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शनिवार, 4 अप्रैल 2009

ज़िन्दगी...............[एक कविता] निर्मला कपिला जी की प्रस्तुति

ज़िन्दगी

खिलते फूल सी मुसकान है

जिन्दगी समझो तो बड़ी आसान है

खुशी से जिओ तो सदा बहार है जिन्दगी
दुख मे तलवार की धार है जिन्दगी


पतझर
बसन्तो का सिलसिला है जिन्दगी
कभी इनायतें तो कभी गिला है जिन्दगी


कभी हसीना सी चाल सी मटकती है जिन्दगी

कभी सूखे पते सी भटकती है जिन्दगी

आगे बढ़ने वालों के लिये पैगाम है जिन्दगी

भटकने वालो की मयखाने मे गुमनाम है ज़िन्दगी

निराशा मे जी का जंजाल है जिन्दगी
आशा मे संगीत सी सुरताल है ज़िन्दगी

कहीं मखमली बिस्तर पर सोती जिन्दगी

कभी फुटपाथ पर पडी रोती है जिन्दगी

कभी होती थी दिलबरे जिन्दगी

आज चौराहे पे खडी है शरमसार जिन्दगी

सदिओं से माँ के दूध की पह्चान जिन्दगी

उसी औरत की अस्मत पर बेईमान हैजिन्दगी

वरदानो मे दाऩ क्षमादान है जिन्दगी
बदले की आग मे शमशान है जिन्दगी

खुशी
से जीओ चन्द दिन की मेहमानहैज़िन्दगी
इबादत करो इसकी, भगवान है जिन्दगी


3 comments:

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

निर्मला जी आप एक बार फिर से सुन्दर रचना में आपने जिंदगी के झरोखों में झांकने की कोशिश की है । आपको बहुत बहुत धन्यवाद इस कैति के लिए ।

neeshoo ने कहा…

जिंदगी के अच्छे दृश्य प्रस्तुत किये आपने रचना के माध्यम से निरंतर पढ़कर आपकी कविता सुखानुभूति होती है । बहुत बहुत बधाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

निर्मला कपिला जी!
आपने जिन्दगी के विविध पहलुओं का
सुन्दर चित्रण किया है। प्रत्येक छन्द जीवन की परिभाषाओं का सुखद आनन्द देता है।
बधाई।