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मंगलवार, 20 अप्रैल 2010

दीप बना कर याद तुम्हारी....(गीत)...मनोशी जी

दीप बना कर याद तुम्हारी, प्रिय, मैं लौ बन कर जलती हूँ
प्रेम-थाल में प्राण सजा कर लो तुमको अर्पण करती हूँ।

अकस्मात ही जीवन मरुथल में पानी की धार बने तुम,
पतझड़ की ऋतु में जैसे फिर जीवन का आधार बने तुम,
दो दिन की इस अमृत वर्षा में भीगे क्षण हृदय बाँध कर,
आँसू से सींचा जैसे अब बन कर इक सपना पलती हूँ।
 दीप बना कर...

मेरे माथे पर जो तारा अधरों से तुमने आँका था,
अंग-अंग हर स्पर्श तुम्हारा लाल दग्ध हो मुखर उठा था,
उन चिह्नों को अंजुरि में भर पीछे डाल अतीत अंक में,
दे दो ये अनुमति अब प्रियतम, अगले जीवन फिर मिलती हूँ।
दीप बना कर...

तुम रख लेना मेरी स्मृति को अपने मन के इक कोने में,
जैसे इक छोटा सा तारा दूर चमकता नील गगन में,
मौन रो रहे दंश हृदय के, घाव रक्त से ज्यों हो लथपथ ,
आहुति के आँसू से धो कर आंगन लो अब मैं चलती हूँ।
दीप बना कर...

7 comments:

neeshoo ने कहा…

दीप बना कर याद तुम्हारी, प्रिय, मैं लौ बन कर जलती हूँ
प्रेम-थाल में प्राण सजा कर लो तुमको अर्पण करती हूँ।
sundar geet ...

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

bahut khub ...samarpan ka bahv acche se ubhara hai aapne

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

हिंदी साहित्य मंच पर आपका प्रथम आगमन बहुत ही शानदार है ...सहयोग के लिए धन्यवाद ..

दिलीप ने कहा…

bahut hi shandaar geet...man prasann ho gaya...

http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

Shekhar Kumawat ने कहा…

bahut khub

jabardast he

shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

ananad banarasi ने कहा…

ap ki kavita kafi achchhi hai

वाणी गीत ने कहा…

मौन रो रहे दंश हृदय के, घाव रक्त से ज्यों हो लथपथ ,
आहुति के आँसू से धो कर आंगन लो अब मैं चलती हूँ...
बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...बहुत ही सुन्दर ...!!