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गुरुवार, 21 जनवरी 2010

काव्य की एक विधा "अगीत" के नवीन छंद ’लयबद्ध अगीत[रचना]----डा श्याम गुप्त

(ये प्रेम-अगीत, अतुकांत काव्य की एक विधा "अगीत" के नवीन छंद ’लयबद्ध अगीत’ में निबद्ध हैं)

(१)
गीत तुम्हारे मैंने गाये,
अश्रु नयन में भर-भर आये,
याद तुम्हारी घिर-घिर आई;
गीत नहीं बन पाये मेरे।
अब तो तेरी ही सरगम पर,
मेरे गीत ढला करते हैं;
मेरे ही रस,छंद,भाव सब ,
मुझसे ही होगये पराये।

(२)
जब-जब तेरे आंसू छलके,
सींच लिया था मन का उपवन;
मेरे आंसू तेरे मन के,
कोने को भी भिगो न पाये ।
रीत गयी नयनों की गगरी,
तार नहीं जुड पाये मन के ;
पर आवाज मुझे देदेना,
जब भी आंसू छलकें तेरे।

(३)
श्रेष्ठ कला का जो मंदिर था,
तेरे गीत सज़ा मेरा मन;
प्रियतम तेरी विरह-पीर में ,
पतझड सा वीरान होगया।
जैसे धुन्धलाये शब्दों की,
धुन्धले अर्ध-मिटे चित्रों की;
कला बीथिका एक पुरानी।

(४)
तुम जो सदा कहा करतींथी,
मीत सदा मेरे बन रहना ;
तुमने ही मुख फ़ेर लिया क्यों,
मैने तो कुछ नहीं कहा था।
शायद तुमको नहीं पता था,
मीत भला कहते हैं किसको;
मीत शब्द को नहीं पढा था,
तुमने मन के शब्द-कोश में।

(५)
बालू से, सागर के तट पर,
खूब घरोंदे गये उकेरे;
वक्त की ऊंची लहर उठी जब,
सब कुछ आकर बहा लेगयी;
छोड गयी कुछ घोंघे-सीपी,
सजा लिये हमने दामन में।

(६)
तेर मन की नर्म छुअन को,
वैरी मन पहचान न पाया।
तेरे तन की तप्त चुभन को,
मैं था रहा समझता माया।
अब बैठा यह सोच रहा हूं,
तुमने क्यों न मुझे समझाया ।
ग्यान ध्यान तप योग धारणा,
में, मैंने इस मन को रमाया;
यह भी तो माया-संभ्रम है,
यूंही हुआ पराया तुमसे ॥

4 comments:

रंजना ने कहा…

तुम जो सदा कहा करतींथी,
मीत सदा मेरे बन रहना ;
तुमने ही मुख फ़ेर लिया क्यों,
मैने तो कुछ नहीं कहा था।
शायद तुमको नहीं पता था,
मीत भला कहते हैं किसको;
मीत शब्द को नहीं पढा था,
तुमने मन के शब्द-कोश में।

Waah ..... Bahut bahut sundar....Bhaav aur abhivyakti,dono hi bejod...kamaal ke !!

Sadhak Ummedsingh Baid "Saadhak " ने कहा…

तेर मन की नर्म छुअन को,
वैरी मन पहचान न पाया।
तेरे तन की तप्त चुभन को,
मैं था रहा समझता माया।
अब बैठा यह सोच रहा हूं,
तुमने क्यों न मुझे समझाया ।
ग्यान ध्यान तप योग धारणा,
में, मैंने इस मन को रमाया;
यह भी तो माया-संभ्रम है,
यूंही हुआ पराया तुमसे ॥
भई वाह! मजा आ गया, गहन अभिव्यक्ति.
sahiasha.wordpress.com

neeshoo ने कहा…

तेर मन की नर्म छुअन को,
वैरी मन पहचान न पाया।
तेरे तन की तप्त चुभन को,
मैं था रहा समझता माया।

बहुत ही अच्छा लगा ।

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद ।