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गुरुवार, 4 मार्च 2010

पति - पत्नी -----------[गीत]---- कवि कुलवंत सिंह

अहा ! मन में बिखरी खुशियाँ,
अहा ! दिल में खिलती कलियाँ .
आज यौवना का परिणय है,
अपने सपनों में तन्मय है .
लेकर भाव पूर्ण समर्पण,
करना है यह तन मन अर्पण .
पल्लव मन गुंजारित हर्षित,
लज्जा नारी सुलभ समर्पित .
मृदु-क्रीड़ा, आलिंगन, चुंबन,
रोम रोम में भरते कंपन .
अधीर हृदय की प्रणय पुकार,
उष्ण स्पर्श की मधु झंकार .
पुष्प सुवासित महका जीवन,
सात रंग से बहका जीवन .
किलकारी से खिला संसार,
खुशियों का न पारावार .
जग जीवन ने डाला भार,
कर्तव्यों का बोझ अपार .
मीत की मन में प्रीत अथाह,
देखे लेकिन कैसे राह .
अब शिथिल हुआ है बाहुपाश,
भटका मन है बृहत आकाश .
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मन में कोंपल फूट रही हैं,
सिंधु तरंगे उमड़ रही हैं .
माही को पाने की चाह,
बंधन पावन शुभ्र विवाह .
उन्माद अतुल रूप की राह,
काम तरंगित रुधिर प्रवाह .
भाव भंगिमा अंग उभार,
मोहित करतीं हृदय अपार .
सुरभि सांस में अधर विनोद,
रूप आलिंगन मदिर प्रमोद .
तन मन पर कर पति अधिकार,
आत्मिक सुख पौरुष संसार .
निसर्ग मिलन प्रकृति उपहार,
जीवन नन्हा हुआ साकार .
जग जीवन ने डाला भार,
कर्तव्यों का बोझ अपार .
भूल गया वह बाग बहार,
पाने को सारा संसार .
जग में हो उसका उत्थान,
सभी करें उसका सम्मान .
अब शिथिल हुआ है बाहुपाश,
भटका मन है बृहत आकाश .

5 comments:

शरद कोकास ने कहा…

इस गीत का शीर्षक पति पत्नी न भी देते तो श्रंगार क गीत तो है यह ..

Mithilesh dubey ने कहा…

बहुत ही सुन्दर विवरण दिया है गीत के माध्यम से , लाजवाब लगी आपकी रचना ।

हिन्दी साहित्य मंच ने कहा…

सुन्दर गीत के लिए आभार ।

जय हिन्दू जय भारत ने कहा…

बहुत खूब कुलवंत भाई , पति पत्नी का बढ़िता चित्रण किया है आपने इस गीत में , बधाई ।

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

सुन्दर श्रिन्गारी कविता--पर सिर्फ़ यौवना / पत्नी का पक्ष वर्णित है अत: शीर्षक में पति जोडना आवश्यक नहीं ।