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सोमवार, 15 फ़रवरी 2010

कवि का वेलेंटाइन-- उपहार ----[गीत ]---डाo श्याम गुप्त का

प्रिय तुमको दूं क्या उपहार |
मैं तो कवि हूँ मुझ पर क्या है ,
कविता गीतों की झंकार |
प्रिय तुमको दूं क्या उपहार |

गीत रचूँ तो तुम ये समझना,
पायल कंगना चूड़ी खन खन |
छंद कहूं तो यही समझना ,
कर्ण फूल बिछुओं की रुन झुन |

मुक्तक रूपी बिंदिया लाऊँ ,
या नगमों से होठ रचाऊँ |
ग़ज़ल कहूं तो उर में हे प्रिय !
पहनाया हीरों का हार ||---प्रिय तुमको....

दोहा, बरवै, छंद, सवैया ,
अलंकार रस छंद - विधान |
लाया तेरे अंग- अंग को,
विविधि रूप के प्रिय परिधान |

भाव ताल लय भाषा वाणी ,
अभिधा लक्षणा और व्यंजना |
तेरे प्रीति- गान कल्याणी,
तेरे रूप की प्रीति वन्दना |


नव- गीतों की बने अंगूठी ,
नव-अगीत की मेहंदी भाये |
जो घनाक्षरी सुनो तो समझो,
नक् -बेसर छलकाए प्यार |...--प्रिय तुमको....||

नज्मों की करधनी मंगा लो,
साड़ी छप्पय कुंडलियों की |
चौपाई की मुक्ता-मणि से,
प्रिय तुम अपनी मांग सजालो |

शेर, समीक्षा, मस्तक- टीका,
बाजू बंद तुकांत छंद हों |
कज़रा अलता कथा कहानी,
पद, पदफूल व हाथफूल हों |

उपन्यास केशों की वेणी,
और अगीत फूलों का हार |
मंगल सूत्र सी वाणी- वन्दना ,
काव्य-शास्त्र दूं तुझपे वार |----प्रिय तुमको ....||

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

प्रेम (वेलेंटाइन डे पर विशेष)

प्रेम एक भावना है
समर्पण है, त्याग है
प्रेम एक संयोग है
तो वियोग भी है
किसने जाना प्रेम का मर्म
दूषित कर दिया लोगों ने
प्रेम की पवित्र भावना को
कभी उसे वासना से जोड़ा
तो कभी सिर्फ उसे पाने से
भूल गये वे कि प्यार सिर्फ
पाना ही नहीं खोना भी है
कृष्ण तो भगवान थे
पर वे भी न पा सके राधा को
फिर भी हम पूजते हैं उन्हें
पतंगा बार-बार जलता है
दीये के पास जाकर
फिर भी वो जाता है
क्योंकि प्यार
मर-मिटना भी सिखाता है !!

कृष्ण कुमार यादव