ बचा है ..उस पर मैं "उसकी" तस्वीर बना लूँ !


मौत ने हँसते हुए उस कागज़ पर ,


तेरा और मेरा नाम लिख दिया ;


और मुझे अपने आगोश में ले लिया .


उसने उस कागज़ को मेरे जनाजे पर रख दिया ,


और मुझे दुनियावालों ने फूंक दिया.


और फिर..


इस दुनिया से एक और मोहब्बत की रूह फना हो गई..



बीती बातें




दिल बीती बातें याद करता रहा


यादों का चिराग रातभर जलता रहा


नज़म का एक एक अल्फाज़ चुभता रहा


दिल बीती बातें याद करता रहा



जाने किसके इन्तेजार मे


शब्बा सफर कटता रहा


जो गीत तुमने छेड़े थे


रात भर मैं वह गुनगुनाता रहा


दिल बीती बातें याद करता रहा



शमा पिगलती ही रही थी


और दूर कोई आवाज दे रहा


जुंबा जो कह पा रही थी


अश्क एक एक दास्तां कहता रहा


दिल बीती बातें याद करता रहा








यादें पुरानी आती ही रही,


दिल धीमे धीमे दस्तक देते रहा


चिंगारियां भड़कती ही रही


टूटे हुए सपनो से कोई पुकारता रहा


दिल बीती बातें याद करता रहा



दिल बीती बातें याद करता रहा


यादों का चिराग रातभर जलता रहा


नज़म का एक एक अल्फाज़ चुभता रहा


दिल बीती बातें याद करता रहा



3 comments:

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

bahut badhiya rachanaaye . padhane ke liye dhanyawad.

neeshoo ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना लगी दोनों विजय जी । मजा आ गया । बधाई

Nirmla Kapila ने कहा…

बहुत अच्छी रचनायें है बधाई