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शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

वह सावंली सी लड़की ---(मिथिलेश दुबे)

तन पर लपेटे

फटे व पुराने कपड़े

वह सांवली सी लड़की,

कर रही थी कोशिश

शायद ढक पाये

तन को अपने,

हर बार ही होती शिकार वह

असफलता और हीनता का

समाज की क्रूर व निर्दयी निगाहें

घूर रहीं थी उसके खुलें तन को,

हाथ में लिए खुरपे से

चिलचिलाती धूप के तले

तोड़ रही थी वह पेड़ो से छाल

और कर रही थी जद्दोजहद जिंदगी से अपने

तन पर लपेटे फटे व पुराने कपड़े

वह सावंली सी लड़की ।

4 comments:

neeshoo ने कहा…

smaj ki dasha ko dikhati rachna ko sarl shabdo me likha ........badhai

SACCHAI ने कहा…

" samaj ke dushano per prahar karti ek acchi rachana "

badhai

----- eksacchai { AAWAZ }

http:eksacchai.blogspot.com

SACCHAI ने कहा…

" samaj ke dushano per prahar karti ek acchi rachana "

badhai

----- eksacchai { AAWAZ }

http:eksacchai.blogspot.com

अर्चना तिवारी ने कहा…

बेहद मार्मिक रचना...