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गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

"तिरानब्बे वर्ष की आयु में भी कुर्सी से चिपकने का जुनून उनमें था।" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

‘‘माया मरी न मन मरा, मर-मर गये शरीर।
आशा, तृष्णा ना मरी, कह गये दास कबीर।।’’
कान में सुनने की बढ़िया विलायती मशीन, बेनूर आँखों पर शानदार चश्मा। उम्र तिरानबे साल। सभी पर अपने दकियानूसी विचार थोपने की ललक। घर में बेटे-पोते, पड़-पोते, लेकिन कोई भी बुढ़ऊ के उपदेश सुनने को राजी नही।
अब अपना समय कैसे गुजारें। किसी भी संस्था में जाये तो अध्यक्ष बनने का इरादा जाहिर करना उनकी हाबी।
आज इसी पर एक चर्चा करता हूँ।
आखिर मैं भी तो इन्हीं वरिष्ठ नागरिक महोदय के शहर का हूँ। फिर ब्लाग पर तो लिख रहा हूँ। किसी को पसन्द आये या न आये। क्या फर्क पड़ता है?
मेरे छोटे से शहर में भी एक नागरिक परिषद् है। इसक अध्यक्ष इस क्षेत्र के जाने-माने रईस हैं। ये पिछले 2 वर्षों से अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमाये हुए हैं।
एक वर्ष के अन्तराल पर जब भी चुनाव होता था। ये पहले से ही ढिंढोरा पीटना शुरू कर देते थे कि मैं अध्यक्ष तभी बनूँगा जब मुझे सब लोग चाहेंगे। यदि एक व्यक्ति ने भी विरोध किया तो मुझे अध्यक्ष नही बनना है। इस बार के चुनाव में भी यही नाटक चलता रहा।
मैंने मा0 अध्यक्ष जी को सम्बोधित करके कहा- ‘‘बाबू जी आपको अध्यक्ष कौन बना रहा है? अब किसी और को मौका दीजिए। आपकी क्षत्र-छाया की हमें आज भी बहुत जरूरत है। आप तो अब संस्था के महासंरक्षक बन जाइए।’’
बाबू जी के दिल में मेरी बातें तीर जैसी चुभ गयीं। परन्तु वह बोले कुछ नही।
अब अध्यक्ष पद के लिए नाम प्रस्तुत हुए। एक व्यक्ति का नाम अध्यक्ष पद के लिए आया, तो उस पर सहमति बनने ही वाली थी।
तभी बाबू जी बोले- ‘‘ठहरो! अभी और नाम भी आने दो।’’
तभी उनके एक चमचे ने बाबू जी का इशारा पाकर- उनका नाम प्रस्तुत कर दिया।
वोटिंग की नौबत आते देख। बाबू जी ने अध्यक्ष पद के पहले दावेदार को अपने पास बुलाया और न जाने उसके कान में पता नही क्या मन्त्र फूँक दिया।
वह सदन में खड़ा होकर बोला- ‘‘अगर बाबू जी अध्यक्ष बनना चाहते हैं तो मैं अपना नाम वापिस ले लूँगा।’’
बाबू जी तो चाहते ही यही थे। फिर से अध्यक्ष पद पर अपना कब्जा बरकरार कर लिया। सदन में कई लोगों ने उठ कर कहा कि बाबू जी आप तो यह कहते थे कि अगर एक भी व्यक्ति मेरे खिलाफ होगा तो मैं अध्यक्ष नही बनना चाहूँगा। परन्तु बाबू जी बड़ी सख्त जान थे। अपने फन के माहिर थे। ‘‘तिरानब्बे वर्ष की आयु में भी कुर्सी से चिपकने का जुनून उनमें था।’’

4 comments:

neeshoo ने कहा…

बिल्कुल सटीक । ये कुर्सी मोह कुछ ऐसा ही है । बेहद सुन्दर संस्मरण धन्यवाद सर जी ।

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

राजनीति मोह का अच्छा चित्रण किया आपने ।

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

सटीक,,,ये कुर्सी मोह कुछ ऐसा ही है,

महावीर ने कहा…

सुंदर और सटीक! कुर्सी की ऐसी ललक है जिसका आयु या नैतिकता से कोई संबंध नहीं है।
ये कुर्सी एक ऐसी सीढ़ी की तरह हैं जिसका आखिरी सिरा दिखाई नहीं देता।
“नगद माल की लूट है, लूट सके तो लूट
चूका तो पछतायेगा, जब कुर्सी जायेगी छूट।।
साम, दाम,दण्ड, भेद हैं, चारों तेरे यार;
घूंस, घोटाला, मार-धाड़ पर तेरा है अधिकार।