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गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

कभी तुम आओ तो सही


जगाकर प्यार का एक
मीठा एहसास,
महका कर मेरी सांस का
एक-एक तार,
दिल की हर धड़कन तुम
झंकृत कर गईं,
सजाने को अपना प्यार भरा संसार,
......कभी तुम आओ तो सही।

बरखा ने सावन में छेड़ी है
रिमझिम फुहार,
सात सुरों का संगीत है
सजा रही बहार,
हर मंजर लिए है एक
अजब सी मदहोशी,
सजी है फिजा में एक
रुनझुन सी खामोशी,
प्रकृति भी है आज सजी है
इंद्रधनुषी रंग में,
देखने को मनभावन छटा
......कभी तुम आओ तो सही।

मौसम के साथ हर रंग
बदला है,
फिजां का स्वरूप
उजला है,
चाँद भी है खुश चाँदनी
बिखरा कर,
फूलों ने सजाई राह खुद को
महका कर,
सजाया है गगन ने झिलमिल
सितारों का आँचल,
करने को अद्भुत श्रृंगार
......कभी तुम आओ तो सही।

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

"करने को अद्भुत श्रृंगार
......कभी तुम आओ तो सही।"
सुन्दर चित्रण।
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर बधाई स्वीकार करें।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

आप का ब्लाग बहुत अच्छा लगा।
मैं अपने तीनों ब्लाग पर हर रविवार को
ग़ज़ल,गीत डालता हूँ,जरूर देखें।मुझे पूरा यकीन
है कि आप को ये पसंद आयेंगे।