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सोमवार, 25 जुलाई 2011

बेनूर चाँद {गजल} सन्तोष कुमार "प्यासा"



एक दर्द में फिर डूबी शमा, फिर चाँद हुआ बेनूर
बिखरा दिल, टीसती यादें तेरी भला क्यूँ हुए तुम दूर
करूँ वक़्त से शिकवा या फिर अफ़सोस अपनी किस्मत पर 
तरसती "प्यास" में तडपूं हर पल, ऐसा चढ़ा उस साकी का सुरूर 
ये कशिश है इश्क की या दीवानगी का कोई दिलकश सबब
तडपती जुदाई उसी को क्यूँ , जो होता प्यार में बेकसूर 
हजारों तारों के साथ भी आसमां क्यूँ हुआ तनहा
जब बंद हो गईं आंखे चकोर की, चाँद भी हो गया बेनूर 
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मन के अन्तरम में पता नहीं कैसी टीस कैसी बेचैनी उठी,
फिर न चाहते हुए/ न जानते हुए भी इन पंक्तियों को  क्यूँ  और कैसे
शब्दों में पिरोया मैंने, मै खुद नहीं  समझ सका  !

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन की टीस को शब्दों का आधार देते रहें, न जाने किसके मन से अनुनादित हो जाये आपकी रचना।

संतोष कुमार "प्यासा" ने कहा…

@ Praveen Ji
ji shayd app sahi hi kahte hai,
man hi to hai, jo samvad anuvad ke bhanvar me hamko apni yad dilati hai...

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

santosh ji..bhut hi sundar likha hai aapne.

शालिनी कौशिक ने कहा…

बहुत शानदार प्रस्तुति