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शनिवार, 10 अप्रैल 2010

मानता हूँ ......(कविता ).......नीशू तिवारी

"प्रेम के वशीभूत होकर
सात फेरे में बधनें के
अपराध की सजा
जिन्दा जला कर दी जाती है
लेकिन
खापों और पंचायतों के
कूर्र्तापूर्ण फैसले को
इसकी परिणति
नहीं मानता हूँ


"दर्द से तड़पता
हादसे का शिकार हुआ इन्सान
दम तोड़ देता है
इलाज के आभाव में
लेकिन
मानवता के दंश व अभिशाप
के बीच
दर्दनाक मौत को ,
चटकारे लेकर पढ़ा जाना
साहस नहीं
कायरता मानता हूँ"


"दंतेवाडा में सैनिक
खून की होली खेल
शहीद हो जाता है
लेकिन
तानाशाहों की
नम आँखों को
गहरे जख्मों पर
मरहम नहीं
प्रहार मानता हूँ"

7 comments:

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

नीशू जी .....इस रचना के लिए हमारे पास कोई शब्द नहीं है .....गहरा प्रहार किया है आपने ....हर एक लाइन को पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं ...बधाई

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

kya baat hai sir ji itni acchi kavita aapki lagi ki sabd kam pad rahe hai kahne ko .......

बेनामी ने कहा…

lajawab............
likhate rahiye.


Ashutosh

KAVITA RAWAT ने कहा…

"दर्द से तड़पता
हादसे का शिकार हुआ इन्सान
दम तोड़ देता है
इलाज के आभाव में
लेकिन
मानवता के दंश व अभिशाप
के बीच
दर्दनाक मौत को ,
चटकारे लेकर पढ़ा जाना
साहस नहीं
कायरता मानता हूँ"
Samvedanheenta ki esse badi aur kya trasadi ho sakti hai..... Har ghatna-durghatna ko chatkare maarkar padhkar ek kone mein patak dene waalon ke muhn par yah karara tamacha hai....

वन्दना ने कहा…

नि:शब्द हूँ…………………और व्यथित भी।

neeshoo ने कहा…

aap sabhi ka dhanyavaad

Mithilesh dubey ने कहा…

bahut hee sundar rachna neeshoo ji.