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गुरुवार, 13 मई 2010

नारी........(कविता)............अक्षय-मन



1
बन आहुति श्रंगार करूं अपने हाथों अपनी अर्थी
हालातों की चिता है और अग्नि बन जाये मज़बूरी
आखरी समय है मेरा या है आखरी ये जुल्म तेरा
दोनों में से कुछ तो हो जीवित हूं पर हूं मरी-मरी



मान रखूं मैं उनका भी जिनसे हुई अपमानित मैं
जीत कर भी हारूं पल-पल तुमसे हुई पराजित मैं
किसकी थी किसकी हुई रिश्तों में आज बांटी गई
कौन है मेरा मैं किसकी टुकडो में हुई विभाजित मैं !!



मेरी व्यथा भी सुनलो आज खामोश खड़ी हूं कब से मैं
मन में सोचूं दिल में छुपा लूं खामोश खड़ी हूं कब से मैं
एक तरफ़ पत्थर की मूरत और एक तरफ़ है पत्थर दिल
कलयुग की अहिल्या बनी खामोश खड़ी हूं कब से मैं !!



अब नही झुकना है मुझे चाहें करो कितने भी सितम
अब मर-मर के ना जीना मुझको हुआ है मेरा पुनर्जन्म
अब नही मानुंगी मैं हार,नही हूं अब मैं तेरी अभाग्यता
अब कहोगे तुम ख़ुद मुझको अपराजिता अपराजिता !!

५.
संघर्ष से जो हो ना तंद्रा
जीत लहू की जो पीले मदिरा
विजय होने की हो जिसमे तम्यता
वो कहलायेगी अपराजिता,अपराजिता अक्षय-मन

4 comments:

दिलीप ने कहा…

bahut khoob...

faij ने कहा…

bahut accha likha aapne

sangeeta swarup ने कहा…

गहरे भावों से रची सुन्दर रचना..

वन्दना ने कहा…

akshay ki kavitoan mein hamesha hi ek alag baat hoti hai.......bahut hi sundar abhivyakti.